बाहर की बात तो ये बिल्कुल ठीक है कि बाहर निकलो तो वर्कप्लेस पर हरासमेंट हो जाता है। कोई चिकोटी काट लेता है, कोई आँख मार देता है, कोई कुछ आपको अश्लील संदेश भेज देता है, ये सब हो जाता है बाहर ठीक है, बिल्कुल होता है। और बाहर बहुत बुरी दुनिया है, ये सब चल रहा है। ऑटो वाला आपको, आप बैठ गए ऑटो में तो वो रियर व्यू से आपको देख रहा है, ये सब हो सकता है। लेकिन बाहर माने किसकी तुलना में बाहर? भीतर की तुलना में बाहर ना। तो भीतर की बात कौन करेगा?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, अभी रिसेंटली न्यूज़ में आया था कि एक लड़की ने उड़ीसा में सेक्सुअल हरासमेंट के चलते अपने प्रोफ़ेसर के अगेंस्ट कंप्लेंट करी, और उसकी बात को किसी ने सुना नहीं और फाइनली उसने अपने को आग लगा ली, और दो-तीन दिन पहले वो मर गई। और इसके लिए मैं कुछ आँकड़े देख रही थी, कि 35% वुमेन जो हैं वो वर्कफ़ोर्स में अपने को सेफ़ महसूस नहीं करतीं, उनको सेक्सुअल हरासमेंट का एक्सपीरियंस करना पड़ता है। और स्कूलों में भी 25% से 35% लड़कियों को सेक्सुअल हरासमेंट फेस करना पड़ता है।
तो इसके चलते ऑलरेडी हमारे समाज में लेबर पार्टिसिपेशन (फ़ीमेल लेबर पार्टिसिपेशन) इतना कम है, और वैसे ही महिलाएँ अपने आप को सेफ़ महसूस नहीं करतीं। तो जब ऐसी घटनाएँ होती हैं तो कहीं ना कहीं औरतों का आत्मविश्वास, और एक ख़ुद भी वो मोटिवेटेड फ़ील नहीं करती है बाहर जाने के लिए, काम करने के लिए। स्कूलों में भी ड्रॉप रेट बहुत ज़्यादा है।




