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खुद को बदलने का एक अचूक तरीका (ज़िद्दी आदतें छूट जाएँगी) || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा आज का प्रश्न है कि अगर हम जगत से ही बने हैं, जगत साकार है, उसी से हम सब चीज़ें ले रहे हैं। फिर एक समय आता है जब हम आदतों को छोड़ना चाहते हैं। तो अगर जगत की चीज़ें बदलना आसान है तो हमें अपनेआप को बदलना इतना मुश्किल क्यों लग रहा है?

आचार्य प्रशांत: वो बदलाव तो हम कर देते हैं न। जैसे जगत की चीज़ें बदलना आसान है तो वैसे ही हम अपनी चीज़ें तो बदल ही देते हैं।

भई, जगत के मॉल से आप कल लेकर आयी थीं चने का आटा, और उसमें आपने बना दिया चीला। उसमें भीतर से समस्या बुझी नहीं और बेचैनी हटी नहीं। तो आज आप लेकर आ गयी हैं चावल का आटा और उससे आपने बना दिया डोसा। कल गेहूँ का ले आयी, उससे तन्दूरी रोटी आपने बना दी। तो बदलाव तो हम करते ही रहते हैं।

जो नहीं बदलता वो ये अज्ञान है कि ये सब जगत का माल है, ये मैं नहीं हूँ। बदलाव कौन नहीं करता, रोज़ बदल-बदलकर खाना खाते हैं, हम रोज़ बदल-बदलकर कपड़े पहनते हैं, घूमने चले जाते हैं, लोगों से बात करते हैं। टीवी देखते हैं, बदल-बदलकर प्रोग्राम और पिक्चरें देखते हैं। बदल-बदलकर तो काम चलता ही रहता है। लेकिन एक चीज़ को हम बदलने नहीं देते। वो क्या है? कि ये सब जो माल आया है ये मैं हूँ।

इसमें परिभाषागत विरोधभास है। क्या है? आया बाहर से है तो मैं कैसे हो गया? आया बाहर से है तो ओरिजिनल (असली) कैसे हो गया? नाम कह रहे हो आत्मा, ला रहे हो बाहर से। ये तो एक फंडामेंटल कंट्राडिक्शन (मूलभूत विरोधभास) हो गया न? लेकिन पूरा संसार इसी में ही जीता है। सब इंसान इसी में ही जीते हैं। ये फंडामेंटल कंट्राडिक्शन है एक। परिभाषा के स्तर पर ही हमने विरोधाभास खड़ा कर दिया है। लाये कहाँ से थे?

प्र: जगत से।

आचार्य: नाम क्या दिया? 'मैं’। तो ये तो परिभाषा ही ग़लत हो गयी न? हाँ, तो परिभाषा ग़लत मत करिए। जगत से लाये हो तो बोल दो जगत का है तो वो तो चल जाएगा। फिर कोई दिक्क़त नहीं है। अहंकार को मारने का एक ये भी तरीक़ा होता है — बोल दो कि सब जगत का है, वो भी ठीक है। “तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर।”

मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर। तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर।।

ये जगत को बोल दो, तेरा है भाई। अहंकार गया। लेकिन दिक्क़त तब होती है जब पराये माल को अपना बना लिया जाता है। माल है पराया और बना लिया अपना। अमिताभ बच्चन गा रहे थे न वहाँ पर, “इनका तो लगता है बस यही सपना। राम नाम जपना पराया माल अपना।” ये ही जगत की रीत है — 'राम नाम जपना पराया माल अपना।'

जिस दिन बच्चा पैदा होकर बोलता है 'मैं' या भाव करता है 'मैं' — मान लो अभी भाषा नहीं है ‘मैं’ बोल पाने की तो भाव करता है ‘मैं’ — उसी दिन उसने धाँधली कर दी। क्या धाँधली कर दी? ‘मैं’ ही धाँधली है। अरे, तुझमें तेरा क्या है? तूने ‘मैं’ बोल कैसे दिया?

