डर-डर के मर जाना है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

आचार्य प्रशांत: तुम्हारे पास बात ऐसे पहुँचती है कि तुमने मुझसे सुन लिया। मेरे पास कहाँ से आती है?
प्रश्नकर्ता: सोचकर।
आचार्य: नहीं, सोचकर नहीं आती है, मुँह काला करके आती है। अभी मेरी शक्ल देख रहे हो? झुल्साई-सी दिख रही है? नहीं दिख रही होगी क्योंकि तुमने मुझे पहले ज़्यादा देखा नहीं है। पता है ये कैसे झुलसी है? ये ऐसे झुलसी है कि पिछले दो-तीन महीने से लगातार मैं अपनी बाइक उठाता हूँ और पहाड़ों पर चला जाता हूँ। वहाँ घूम रहा हूँ, फिर रहा हूँ, अकेले रह रहा हूँ। किनारे पर, रेत पर, चुपचाप पड़ा हुआ हूँ। रात भर पड़ा हुआ हूँ, नदी में कूद गया हूँ, झरने पर चढ़ गया हूँ। वहाँ से ये सारी बातें आती हैं।
तुम तक आती हैं कि तुम आसानी से यहाँ ए.सी. वाले कमरे में बैठकर मुझे सुन रहे हो। मैंने कीमत अदा की है इसलिए मुझे भूलती नहीं। तुमने कीमत थोड़े ही अदा की है। तुम तो सोच रहे हो कि यहाँ पर आसानी से बैठकर सुनने से तुम्हें मिल जाएगा। मैं वहाँ जान का जोख़िम उठाता हूँ तब मुझे कुछ मिलता है। मेरी तो बुलेट (मोटर-बाइक) फिसल गई तो मैं गिरा भी धड़ाम से। जब गिरता हूँ तब अचानक बल्ब जलता है कि कुछ समझ में आया और वो मैं यहाँ आकर संवाद में बोल देता हूँ।
तो तुम भी बाहर तो निकलो न। यहाँ क्यों बैठे रहते हो? फिर जो पता चलेगा वो असली होगा। वो कोई नहीं भुला सकता तुमसे। फिर जो पता चलेगा वो असली होगा, फिर वो तुमसे कोई नहीं छीन सकता। फिर कोई आकर तुमसे सौ-बार कहे कि आप बेवकूफ हैं, कैसी बातें करते रहते हैं, दिमाग हिल गया है। तुम कहोगे…
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