आचार्य प्रशांत: जिसको तुम आम हिंदू बोलते हो उसका अपने धर्म की केंद्रीय किताबों से कोई सम्बन्ध ही नहीं रह गया है और यही इस समय धर्म के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।
आपको अगर झूठमूठ के उग्र नारे लगाने हैं धर्म की रक्षा के लिए, तो आप कह सकते हैं कि आपके धर्म को किसी दूसरे धर्म से बहुत ज़्यादा ख़तरा है। सनातन धर्म में हिंदू धर्म को किसी दूसरे धर्म से बाद में होगा ख़तरा, पहला ख़तरा उसे हिन्दुओं से ही है। क्योंकि जिसको आप हिंदू बोलते हो वो नाम का हिंदू है। उससे पूछो, "तू कैसे है हिंदू?" तो उसके पास बस एक बात होगी बोलने के लिए, "मेरे माँ-बाप हिंदू हैं तो मैं भी हिंदू हूँ।" बोलें, "हिंदू होने का मतलब क्या है?" तो वो बोलेगा, "होली-दिवाली मना लेना, राखी बाँध लेना ये हिंदू होने का मतलब है।"
बोलो, "भई! धर्म है, धर्म के पीछे दर्शन होता है, कोई बात होती है, कोई जीवन दृष्टि होती है, वो क्या है तेरी? जिसको तू हिंदू धर्म बोलता है उसकी दृष्टि क्या है, दर्शन क्या है?" तो वो नहीं बता पाएगा, उसे पता ही नहीं। और ऐसा धर्म बहुत दूर तक नहीं जा सकता जिसके मानने वालों को उसकी किताबों का ही पता न हो। बहुत ज़ाहिर, एकदम स्पष्ट बात है।
अभी कहा सनातन धर्म फिर कहा हिंदू धर्म, उसी को वैदिक धर्म भी बोलते हो। ये कैसा वैदिक धर्म है जिसका पालन करने वालों के घरों में वेद पाए ही नहीं जाते? चलो पूरे-पूरे वेद तुम नहीं पढ़ पाते या आवश्यक नहीं समझते, कोई बात नहीं। पर वेदों के जो सबसे सारगर्भित अंश हैं, वेदों का जो उच्चतम दर्शन है, वो जिन अत्यंत लघु और संक्षिप्त किताबों में मिलता है उनको तो अपने घर ले आओ, उनको तो पढ़ लो। उनको पढ़े बिना, उनको जाने बिना तुम किस अधिकार से अपने आपको हिंदू बोलते हो? बोलो।
या बस ऐसे ही, "मैं हिंदू हूँ!" फिर तो कोई भी हिंदू है। कोई भी हो सकता है फिर हिंदू। लेकिन फिर उस शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, बहुत खोखला हो जाएगा। कोई अर्थ होना चाहिए न?




