
Question: Acharya Ji, Pranaam! While reading and meditating on Nitnem, something happened within me which is difficult to explain. And this happening is same while we were reading Ashtavakra Gita and Upanishads.
These words do not create any images, but they take away my chains and cut me down. Whatever…












कुरबाणु कीता तिसै विटहु, जिनि मोहु मीठा लाइआ ॥ – गुरु नानक



ए मन चंचला चतुराई किनै न पाइआ ॥चतुराई न पाइआ किनै तू सुणि मंन मेरिआ ॥एह माइआ मोहणी जिनि एतु भरमि भुलाइआ ॥


नानक निर्गुणी गुण करे गुणवतीय: गुण देह

बहुता कहीऐ बहुता होइ। असंख कहहि सिरि भारु होइ॥
~गुरु नानक
आचार्य प्रशांत: जितना कहोगे उतना कम पड़ेगा। सत्य के विषय में कहने की तो इच्छा खूब होगी तुम्हारी पर जितना कहोगे उतना कम पड़ेगा। ये भी कहोगे कि वो अनंत है, असंख्य है, असंख्यातीत है, ये कहना भी कम

वाज़े पंच शब्द तित तित घरी सभागे

सुणिए हाथ होवै असगाहु

वक्ता: आनंद साहिब से है कि:

तू घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समानी
~ रेहरासि साहेब (नितनेम)
प्रश्नकर्ता: कम्पेरिज़न (तुलना) नहीं हो सकती है, कभी-कभी हम अपने को अलग मान कर ही सोचते हैं कि मुझे उनसे ही बड़ा चाहिए। मतलब अगर मेरी

जलि थलि महीअलि भरिपुरि
लीणा घटि घटि जोति तुम्हारी
~ नितनेम


“ सुणए पोहि न सकै कालु ”सुनने वाले को काल नहीं पा सकता।

मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूति ॥ ~ पौढ़ी (जपुजी साहिब)
अनुवाद: संतोष को वैसे ही मन के समीप धारण करो जैसे कुंडल, विनय को ऐसे साथ लेकर के चलो जैसे तुम्हारा भिक्षा पात्र, और ध्यान को देह पर लगाने वाली भस्म।

प्रश्नकर्ता: सर, यहाँ पर बोल रहे हैं कि;
बाय हिज़ कमांड बॉडीज़ आर क्रिएटेड; हिज़ कमांड कैन नॉट बी डिसक्राइब्ड।
(उसके आदेश से शरीर बनाया गया है; उसके आदेशों का विवरण नहीं किया जा सकता है)

सभना गला समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे*∼ पौड़ी : अनंदु साहिब, नितनेम ∼*

साची लिवै बिनु देह निमाणी

“गावनी तुधनो चितु गुपतु लिखि

वक्ता: नानक कई बार कहते हैं कि वो जिसको चुनता है उसी पर अनुकम्पा होती है। तो सवाल है कि वो किसको चुनता है। हम इसपर कई बार बात कर चुके हैं।
वो किसको चुनता है?

मंनै सुरति होवै मनि बुधि


बंदि खलासी भाणै होइ ॥ होरु आखि न सकै कोइ ॥


चुपै चुप ना होवई जे लाइ रहा लिव तार


प्रश्न: ‘अनहता सबद बाजंत भेरी’, कृपया इसका अर्थ बताएँ?

