प्रकृति देवी हैं, जो कहती हैं कि मुझे भोगोगे, तो तुम्हें नष्ट कर दूँगी। आज जितनी भी ये दुनिया में राज करने वाली ताकतें हैं, वही तो शुम्भ-निशुम्भ हैं। आज भी वही हो रहा है; नदियाँ सूख रही हैं, वायुमंडल बिगड़ रहा है, धरती कराह रही है। जो प्रकृति का दोहन करता है, वह फिर मारा जाता है। जब शुम्भ-निशुम्भ का आगे चलकर वध होता है, तो ‘सप्तशती’ कहती है कि नदियाँ और हवाएँ ठीक से बहना शुरू कर देती हैं। आकाश में जो उल्कापात और अन्य तरह के विक्षेप होते थे, वे बंद हो जाते हैं।
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आचार्य प्रशांत: प्रकृति देवी हैं जो कहती हैं कि मुझे भोगोगे, तो तुम्हें नष्ट कर दूँगी। प्रकृति को भोगा नहीं कि प्रकृति तुम्हें नष्ट कर देगी। अभी तो आगे तुम्हें बहुत एकदम भौंचक्का कर देने वाली बात पता चलेगी। जब शुम्भ-निशुम्भ का आगे चलकर वध होता है और इसमें तो कोई छुपी बात नहीं है कि वध तो इनका होना ही है। वहाँ तो कोई सस्पेंस नहीं।
तो ‘सप्तशती’ कहती है कि नदियाँ ठीक से बहना शुरू कर देती हैं, हवाएँ ठीक से बहना शुरू कर देती हैं। आकाश में जो उल्कापात और अन्य तरह के विक्षेप होते थे, वो बन्द हो जाते हैं। समूची प्रकृति ही अपनी निर्दोष लय को दोबारा प्राप्त कर लेती है। कुछ इशारा मिल रहा है? ये भोगने वालों ने प्रकृति का ही सत्यानाश कर रखा था। जैसे आज हो रखा है।
इन्होंने नदियाँ खराब कर दी थी, इन्होंने पहाड़ खराब कर दिए थे, इन्होंने वायुमंडल खराब कर दिया था। तो कथा कहती है कि जैसे ही फिर इनका वध हुआ, वैसे ही नदियों का जल स्वच्छ हो गया। नदियों की धारा अपने पुराने मार्ग पर वापस लौट आई। जो सब ज्वालामुखी फट रहे होते थे इधर-उधर, वो शान्त हो गए और वायुमंडल में जो उपद्रव हो रहे होते थे वो सब। वायुमंडल में उपद्रव को क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) क्यों न माना जाए?




