आचार्य प्रशांत: विचलन कुछ नहीं होता है। तुम्हारा जैसा मन है न, वो उधर को ही भाग लेता है।
(श्रोताओं से प्रश्न पूछते हुए) यहाँ ऐसे कितने लोग हैं जो विचलित हो जाते हैं, करना कुछ और चाहते हैं और करने कुछ और लगते हैं?
(ज़्यादातर श्रोतागण हाथ उठाते हैं)
तुम जो कह रहे हो कि, “हम विचलित हो जाते हैं, करना कुछ है, चल कहीं और देते हैं”, तुम कहीं विचलित नहीं होते हो, तुम उधर को ही जाते हो जिधर जाने का तुमने अपने मन को प्रशिक्षण दे दिया है।
तुम्हारा कुत्ता है, वो तुम्हारे साथ-साथ चल रहा है। और साथ-साथ चलते-चलते उसको थोड़ी दूर पर कुछ माँस पड़ा हुआ मिल गया। अब तुम कितनी कोशिश करो कि वो तुम्हारे साथ चले, तुम उसकी ज़ंजीर खींच रहे हो, वो उधर को ही भाग रहा है। क्या तुम ये कहोगे कि वो विचलित हो रहा है?
वो विचलित थोड़े ही हो रहा है, उसकी पूरी शिक्षा ही यही है कि माँस खाओ। उसका पूरा मन ही ऐसा है। दिन-रात, जन्म से ही, आनुवंशिक रूप में उसने यही कन्डिशनिंग पाई है कि माँस की ओर आकर्षित हो जाओ।
तुम भी वही करते हो।