एह वसतु तजी नह जाई नित नित रखु उरि धारो ॥
Ėh vasaṯ ṯajī nah jāī niṯ niṯ rakẖ ur ḏẖāro.
This thing can never be forsaken; keep this always and forever in your mind.
Raag Mundaavanee, Fifth Mehl
Rahras Sahib, Nitnem (Guru Granth Sahib, Page 1429)
Question: Pranaam…
ऊडे ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥Ūde ūd āvai sai kosā ṯis pācẖẖai bacẖre cẖẖariā.The crane flies hundreds of miles, leaving its young one behind.
तिन कवणु खलावै कवणु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥३॥Ŧin kavaṇ kẖalāvai kavaṇ cẖugāvai man mėh simran kariā. ||3||…
sir sir rijak sambaahay thaakur kaahay man bha-o kari-aa.
~ Rehraas Sahib, Fifth Mehala (Nitnem)
The Lord and provides sustenance to everyone, then why should you worry my mind?
~ Rehraas Sahib, Fifth Mehala (Nitnem)
सिर सिर रिजक सम्बाहयठाकुर कहाय मन भाओ करीआ
~ रहरास साहिब, पाँचवा महला…
अउध घटै दिनसु रैणारे ॥मन गुर मिलि काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥जा कउ आए सोई बिहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥
~ राग गौरी पूरबी, पाँचवा महला, सोहिला साहिब
Translation:
The life passes day and night.My mind, meet the Guru so that he sets things right.…
जो किछ कराय सो भला कर माने-ई हिकमत हुक्म हुक्म चुकाइये
~ तिलांग, पहला महला, शब्द हज़ारे (नितनेम)
Those God-Oriented people will tell that to attain God, we should accept as good whatever He does, and stop our own cleverness and will.
~ Tilang, 1st Mehla, Shabad Hazare (Nitnem)
Question:…
ਕਰਮੀ ਆਵੈ ਕਪੜਾ ਨਦਰੀ ਮੋਖੁ ਦੁਆਰੁ ॥
karmee aavai kaprhaa nadree mokh du-aar
By good karma, the Saropa, which is this body, the robe of honor, is obtained, and by His kindness, the door to salvation opens.
~ Guru Granth Sahib 2-5 (Japji Sahib, Nitnem)
✥ ✥ ✥
Questioner (Q):…
गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥Gobinḏ milaṇ kī ih ṯerī barīā.This is your chance to meet the Lord of the Universe.
अवरि काज तेरै कितै न काम ॥Avar kāj ṯerai kiṯai na kām.Other efforts are of no use to you.
मिलु साधसंगति भजु केवल नाम…
आयहू हर रस कर्मी पाइआ सतगुर मिलाई जिस आय
~तिलांग, पहला महला, शब्द हज़ारे ( नितनेम)
The Essence: Name of the Lord, His love, is obtained by good luck, good deeds,
when the True Guru: the True Master, meets and tells you to recite the Name of God.
~ Tilang,1st…
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग। ~ जपुजी साहिब (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: फ़्री विल (मुक्त इच्छा) भी एब्सोल्यूट्ली फ़्री (पूर्णत: मुक्त) है। आपकी जो फ़्री विल है, वो भी इस मामले में तो बाउन्डेड (सीमित) है ही कि वो आपकी नहीं है। जो आपकी इच्छा है वो तो…
गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।।
~ नितनेम (अनंदु साहिब)
बाइ गुरुज़ ग्रेस द लॉर्ड अबाइड्स विदिन द माइंड, एंड वंस प्री-ऑर्डेंड डेस्टिनी इज़ फ़ुलफ़िल्ड।
“गुरु के अनुग्रह से ईश्वर मन में बसता है, और व्यक्ति पूर्वनिर्धारित नियति को प्राप्त कर लेता है।”
प्रश्नकर्ता: ग्रेस (अनुग्रह) और प्री-ऑर्डेंड…
वजाइया वाजा पउण नउ दुआरे परगट कीए दसवा गुपतु रखाइआ।। ~ नितनेम (अनंदु साहिब)
आचार्य प्रशांत: ‘आनन्द साहिब’ से है कि उसने शरीर के वाद्य यन्त्र में साँस फूँकी और नौ द्वार खोल दिये लेकिन दसवें को छुपाकर रखा। दसवाँ द्वार कौनसा है? कौनसा हो सकता है दसवाँ द्वार? मन…
विणु गुण कीते भगति न होई। अर्थ: बिना गुण के भक्ति नहीं हो सकती। (जपुजी साहिब)
आचार्य प्रशांत: आप दीवार के पास बैठे हैं और आप ऊँघ जाते हैं और आपके सिर पर दीवार लगती है ज़ोर से। क्या आप दीवार से कहते हो कि कमीनी मेरे ही घर की…
दुख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ~ शबद हज़ारे (नितनेम)
मैं उसकी सेवा करता हूँ, जो मेरे सारे दुखों को विस्मृत कर देता है और जो सदा-सदा से देने वाला है।
आचार्य प्रशांत: मैं उसकी सेवा करूँगा, करता हूँ, जो मेरे सारे दुखों को विस्मृत कर देता है और जो…
”हुकमी हुकमु चलाये राहु।” ~ जपुजी साहिब
आचार्य प्रशांत: वो अपने हुक्म से राह पर चलता है। राह तो सामने ही है। जहाँ खड़े हो, वहीं से चलती है। हुक्मी स्वभाव ही है, तो कहीं दूर जाना नहीं है पूछने। हुक्म तब भी उल्टा-पुल्टा हो जाता है, क़दम फिर इधर-उधर…
मोह हमेशा कड़वा होता है। मोह का अर्थ है अपने से बाहर किसी से…
सभ महि जोति जोति है सोइ
सब में प्रकाश है
~ सोहिला (नितनेम)
आचार्य प्रशांत: कल दोपहर जब हम लौट रहे थे कॉलेज से तो गाड़ी में कृष्ण कुछ बातें कह रहे थे, फिर मैंने सी.डी. प्लेयर बन्द कर दिया। जब तक वो जो कह रहे थे, वो चल रहा…
