प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पर्सनल टाइम (निजी समय) के ऊपर कुछ बताया हुआ है और उसमें ऐसा है कि जैसे हर एक क्षण जो आ रहा है, वह दूसरे को अर्पित कर दीजिए, उसको बचाइए मत ख़ुद के लिए। और दूसरी ओर कुछ उक्तियाँ हैं जैसे, "अलोननेस इज़ ए सैनिटी"। तो इसमें मुझे विरोधाभास लग रहा था। तो ये क्या है? इन दोनों में विरोधाभास हैं मेरे मन में कुछ, पर ऐसा भी लगता है कि दोनों शायद एक ही चीज़ हैं।
आचार्य प्रशांत: जिसको आप पर्सनल टाइम बोलते हो न, निजी समय, उसका ताल्लुक अलोननेस (अकेलापन) से होता ही नहीं है। अलोननेस का मतलब होता है — कैवल्य, आत्मिकता, निजता। समझ गए? अब जो आपको व्यक्तिगत समय मिलता है उसका आत्मा से कहाँ कोई ताल्लुक होता है, या होता है?
आप जब कहते हो कि फ़लाना समय मेरा व्यक्तिगत समय है, उसमें क्या करते हो? आत्मा तक पहुँचने वाले काम करते हो या और कचरे में घुसने वाले काम करते हो? आज ये वैलेंटाइन्स डे है, नीचे चल रहा है तमाशा! यहाँ बैठे लोगों में से कुछ लोग थे वहाँ पर। वहाँ आत्मा वाले काम हो रहे थे? कहिए! और था क्या सबका वो? निजी समय, पर्सनल टाइम। तो बताओ मुझे, जिसको आप व्यक्तिगत समय कहते हो उसका ताल्लुक अलोननेस माने आत्मिकता से कहाँ है? न व्यक्तिगत समय का उससे सम्बन्ध है, न व्यक्तित्व का ही। व्यक्ति का ही आत्मा से कहाँ सम्बन्ध है?
व्यक्तित्व माने क्या? पर्सनैलिटी, माने जो सब बाहर-बाहर का मामला है। इसको बोलते हैं व्यक्तित्व। और आत्मा कौनसी चीज़ है? जिसको मुहावरे के तौर पर कहा जाता है 'अंदर का बोध बिन्दु'। व्यक्तित्व क्या है सारा? बाहर का मामला। ये सब जो परते हैं एक के ऊपर एक चढ़ी हुई, इसको बोलते हैं व्यक्तित्व। और आत्मा क्या चीज़ है? अंदर का जो एक सच्चा केन्द्र है, उसको बोलते हैं आत्मा। ठीक है?




