
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, अभी रिसेंटली न्यूज़ में आया था कि एक लड़की ने उड़ीसा में सेक्सुअल हरासमेंट के चलते अपने प्रोफ़ेसर के अगेंस्ट कंप्लेंट करी, और उसकी बात को किसी ने सुना नहीं और फाइनली उसने अपने को आग लगा ली, और दो-तीन दिन पहले वो मर गई। और इसके लिए मैं कुछ आँकड़े देख रही थी, कि 35% वुमेन जो हैं वो वर्कफ़ोर्स में अपने को सेफ़ महसूस नहीं करतीं, उनको सेक्सुअल हरासमेंट का एक्सपीरियंस करना पड़ता है। और स्कूलों में भी 25% से 35% लड़कियों को सेक्सुअल हरासमेंट फेस करना पड़ता है।
तो इसके चलते ऑलरेडी हमारे समाज में लेबर पार्टिसिपेशन (फ़ीमेल लेबर पार्टिसिपेशन) इतना कम है, और वैसे ही महिलाएँ अपने आप को सेफ़ महसूस नहीं करतीं। तो जब ऐसी घटनाएँ होती हैं तो कहीं ना कहीं औरतों का आत्मविश्वास, और एक ख़ुद भी वो मोटिवेटेड फ़ील नहीं करती है बाहर जाने के लिए, काम करने के लिए। स्कूलों में भी ड्रॉप रेट बहुत ज़्यादा है।
तो आपके हिसाब से किस तरह महिलाएँ अपने आप को प्रेरित करती रहें कि ऐसे इंसिडेंट से उनको ज़्यादा फ़र्क़ न पड़े, और वो अपने आप को किस तरह से बाहर जाने के लिए प्रेरित करती रहें?
आचार्य प्रशांत: नहीं ये सारा किस्सा हमने बाहर का कहा ना, तो इसलिए फिर लग रहा है कि ज़रूरत है प्रेरणा की, कि बाहर कैसे निकलें? बाहर कितना ख़तरा है, कैसे बाहर निकलें। क्योंकि सारा किस्सा हमने सिर्फ़ बाहर-बाहर का कह दिया, इसलिए अब लग रहा है कि बाहर ही ख़तरा है इतना बाहर कैसे निकलें। थोड़ा-सा इंस्पिरेशन दीजिए, कुछ बताइए कि बाहर कैसे निकला जाए? ये है आपका सवाल, इस सवाल के मूल में बाहर की बात है, कि बाहर गड़बड़ है।
एक आँकड़ा मैं भी बताता हूँ, 785 पुरुषों की हत्या उनकी पत्नियों ने करी है (एनसीआरबी डाटा) किसी अवधि में। 785 था आँकड़ा, क्योंकि अभी ये हुआ है ना कि पतियों की या प्रेमियों की हत्या कर दी कुछ महिलाओं ने। आँकड़ा ये था कि 785 पुरुषों की हत्या महिलाओं ने करी है किसी अवधि में भारत में, छ: महीना है, एक साल है या दो साल है जो भी है। अतः उसी अवधि में पतियों ने और प्रेमियों ने इससे 60 गुना ज़्यादा महिलाओं की हत्या करी है (एनसीआरबी डाटा से) ये अंदर की बात है। आपने बाहर की बात बता दी थी, अंदर की बताई नहीं थी।
बाहर की बात तो ये बिल्कुल ठीक है कि बाहर निकलो तो वर्कप्लेस पर हरासमेंट हो जाता है। कोई चिकोटी काट लेता है, कोई आँख मार देता है, कोई कुछ आपको अश्लील संदेश (ल्युड प्रपोज़ल) भेज देता है, ये सब हो जाता है बाहर ठीक है, बिल्कुल होता है। और बाहर बहुत बुरी दुनिया है, ये सब चल रहा है। ऑटो वाला आपको, आप बैठ गए ऑटो में तो वो रियर व्यू से आपको देख रहा है, ये सब हो सकता है। लेकिन बाहर माने किसकी तुलना में बाहर? भीतर की तुलना में बाहर ना। तो भीतर की बात कौन करेगा?