तव चरनन मन रहै हमारा॥
अपना जान करो प्रतिपारा॥
~ चौपाईसाहब (नितनेम)
अर्थात, हे! अकाल पूरक, अपना हाथ देकर मेरी रक्षा करो। मेरी मन की यह इच्छा आपकी कृपा द्वारा पूरी हो कि मेरा मन सदा आपके चरणों में जुड़ा…
हुकमी हुकमु चलाये राहु।
~ नितनेम
आचार्य प्रशांत: वो अपने हुक्म से राह पे चलाता है। राह तो सामने ही है। जहाँ खड़े हो वही से…
आचार्य प्रशांत: बात बहुत सीधी है, गुण वह सब कुछ है जो किसी भी चीज़ के बारे में, घटना के बारे में, इंसान के बारे में कहा जा सकता है, वह गुण है׀
जिस किसी वस्तु, व्यक्ति के साथ आप…
वक्ता:जो हासिल किया नहीं जा सकता, जो बात दुष्प्राप्य है, वो भी सुनने से हाथ आ जाता है। जो तुम्हें अन्यथा कतई न मिलता, वो सुनने से मिल जाता है। क्या आशय है?
श्रोता1: सुनने से कुछ मिलेगा की जगह इसको ऐसे…
प्रश्न है कि दसवां द्वार कौन सा है? कौन सा हो सकता है दसवां द्वार?
मन का है। नौ द्वार हैं शरीर के जो बाहर…
वक्ता: सवाल यह है कि ‘तुम’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, ‘तुम्हीं विद्यमान हो,’…
“मनु ताराजी चितु तुला तेरी सेव सराफु कमावा”
~ नितनेम (शबद हज़ारे)
वक्ता: मन तराज़ू, चित तुला है — ‘मन’ तराज़ू है, ‘चित’ तुला है, और ‘तेरी सेवा’ वो कमाई है जो सर्राफ़ा इस पर तोल-तोल कर करता है। नानक के यहाँ पर पुश्तैनी काम यही था। अब तो पढ़…
वक्ता: सुनने वाले को काल नहीं पा सकता। कबीर ने भी कहा है ये और जितने सरल तरीके से कबीर कहते हैं उतने ही सरल शब्दों में कि,
काल-काल सब कहें, काल लखे…
सर, तो जो आदेश आपके शरीर को बना रहा है…
आचार्य प्रशांत: आपका शरीर…
वक्ता : सभना गला समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे
किउ विसारे। क्यों विस्मृति में जाते…
(Without the true love of devotion, the body is without honour)
वक्ता: शरीर किसलिए है? दो शब्दों में शिवसूत्र स्पष्ट कर देते हैं। शरीर क्या है? हवि है। शरीर यज्ञ की ज्वाला में समर्पित होने हेतु पदार्थ है। यज्ञ क्या? यज्ञ वो…
रहससि साहिब (नितनेम)
वक्ता: नानक कह रहे हैं कि जो कौन्शिअस (सचेत) मन होता है, – विचारशील मन – वो दृश्यों में और ध्वनियों में चलता है। तो उसको उनहोंने इंगित किया है ‘चित्र’ से। और जो छुपा हुआ मन…
वक्ता: हाँ। ज़्यादा…
(The faithful have intuitive Awareness and Intelligence)
वक्ता: पश्चमी दार्शनिक – स्पिनोज़ा, उसने एक शब्द प्रयोग किया है – इनटियूटिव प्री-अंडरस्टेंडिंग (सहज ज्ञान युक्त पूर्व समझ)। उसने कहा वही असली चीज़ है। कोई भी बात समझ में उसे ही आती है…
अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ ॥
~ नितनेम (शबद हज़ारे)
आचार्य प्रशांत: “अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ”
दो बातें यहाँ पर साफ़-साफ़ समझो। ‘अंत’ से यहाँ पर आशय, समय में अंत नहीं है। हम ‘अंत’ का मतलब समझते हैं – समय में आगे का कोई बिंदु। अंत से…
वक्ता: उसकी अपनी कोई इच्छा होती नहीं। परमात्मा की अपनी कोई इच्छा नहीं है। इच्छा का अर्थ ही होता है- ‘अपूर्णता’। इच्छा का अर्थ ही होता है- ‘लक्ष्य’ और ‘खालीपन’। परमात्मा कोई इच्छा कर सकता ही नहीं।…
जिन मिलिया प्रभु आपणा, नानक तिन कुबानु॥ ~ गुरु नानक
आचार्य प्रशांत: मन का एक कोना मन के दूसरे कोने पर न्यौछावर है। एक मन है और दूसरा मन है, और दोनों की अलग-अलग दिशाएँ हैं। नानक कह रहे हैं, ऐसा मन जो प्रभु की दिशा में है, प्रभु पर…
अनुवाद: मौन धारण करने से मन चुप नहीं होता और ना ही प्रभु से मिलाप होता है , चाहे मन लगातार ध्यान में लगा रहे!
वक्ता: चुपै चुप ना होवई, इसमें हमें कोई समस्या नहीं हैं| बात…
सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ ॥२॥
(श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी, अंग ६६०)
वक्ता: सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ|
सुन-सुन कर मैं पार उतर गयी| सुन-सुनकर पार उतर गयी| (‘सुन’ शब्द पर ज़ोर देते हुए)
क्या अर्थ है इसका? सुन-सुनकर तर गयी|
सुनने का अर्थ है-…
वक्ता: मंदिर से जो घंटे, घड़ियाल, ढोल, नगाड़े की आवाज़ आ रही है; वो ‘अनहद’ शब्द है | घंटा जैसे बजता है, अच्छा है | शब्द वही अच्छा जो जब बजा तो ऐसे बजा जैसे चोट करी हो, और फिर क्योंकि…
When someone calls us ugly or dumb, it can feel as if our confidence has been taken away. But others are outsiders; they cannot know us as well as we can know ourselves. The trouble begins when we do not know ourselves, so we start looking at ourselves through others’ eyes. Self-knowledge here simply means being honest with ourselves about where our likes, fears and desires come from. What would change if we looked at ourselves directly, and not through others’ opinions?

