आचार्य प्रशांत: कोई कहता है कि, ‘नॉलेज एंड विज़डम डू नॉट गो टूगेदर (ज्ञान और बुद्धि एक साथ नहीं चलते)।‘ थोड़ा समझना पड़ेगा। इसका अर्थ ये नहीं है कि ‘दे आर म्यूचुअली एक्सक्लूसिव (दोनों परस्पर अनन्य हैं)‘, कि इन दोनों की आपस में कोई दुश्मनी है, कि जहाँ नॉलेज (ज्ञान) होगा, वहाँ विज़डम (बुद्धि) हो ही नहीं सकती। ऐसी बात नहीं कही जा रही है। जब कहा जाता है कि, "नॉलेज एंड विज़डम डू नॉट गो टूगेदर", तो उसका इतना ही अर्थ है कि ये दोनों अतुलनीय हैं। इन दोनों की आपस में कोई तुलना नहीं हो सकती। असंगत नहीं हैं, अतुलनीय हैं। तो कोई ये ना सोचे, जो वाइज़ (बुद्धिमान) आदमी है उसके पास तो नॉलेज (ज्ञान) तो होता ही नहीं। ये बड़ी भ्रान्ति हो जाएगी। जब आप कहते हैं, "नॉलेज एंड विज़डम डू नॉट गो टूगेदर", इसका अर्थ ये नहीं है कि जहाँ विज़डम है, वहाँ से नॉलेज उड़ जाएगा। वो असंगत नहीं हैं, फिर कह रहा हूँ, अतुलनीय हैं। वो अलग-अलग आयाम हैं। ठीक, वैसे जैसे गंध की और वज़न की तुलना नहीं हो सकती। ठीक वैसे जैसे तापमान की और घनत्व की तुलना नहीं हो सकती। ठीक वैसे जैसे एक्स एक्सिस और वाई एक्सिस की तुलना नहीं हो सकती क्योंकि वो आयाम ही हैं अलग-अलग। ठीक उसी तरीके से विज़डम की और नॉलेज की कोई तुलना नहीं हो सकती, वो अलग-अलग आयाम हैं।
नॉलेज अलग आयाम है रूप का, आकार का, विश्व का, मन का, मानसिक गतिविधि का और विज़डम आयाम है वो जहाँ से मन स्वयं उदभूत होता है। ये दो अलग-अलग हैं। और दो ऐसे अलग हैं जिसमें एक, दूसरे में समा सकता है। माइंड इज़ फंक्शनिंग इन नॉलेज, ईममर्स्ड इन विज़डम (मन ज्ञान में काम कर रहा है, बुद्धि में डूब कर)। ये संभव है और यही जीने की कला है क्योंकि जब तक शरीर है, तब तक ज्ञान के लिए पूरा स्थान है। नॉलेज माने ज्ञान। जब तक शरीर है, ज्ञान के लिए पूरा स्थान है, ज्ञान की आवश्यकता है, सब कुछ ज्ञान ही ज्ञान है। मन ज्ञान में रहे, बोध में डूबा हुआ। मन ज्ञान का प्रयोग कर ले परन्तु बोध की स्थिरता में।