भीतर की वही बात है वो जो आँकड़ा था, खोज निकालिएगा, हो सकता है मैं कुछ ऊपर-नीचे बयान कर रहा हूँ पर मेरे हिसाब से यही है। 785 का तो साफ़-साफ़ याद है, कि 785 पुरुषों की हत्या उनकी पत्नियों या उनकी प्रेमिकाओं द्वारा की गई एक किसी अवधि में। और इससे 60 गुना ज़्यादा महिलाओं की हत्या होती है, उनके पतियों और उनके प्रेमियों द्वारा, उसी अवधि में। ये अंदर की बात है। इस अंदर की बात का आपने उल्लेख ही नहीं करा। अब क्या करें? अब तो सवाल ही पलट गया सारा, कि नहीं पलट गया?
सवाल ये था कि बाहर इतना असुरक्षित है मामला, महिला बाहर कैसे निकले? तो आँकड़े तो बोल रहे हैं कि बाहर जो असुरक्षा है सो है, बाहर से कहीं ज़्यादा असुरक्षित तो अपने घर में है।
12-14 साल पहले किसी कॉलेज में बेचारी छोटी-सी लड़की थी वो एक, वो शरीर से भी वैसे ही वो संकुचित-सी थी दुबली-पतली एकदम, लगे कि अभी छठी में पढ़ती होगी। तो उसको बोला था मैंने वो कहीं पढ़ा भी होगा लेख:
"सुरक्षा नहीं मकान में, लड़की रहो उड़ान में।"
हाँ उड़ान के अपने ख़तरे हैं, बिल्कुल हैं। उड़ान के अपने ख़तरे हैं पर जब हम ख़तरों की बात करें तो तुलनात्मक रूप से करनी पड़ेगी ना। मकान के कितने ख़तरे हैं, उसकी बात कौन करेगा?
और ये तो अभी सिर्फ़ हत्याओं की बात हुई थी। उसमें जब और बातें आप जोड़ो जो कि बुरी मानी भी नहीं जातीं, जो अच्छी मानी जाती हैं, तो उसकी बात कौन करेगा? सासू माँ दबाव दे-देकर के उसको गर्भवती करा रही है, बॉस कम से कम ये तो नहीं करता। लेकिन घर में बच्चा पैदा होगा आप कहोगे, "देखो कितनी मज़ेदार बात है ताली बजाओ, ताली बजाओ। गोद भर रही है, आओ सोहर गाते हैं।" ये सब चलता है। यहाँ किसी को पता चलेगा क्या, कि उसको ज़बरदस्ती प्रेग्नेंट कराया गया था?
वर्कप्लेस पर डिस्क्रिमिनेशन हो जाए जेंडर बेस्ड, तो पता चल जाता है। पर आधी औलादें ज़बरदस्ती पैदा हो रही हों, तो कैसे पता चलेगा? और वो तो और ख़ुशी की बात मानी जाती है। और ये भी नहीं कि जो आप पर दबाव डल रहा हो, वो ज़रूरी है कि बहुत प्रत्यक्ष हो, दबाव डालने के लिए हमारी संस्कृति बहुत प्यारे तरीक़े जानती है। दबाव डालने के बड़े अनूठे और बड़े सूक्ष्म तरीक़े होते हैं। बहू आई है, तीन साल हो गए बच्चा नहीं हुआ है, बहू के जन्मदिन पर उसको छोटे से इन्फ़ेंट की फ़ोटो गिफ़्ट कर दो — डल गया दबाव। और फ़ोटो गिफ़्ट करते हुए बिल्कुल उसकी आँख में आँख डाल कर देखो और बोलो, “कुछ हमारा भी सोचो ना।” बस हो गया, डल गया दबाव।
