प्रश्न: सर, जीवन में लक्ष्य होने चाहिए या नहीं?
वक्ता: ‘लक्ष्य’, ‘महत्वकांक्षा’, ‘रुचि’, ये सारे शब्द एक ही श्रेणी से सम्बंधित हैं। एक ही वर्ग से सम्बंधित हैं, एक ही तरह के मन से आ रहे हैं। ये शब्द मन में कैसे आते हैं? ये आते हैं सिर्फ़ बाहरी प्रभावों से। जिसको तुम कहते हो अभिलाषा, रुझान, उद्देश्य, लक्ष्य, प्रयोजन, इन सबमें तुम्हारा अपना बहुत कम है। उसमें हमारा बहुत कुछ होता नहीं है। आप किस घर में पैदा हुए हो, आप किस समाज में रह रहे हो, आपके दोस्तों ने आपके मन में क्या बात भर दी, मीडिया आपके मन में क्या भर रहा है, उसी को आप समझने लग जाते हो कि ये मेरी ही अभिलाषा है, या कि मेरा ही लक्ष्य है। हर विज्ञापक को ये बात बहुत साफ़-साफ़ पता होती है। आपको किसी सामान की ज़रूरत नहीं भी है तो वो क्या करता है; वो दस बार उस चीज़ से सम्बंधित विज्ञापन आपको दिखाता है। हर संभव तरीके से। कभी इन्टरनेट पर तो कभी विज्ञापन पट(होर्डिंग्स) पर; अखबार पर, रेडियो पर, टेलीविज़न पर; लगातार-लगातार आपको वो प्रभावित करता है। और जब आप खूब प्रभावित हो जाते हो तो आप अंततः अपना लक्ष्य बनाते हो कि मुझे ये चीज़ खरीदनी है।
क्या ये लक्ष्य आपका है? या ये किसी ने इसे आपके मन में डाल दिया है? जीवन में आप जितने भी लक्ष्य बनाते हो वो सारे ऐसे ही होते हैं। बिरला है वो आदमी जिसने जाना है कि अपने लक्ष्य का क्या मतलब है। निन्यानवें प्रतिशत लोग जिस बात को अपना लक्ष्य या अपनी रूचि समझ रहे होते हैं, वो सिर्फ बाहरी प्रभावों से आई हुई एक तरंग होती है, एक विचार होता है। कुछ दिखा बाहर और हम उससे प्रभावित हो गए।
बाज़ार से निकल रहे हो और तुम्हारे मन में कोई इच्छा नहीं है चाट खाने की। तुम कुछ और ही काम करने निकले हो। तुम जा रहे हो कपड़े खरीदने। पर जो आदमी चाट बेच रहा है वो बड़ा होशियार है। उसे पता होता है कि हमारे मन गुलाम ही है और हमें कुछ समझ नहीं है अपने मन की। तुम जब उसके बगल से गुजरते हो, तो कभी गौर किया है कि वो क्या करता है? वो पहले तो उसका जो बड़ा-सा तवा होता है उसको बजाता है, टन-टन, टन-टन। और उसके बाद वो कुछ नहीं भी पका रहा होता है तो व्यर्थ ही तवे पर थोड़ा-सा शुद्ध घी डाल देता है; भले ही उस घी को वो प्रयोग करता हो या ना करता हो। फिर तुमने देखा है कि नाक में जब वो सुगंध आती है तो क्या होता है? कान में क्या आई? तवे की आवाज़। और नाक में क्या आई? घी की सुगंध। और फिर आँख ने क्या देखा? जो उसने वहाँ सजाकर रखा हुआ है। भले ही तुम जा रहे थे कपड़े खरीदने लेकिन तुमने कहा कि क्या फर्क पड़ता है दस मिनट रुक कर चाट भी खा लेते हैं, कपड़े की दूकान कौन सी बंद हुई जा रही है, दस मिनट बाद ही खरीद लेंगे। और तुम पहुँच जाते हो चाट खाने को। और तुम बोलोगे कि ये तो मेरी रूचि है, मेरी इच्छा है। जब उसकी ओर जा रहे होगे और तुम्हें कोई रोकेगा तो तुम कहोगे कि मेरी इच्छा है, तुम मुझे रोक क्यों रहे हो? पर क्या वास्तव में तुम्हारी इच्छा है? ध्यान से देखो! तुम तो निकले थे कपड़ा खरीदने, ये चाट कैसे खाने लगे?




