प्रश्न: सर, आपकी ऐसी सोच कैसे बनी कि परीक्षा के परिणाम पर नहीं, परीक्षा की पढ़ाई पर ध्यान दें?
वक्ता: मुझे ज़िंदगी में कभी ऐसा नहीं लगा, कभी भी, कि अगर मैं किसी परीक्षा में फेल हो जाऊँगा, तो मेरी कोई हैसियत नहीं रहेगी|
श्रोता १: ये सोच कहीं से तो आई होगी न?
वक्ता: कहीं से नहीं आई| बच्चा होता है, वो भी ठीक मेरे जैसा होता है| उसे भी नहीं लगता कि मझमें कुछ कमी है| बच्चे के अन्दर ये सोच डाली जाती है कि अगर परीक्षा का परिणाम अच्छा नहीं आया तो तेरी कोई हैसियत नहीं है| मैं बस भाग्यशाली हूँ कि मेरे अन्दर वो बात नहीं डाली गई| बच्चों के साथ अन्याय ये हो जाता है कि उनके माँ-बाप बिल्कुल नासमझ हैं| वो ख़ुद हीनता से ग्रस्त होते हैं, और वो अपनी हीनता बच्चे पर भी लाद देते हैं| आजकल तो इतने छोटे-छोटे से बच्चों को माँ-बाप घुड़सवारी सिखा रहे हैं| क्यों? क्योंकि बापू जी खुद कभी ज़िन्दगी में गधे पर नहीं बैठ पाए|
(श्रोतागण हँसते हैं)
तो बच्चे को घोड़े पर बैठा रखा है, और बच्चा चिल्ला रहा है|
(श्रोतागण हँसते हैं)