मुझे वर्कप्लेस को डिफेंड नहीं करना है, और वहाँ पर और ज़्यादा सिक्योरिटी होनी चाहिए बिल्कुल, और दिक़्क़त बस ये है कि उसके लिए हमारे पास बहुत सारे मेज़र्स (पॉश एक्ट, 2013) मौजूद हैं। यहाँ तक गाइडलाइन्स मौजूद हैं, कि आप किसी महिला सहकर्मी को अगर बहुत देर तक घूर कर देखते हैं और वो भी तय कर दिया, इतने सेकंड तक अगर आप लगातार टकटकी बाँध कर देखते हैं तो वो सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन में आ जाएगा, जेल हो जाएगी आपको। पुरुष बेचारे घबराने लगे हैं।
वो बातचीत हो रही होगी है, तो बीच-बीच में अपना थोड़ा इधर-उधर कर लेते हैं, कहते हैं, कहीं सीसीटीवी में रिकॉर्डिंग हो रही हो, तो ये न हो जाए कि देखो इतनी देर तक लगातार इसको देख रहा था। बाहर तो तमाम तरह के नियम-क़ायदे बना दिए गए हैं, तो भेड़ियों से आपको थोड़ी-सी निजात मिल सकती है। कोई कुछ गड़बड़ कर रहा है, आप जाकर के एचआर में शिकायत कर देंगे। एनसीडब्ल्यू (नेशनल कमीशन फ़ॉर वीमन) में आप लिख कर भेज देंगे और ज़्यादा ही नाटक हो रहा है, तो आप अपनी कंपनी से इस्तीफ़ा दे कर के दूसरी जगह चली जाएँगी नौकरी करने।
घर से, ससुराल से इस्तीफ़ा कैसे दोगे? मायके से इस्तीफ़ा कैसे दोगे? असली शोषण जहाँ होता है, उसकी बात क्यों नहीं कर रहे हम?
और जितनी बार कोई ऐसी घटना निकल कर आती है, जहाँ पर दफ़्तर या बाहर कहीं कार्यक्षेत्र में किसी लड़की या महिला के साथ दुर्व्यवहार हो गया होता है — जितने संस्कृतिवादी हैं, सब बिल्कुल उचक पड़ते हैं। कहते हैं "देखा! बाहर निकलने पर तो एक्सप्लॉइटेशन होता ही है। इसीलिए हम कहते हैं घर में बैठो, घर में सुरक्षित हो।"
वो उसको घर में बचाया जा रहा है, अपने लिए बचाया जा रहा है। बाहर निकलोगी तो कई तुम्हारा शिकार करेंगे, घर में रहो ना ताकि सिर्फ़ हम तुम्हारा शिकार करें। बाहर निकलोगी तो हो सकता है कई लोग नोच लें, घर में रहो ना ताकि सिर्फ़ हम नोचें। सब घरों की बात नहीं कर रहा हूँ, मेरे ख़िलाफ़ लोग खड़े हो जाते हैं अपवादों की कहानी लेकर। कहते हैं, मैं अपने घर की बताता हूँ, मेरी बहन है वो पापा की परी है, मैं भूखा रहता हूँ वो मोटी है। और आप बोलते रहते हो कि लड़कियों के ख़िलाफ़ शोषण होता है, नहीं, मेरे ख़िलाफ़ शोषण होता है। मेरा विटामिन ए, बी, सी, डी, एक्स, वाय, ज़ेड सब कम है और वो 20 किलो ओवरवेट है। तो पापा की परी नहीं है, पापा की व्हेल है।
अपवाद मत बताना। मैं आँकड़ों पर आधारित, एक ज़्यादा व्यापक, एक जनरल बात कर रहा हूँ। अपवाद हर जगह होते हैं, आपके घर में अपवाद है। आपके यहाँ पर बहन को, पत्नी को, बहू को, महिला को बड़ा रिस्पेक्ट, बड़ा प्यार दिया जाता है, बहुत अच्छी बात है। आपके घर की बात नहीं कर रहा फिर मैं। पर आपका घर अगर ऐसा है, तो आप 1% अपवाद में आते हैं बस, 99% दुनिया दूसरी है भारत में। बाहर भी ऐसे ही है पर बाहर थोड़ा कम है मामला, भारत तो…।