नवरात्रि में देवी और असुरों की कथा पढ़कर सवाल उठता है: जब दोनों ही प्रकृति हैं, तो लड़ाई किससे है? लड़ाई प्रकृति से नहीं, उस अधूरेपन से है जो मानता है कि दुनिया को भोगकर वो पूरा हो जाएगा। देवता और असुर दोनों यही चाहते हैं। अंतर बस इतना है कि चोट खाकर देवता देखते हैं और लौट आते हैं, असुर फिर वही दोहराते हैं। हम भी रोज़ भोजन, लोगों और चीज़ों से पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और ‘सब ब्रह्म है’ कहकर विवेक छोड़ देना भी उसी अहंकार की चाल है। चोट हमें भी लगती है; क्या हम उससे सीखते हैं?

Many of us interrupt, rush to make our point, or change the topic when a conversation comes too close. We call it a lack of patience or discipline. But impatience in a conversation is often fear: when what we hold within is borrowed belief, every question could shatter it. The same confusion makes us take our instincts and feelings as ourselves, though they are only the body’s chemistry. If we looked honestly at what we hold, would a question still feel like an attack?

Physical weakness does not stay physical. It becomes mental weakness, and the ego, which turns everything into an identity, starts saying “I am weak” because that line brings support and spares it responsibility. Visible strength works even unused: it keeps the opponent outside wary and silences the one within, who can no longer claim to be helpless. Keeping the body strong is therefore a spiritual matter, not vanity. Are we holding on to weakness because it is convenient?

Many Indian parents keep their children, and especially their daughters, away from sport, even where coaches and facilities exist. The barrier is often not outside but in the parent’s own ideas: poor returns, uncertainty, and fixed notions of what a girl’s life must be. Blaming our own parents does not help either; our life is now our responsibility. Parenting is a decision of the greatest responsibility, and it begins with self-love. Can we love a child if we cannot love ourselves?

कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?

35 की उम्र आते ही खिलाड़ी महिला से कहा जाने लगता है कि अब खेल छोड़ो, बच्चों को मौका दो। हम मान लेते हैं कि यह उम्र और शरीर की मजबूरी है। पर ध्यान से देखें तो शरीर का तर्क टिकता ही नहीं। असल दबाव उस सिखाई गई मान्यता का है जो महिला को उसके शरीर और उससे जुड़ी भूमिकाओं से ही तौलती है, और जिसे हम अपनी ही सोच मान बैठे हैं। जो आवाज़ें हमें बताती हैं कि हमारी ज़िंदगी का क्या करना है, क्या हम ईमानदारी से देख पाएँगे कि वे आवाज़ें किसकी हैं?

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…