देखो, सत्र में भी यही बोल रहा था, आज भी बोल रहा हूँ — ये दुनिया स्वार्थ पर, ताक़त पर चलती है। यहाँ कोई किसी का नहीं हो सकता क्योंकि प्राकृतिक रूप से अहंकार बस अपना लाभ देखता है। इसमें किसी की कोई ग़लती नहीं, किसी का कोई अपमान नहीं, कोई अन्याय नहीं। हम ऐसे रचे गए हैं।
पाँच छोटे बच्चे डूब रहे होंगे, आप जो "आपका वाला" होगा उसको बचाने जाओगे। आप जिसको अपनी दया कहोगे, उसमें भी स्वार्थ है अपने वाले को बचाओगे। हम ऐसे रचे गए हैं, इसमें हम क्या कर सकते हैं? यही काम आप नहीं जितनी मादाएँ हैं, सब करेंगी मैमल्स में। हम ऐसे रचे गए हैं। ये कोई बेइज़्ज़ती की बात नहीं है, हम ऐसे हैं। हम ऐसे हैं, इस बात को स्वीकारना पड़ेगा कि ये दुनिया स्वार्थ पर चलती है।
आपको अगर कोई बोले कि "नहीं-नहीं-नहीं, तुम तो मेरे बग़ीचे का फूल हो, मेरे गुलशन की मैना हो,” क्या बोलूँ मैं जो भी, “मेरे चूल्हे की हल्दी हो, घर में ही रहो।" और आप बहुत जल्दी इठला के, बल खा के एकदम उसमें आ जाएँ, भाव में आ जाएँ कि "ही… ही… ही, देखो मुझे कोई मिल गया प्राण प्यारा!" वो कह रहा है, "तुम बस चूल्हे में हल्दी की तरह और गुलशन में मैना की तरह रहो। तुम्हें क्या ज़रूरत है घर से बाहर निकल कर के अपना गोरा रंग काला करने की। अरे, मैं मर्द हूँ। मैं बाहर निकल कर के धूल फाँकूँगा, धूप खाऊँगा, मेहनत करके लाऊँगा। तुम कमसिन कली की तरह घर में रहो, मैं जब बाहर दुनिया से लड़ के थक-हार के आऊँ, तो तुम मेरे लिए बिस्तर बिछाओ और मुझे आराम दो। ये तुम्हारा काम है।"
और बिल्कुल एकदम ऐसे पुलकित हो जाएँ महिलाएँ, "हैं… हैं… हैं, कितनी प्यारी बात की देखो मुझसे कितना-कितना प्यार करता है ये! मुझे कह रहा है, तुम कोई तकलीफ़ मत झेलना। मैं सब कुछ करूँगा तुम बस घर में रहा करो, और मैं जब घर आया करूँ तो तुम मुस्कुरा दिया करो, और बस कपड़े उतार दिया करो, इतना ही चाहिए तुमसे।”
क्या है? हम किस धोखे में अपने आप को रखना चाहते हैं?
"नहीं, पर बच्चों की भी तो ज़िम्मेदारी होती है ना, घर में रहना होता है, बच्चों की ज़िम्मेदारी।"
आप ही ने घर में रह के, और अपनी पूरी ज़िंदगी क़ुर्बान करके जिन बच्चों को बड़ा करा है वो सब सड़कों पे नालायक घूमते दिख रहे हैं मुझे। जब भारत की युवा शक्ति की गुणवत्ता की बात आती है, तो दुनिया में सबसे निचले स्तर पर पाई जाती है। और हम तो कह यही रहे "नहीं, बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए मैंने अपना कैरियर वग़ैरह छोड़ दिया। मैं उनको घर पे पालती-पोसती थी, ताकि बच्चों की अच्छी परवरिश हो, उनका उज्ज्वल भविष्य निकले।" और बच्चे सब नालायक हैं, और ना सिर्फ़ बेरोज़गार हैं वो रोज़गार के लायक भी नहीं हैं, वो अनइम्प्लॉय्ड ही नहीं हैं वो अनइम्प्लॉयएबल हैं। और सिर्फ़ इसलिए नहीं कि अनस्किल्ड हैं, वो एटीट्यूडनली अनफ़िट हैं।
ये आपने दिया है घर में उनका पालन-पोषण करके।
क्योंकि जो माँ घर में ख़ुद भ्रम की वजह से रुकी हुई है, वो अपने बच्चों को भ्रम के अलावा और क्या देगी? वो बड़े होकर के नकारा निकलते हैं। जो वहाँ ख़ुद बंधक है, वो अपने बच्चों को आज़ादी क्या देगी? वो बड़े होकर के एक-से-एक तरीक़े के विकृत नमूने निकलते हैं।
आज से 20 साल पहले आईएम इकोनॉमिक्स में एक मिनी प्रोजेक्ट था, मैंने भी किया था डेमोग्राफिक डिविडेंड के ऊपर। तब ये बात नई-नई आ रही थी, फिर ये मेनस्ट्रीम हो गई। डेमोग्राफिक डिविडेंड का मतलब होता था, कि भारत में अब इतने सारे जो जवान लोग हैं वो खड़े होंगे, भारत की जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा जवान लोगों का होगा। तो इससे भारत आगे बढ़ेगा क्योंकि जवान लोग प्रोडक्टिव होंगे। और तुलना चीन से की जाती थी, कि चीन में बूढ़ों की संख्या बढ़ेगी, भारत में जवानों की संख्या बढ़ेगी, भारत आगे बढ़ेगा।
आज हम उस डिमॉग्राफ़िक डिविडेंड को डिमॉग्राफ़िक बर्डन बोलते हैं, क्योंकि ये जितने जवान खड़े हो गए हैं, ये ज़्यादातर किसी काम के नहीं हैं। बस ये एक काम करते हैं कि नारे लगाते हैं, ट्रेन रोकते हैं, कहते हैं "नौकरी दो, नौकरी दो, नौकरी दो!" ज़्यादातर इस लायक ही नहीं हैं कि उन्हें नौकरी दी जा सके, और ये सब घर में बैठी हुई माताओं की पैदाइश है। माता 25 साल घर में बैठी रही "मैं बच्चे पाल रही हूँ, मैं बड़ा काबिल नौजवान खड़ा करूँगी!" और वो नौजवान ऐसा खड़ा हुआ है, वो किसी काम का नहीं निकला। तो फिर आपका वो तर्क कहाँ गया, जब आपने कहा था, "बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की खातिर मैंने अपना कैरियर छोड़ दिया।" आपने अपना कैरियर भी छोड़ दिया और बच्चे भी बर्बाद निकले। अब क्या करना है? बोलो।
प्रश्नकर्ता: सर, इसमें एक बात मुझे ऐड करनी थी, जब भी ऐसे इन्सिडेंट्स होते हैं तो कहीं न कहीं घर वालों को तो एक जस्टिफ़िकेशन मिल ही जाता है कि "देखो, जैसे ही शाम हो जाती है, 6:00 बजे के बाद सूरज ढल जाता है, तो तुम दिन में ही बाहर जाओ, शाम को कहीं मत जाओ।"
आचार्य प्रशांत: अरे अगर यही खेल खेलना है, तो आप भी करिए न। जितनी बार दहेज हत्या का कोई मामला आए, जितनी बार पति द्वारा शोषण का मामला आए, उतनी बार आप भी घर में शोर मचाइए कि "देखा! रात के समय अगर घर में रुको तो पति मारता है, इसीलिए और ज़रूरी है कि मैं रात के समय बाहर निकलूँ।"
आप सब लोग आते हो कि हमारे घर वाले हमारे साथ ऐसी चालाकियाँ करते हैं, तो आप भी उत्तर देना सीखो न फिर। कहीं वर्कप्लेस में एक्स्प्लॉइटेशन हो जाता है, तो वो आपको ख़बर दिखाएँगे, "देखा-देखा! काम करने जाओगी तो एक्स्प्लॉइटेशन हो जाएगा।" तो फिर जब घर के अंदर हत्या हो जाती है, तो आप भी ख़बर दिखाइए और 100 बार दिखाइए। उनके मुँह के सामने ला-ला के दिखाइए कि "देखा घर के अंदर क्या होता है? आवर होम्स आर एक्स्ट्रीमली अनसेफ़।" आप भी करिए। अगर यही खेल खेलना है, तो यही सही।
दुनिया कहाँ जा रही है, हम कहाँ पड़े हुए हैं। क्या हो सकता था, ये राष्ट्र और क्या हुआ पड़ा है। राष्ट्र भी नहीं पूरा, उत्तर भारत ज़्यादा। मैं अभी दक्षिण में हूँ, कुछ हुआ अभी तो ब्लड सैम्पल देना था, एक महिला लेने आई। ये कभी नहीं हुआ, मेरे पूरे जीवन में मेरा ब्लड सैम्पल लेने कभी कोई महिला नहीं आई। क्योंकि काम ख़तरे लगता है न, पता नहीं किसके घर में घुसना है, उसके कमरे में जाकर उसका सैम्पल लेना है। दबोच ही ले तो? और उत्तर में होता है खूब, कि वो सही में घुस जाए उसका सैम्पल लेने, बिस्तर पर पड़ा है वो उसको बिस्तर पे ही खींच लेगा।
ये हमारे उत्तर भारत में खूब चलता है, "घर में रहो, बाहर ख़तरा है।"
अरे, बाहर किससे ख़तरा है?
बाहर उन्हीं से तो ख़तरा है न, ये जो घर में दबोचा-दबोची करते हैं। यही हैं जिनसे बाहर ख़तरा है। जब ये बाहर निकलकर इतने ख़तरनाक हो जाते हैं, तो सोचो ये घर में कितने ख़तरनाक होंगे।
अगर वर्कप्लेस एक्स्प्लॉइटेशन हो रहा है, तो कौन कर रहा है? वही आदमी तो कर रहा है न, जो कभी किसी घर में रहता है। तो जब वो वर्कप्लेस पर इतना बड़ा दानव है, तो अपने घर में कितना बड़ा दानव होगा। जब वो अपनी सेक्रेटरी का या अपनी कॉलीग का सेक्शुअल एक्स्प्लॉइटेशन कर सकता है, तो अपनी वाइफ़ का कितना करता होगा।
यहाँ बहुत साधारण-सी बात होती है, आप पेट्रोल पम्प पर चले जाइए, वहाँ पर कोई लड़की आपका पेट्रोल भर रही होगी। गाड़ी, कैब, ऑटो ये लड़कियाँ चला रही होती हैं। यहाँ बहुत साधारण-सी बात है, कोई नहीं छेड़छाड़ कर रहा। वेट्रेस होती हैं, लड़कियाँ होती हैं।
प्रश्नकर्ता: सर, मैंने तो देखा है कि बट घर में जो आदमी होते हैं, उनसे ज़्यादा माँएँ बहुत ज़्यादा लिमिट कर देती हैं रोल अपने बेटियों का।
जैसे मैं आपको एक पर्सनल बताना चाहती हूँ, कि मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, उसमें बहुत सारी लड़कियाँ थीं जो बहुत इंटेलिजेंट थीं, बहुत पोटेन्शियल था उनमें आगे जाने का। लेकिन उनको कॉलेज में, मतलब जो एक छोटी जगह थी, सोलन, हिमाचल प्रदेश उसके बाहर ही नहीं भेजा। उन्होंने कहा कि "हमारी लड़की सोलन की है, ज़्यादा से ज़्यादा चंडीगढ़ जाएगी, दिल्ली मैक्सिमम। पर कहीं साउथ इंडिया या बाहर कहीं बहुत दूर जाने का नहीं था कभी भी।"
और आज मैं देखती हूँ वो सब के सब हाउज़वाइव्स हैं, बच्चे हैं उनके। विच आइ डोंट नो, वो कहते हैं "उनका पर्सनल चॉइस है।" लेकिन मुझे लगता है कहीं न कहीं उनकी ख़ुद की मम्मीयों ने उनको बहुत लिमिट किया है। क्योंकि वो शुरू से उनको ऐसे मोल्ड कर रहे थे।
आचार्य प्रशांत: अगर बेटी आज़ाद उड़ गई तो ये माँ के लिए एक तल पर सोचिए, ममता वग़ैरह एक तरफ़ रखिए। हम जैसे होते हैं स्वार्थ के पुतले, ईर्ष्या के पिंड, सोचिए माँ के लिए कितने घोर अपमान की बात है कि लड़की वो ज़िंदगी जी गई जिस ज़िंदगी को माँ ने कहा था कि "अरे, मुझे डर लगता है, ये ज़िंदगी तो ख़तरनाक है।"
चॉइसेज़ की बात करी न आपने, कि “चॉइस कहते हैं।” हाँ तो माँ ने चॉइस करी थी कि "मैं बंधन चुनती हूँ, मैं गुलामी चुनती हूँ।" और माँ कह रही है, "मैंने बिल्कुल सही चॉइस करी है, आई ऐम ऐन इंटेलिजेंट वुमन। देखो, मैंने कितनी अच्छी चॉइस करी है।" और उसी की लड़की अगर ये प्रमाणित कर दे कि तुम्हारी चॉइस मूर्खता की थी, कायरता की थी, तो माँ के लिए बड़े अपमान की बात हो जाती है न। इसीलिए माँ सबसे पहले अपनी लड़की का भविष्य चौपट करती है।
आपने जो भी लाइफ़ चॉइसेज़ करीं, अगर आपकी बेटी उसके बिल्कुल विपरीत जाकर के चॉइसेज़ करे और तब भी एक सुकून भरा और सफल जीवन जी जाए, तो माँ के मुँह पे तो थप्पड़ जैसी बात हो जाएगी। मां को ख़ुद से पूछना पड़ेगा कि मैं कितनी बड़ी कायर थी और कितने भ्रम में थी कि मैं ऐसी फूहड़ चॉइसेज़ कर बैठी। और देखो वो बेटी है, वो माँ को फिर स्वीकार करना पड़ेगा कि माँ ने अपनी ज़िंदगी बर्बाद करी है।
तो एक सीमा तक ठीक होता है कि “बेटी, तू पढ़ ले।” लेकिन बेटी ज़्यादा पढ़ने लग जाए, तो माँ को बड़ी तकलीफ़ हो जाएगी। बाप को भी हो जाएगी, दोनों को हो जाएगी। एक सीमा तक होगा: “हाँ बेटी, तू आगे निकल, तू आगे निकल,” लेकिन बेटी वो सीमा लांघ करके और आगे निकल जाए, तो माँ-बाप दोनों दुश्मन हो जाएँगे। अपवाद होते हैं अपवादों की बात नहीं कर रहा, अपवादों को नमस्कार है। मुझे गाली-गलौज करने मत आ जाइएगा, वैसे आ भी जाए तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
प्रश्नकर्ता: सर, इसका ऑपोज़िट भी मैंने देखा है काफ़ी। कि कुछ केसेज़ में “माएँ बोलती हैं या माँ-बाप बोलते हैं कि तू एमबीए कर ले, हम पैसे देंगे,” बट लड़की ख़ुद बोलती है कि “नहीं मुझे तो शादी करनी है।” और ये मॉडर्न, ऐसे भी मैंने बहुत देखा है।
आचार्य प्रशांत: ऐसी संस्कारी लड़की को प्रणाम है।
प्रश्नकर्ता: सर, वो बोलते हैं कि ये मॉडर्न कॉरपोरेट वुमन का जो रोल है, ये लड़कियों को मैस्क्युलिन एनर्जी दे रहा है, ऐसे करके बोलते हैं। और फिर जब ऐसे इंसिडेंट्स होते हैं कि वर्कप्लेस हरासमेंट हो गया, सेक्सुअल फेवरज़ के लिए प्रॉब्लम हो रहें तो, वो इस चीज़ को लेके अपना डिसीज़न जस्टिफ़ाई करती हैं कि हमने ठीक किया।
आचार्य प्रशांत: और ये तो सौ में से एक बार होता है। और जो 99 बार घर में मैरेटल रेप होता है, उसका क्या?
मैरेटल रेप इतना आम है और इतना इंस्टिट्यूशनलाइज़्ड है कि ज़्यादातर महिलाओं को पता भी नहीं होता कि वो जिसको सेक्स समझ रही हैं, वो रेप है। उनके भीतर ये बात डाल दी गई होती है कि “पति का तो हक़ है ना ज़बरदस्ती करने का, पति है तो ज़बरदस्ती तो कर सकता है ना, उसका तो हक़ है।” उनको पता भी नहीं चलता कि पति जो कर रहा है, वो बलात्कार है।
मैं दूर-दराज की नहीं बात कर रहा हूँ। मेरा बैचमेट, मेरे हॉस्टल का दोस्त, अच्छे धनी परिवार का लड़का, उसकी बहन को मार डाला था दहेज के लिए। ये अपवाद नहीं है, ये हर जगह हो रहा है।
हम बात नहीं करते पर बात हर जगह है, ठीक वैसे, जैसे आपको कहीं बड़े-बड़े स्लॉटर हाउस दिखाई देते हैं क्या? नहीं दिखाई देते। तो हमें लगता है, सब ठीक ही ठीक है। कहीं पर जीव हत्या या क्रूरता हो नहीं रही है। वो सब छुपा के करा जाता है दूर, ताकि आम आदमी की नज़र ना पड़े। ये जो बड़े स्लॉटर हाउसेज़ होते हैं ना, ये दूर छुपा के बनाए जाते हैं पर हो बिल्कुल रहा है, यूबिक्विटस है।
5 करोड़ लड़कियाँ भारत की आबादी से ग़ायब हैं (यूएनएफ़पीए डाटा)। तो हर गली-मोहल्ले में भ्रूण हत्या हो रही है, बस हम उसकी बात नहीं करना चाहते। हर परिवार में भी हो रही होगी। कोई भी व्यक्ति अगर अपने पूरे कुटुंब में पूरा खोज-खंगाल के देखेगा, तो उसे कोई न कोई मामला मिल जाएगा कि ये देखो, यहाँ अबॉर्शन कराया गया है लड़की को मारने के लिए। कई बार तो अपने घर में ही मिल जाएगा, घर में ना मिले तो अपने कुनबे में मिल जाएगा, कुनबे में ना मिले तो अपनी सोसाइटी या मोहल्ले में मिल जाएगा। इससे ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा।
और फिर हम बोलते हैं कि “वुमन आर अनसेफ़ ऐट वर्कप्लेसेज़,” रियली? घर में तो उसको जन्म भी नहीं लेने दे रहे हैं अनसेफ़ वो ऑफिस में है क्या? आप थोड़ा-सा ना इस पर रिसर्च करिएगा, कि ये जो पूरा खेल है “द मिसिंग जेंडर,” ये कहाँ है? आपको बहुत हैरत वाली कुछ बातें मिलेंगी।
दक्षिण भारत में नहीं होता ये, पूर्व भारत में भी नहीं होता। ये उत्तर और पश्चिमी भारत में होता है। और ये तथाकथित निचले वर्णों और जातियों में भी नहीं होता। ये सब ज़्यादा से ज़्यादा होता है तथाकथित उच्च वर्णों और संस्कारी जातियों में उनमें होता है ये (येल ग्लोबल हेल्थ रिव्यू, जर्नल)। मैं नहीं कह रहा, आँकड़े कह रहे हैं।
और मुझे बहुत हैरत की बात लगी थी, उत्तर प्रदेश का उदाहरण लेते हैं, उत्तर प्रदेश के जिन ज़िलों में सेक्स रेशियो सबसे कम है, उनमें कुछ वो जिले हैं जो सबसे धार्मिक जिले हैं, जो जाने ही जाते हैं धर्म के लिए। संस्कारी जिले सबसे ज़्यादा। वही वो जिले होंगे जहाँ पर और ज़्यादा ये होता है कि “तुम बाहर निकल के काम नहीं करोगी, तुम घर पर रहोगी।”
जितना घर पर रहेगी, उतना आसान शिकार बनेगी। और क्या होगा?
और कुछ?
प्रश्नकर्ता: नो सर, थैंक यू।