कुछ माँ का है, कुछ बाप का है, कुछ नर्स का है, कुछ डॉक्टर का है, कुछ दवाई का है, कुछ समाज का है, कुछ पंचभूतों का है, हवा का है, जल का है, वायु का है, अग्नि का है। तूने 'मैं' बोला कैसे? सब उधारी का है।

बोल रहे हो 'पराया माल अपना, पराया माल अपना', 'मैं' बोलना ही गुनाह हो गया न। देखिए, पराये माल को अपना बना लिया। अब फँसोगे। अब कोई-न-कोई आएगा फिर उधार वसूलने के लिए और ज़िन्दगी भर क्या रहोगे? कर्ज़दार। हमने कहा था, ये रिश्ता संसार से नहीं रखना — न कर्ज़दार, न गुनहगार, न खरीददार।

प्र: लेकिन जो हमारी बुरी आदतें हैं उनको तो हम अपनी मानते हैं, क्योंकि वो सिर्फ़ हमें ही पता हैं।

आचार्य: नहीं, अच्छी आदत हो या बुरी आदत हो, कोई हो, बाहर से ही तो आयी है न? एक बार यह दिख जाए कि बाहर से आयी है, उसके साथ ‘मैं’ का नाम हटा दीजिए। फिर उसमें कितना ज़ोर बचेगा?

आदत है, आपको है न आदत? आपने किसी प्रक्रिया को पकड़ रखा है न और उसी को आप रोज दोहराते हो। इसी को आदत कहते हैं कि कोई काम है जो आप रोज़ कर डालते हो। कहते हो आदत हो गयी है इसकी, है न?

आप ने क्या करा है उसको?

प्र: पकड़ लिया है।

आचार्य: पकड़ा है। पकड़ने का मतलब है उसको क्या बना लिया है? अपना बना लिया है। कहते हो, ‘मेरा है, मेरा है।‘

एक बार देख लोगे आपका नहीं है, वो भी किसी ने आपको लत लगवा दी है या कि आपने देख लिया है, जैसे पिक्चरों में आता है न परदे पर, कोई सिगरेट पी रहा होता है तो नीचे लिख देते हैं कि स्मोकिंग इज इंजुरियस या स्मोकिंग किल्स। वो इसीलिए करते हैं न क्योंकि वहाँ जो परदे पर चल रहा है वही इधर है। तो वही लोग करेंगे उसका।

अर्जुन को भी बोलते हैं कृष्ण, 'श्रेष्ठजन जो करते हैं, दुनिया उसी का पीछे-पीछे अनुकरण माने नकल करने लग जाती है।' आप को दिख जाए कि जिसको आप अपनी आदत बोल रहे हो वो भी आप कहीं इधर-उधर से उठा लाये हो। आपको ये भी दिखे कि आपको जो चीज़ उस आदत की ओर भेजती है, वो भी आपकी नहीं है, वो भी इधर-उधर से ही आप लाये हो तो फिर आदत कमज़ोर पड़ जाती है।

अच्छा बताइए, आप हॉस्टल में रहती हैं, ठीक है?

प्र: हाँ।

आचार्य: माँ ने एक इतना बड़ा टब भरकर, कोई बहुत बड़ा बर्तन मान लो, कोई मर्तबान, कुछ भी मान लो — माएँ बहुत खुश हो जाती हैं जब बच्चे हॉस्टल चले जाते हैं तो — उन्होंने लड्डू भेज दिये। बहुत लड्डू हैं उसमें, छः-सौ लड्डू हैं। भेज दिये और आपने उसको रख लिया अपने कमरे में। अब इतने सारे लड्डू हैं, आपने रोज़ एक-एक खाना शुरू किया सुबह-सुबह। तो आदत तो लग ही जाएगी।

बढ़िया मीठी चीज़, वो भी ये है कि माँ ने बनाकर भेजे हैं और घर की गाय और घर की गाय का घी और ये सब बातें। आदत लग गयी। सुबह-सुबह लड्डू खा रही हैं। आदत लग गयी न?

प्र: हाँ।

आचार्य: आदत लग गयी है। एक दिन आपको पता चलता है कि ये आया कहाँ से है। अभी तक आप मान रहे थे मेरी माँ से और मेरी गाय से आया। आपको पता चला अरे, ये मेरी माँ और गाय से नहीं आया, ये पड़ोस के कमरे से आया है। और उनके यहाँ मिट्टी के तेल के लड्डू बनते हैं। मिट्टी के तेल के लड्डू बनते हैं और वो बनते भी मिट्टी के ही हैं। वो आपकी चीज़ नहीं है। आपको उसका स्रोत पता चल गया। वो आपकी चीज़ नहीं है, न वो घी की चीज़ है न माँ की चीज़ है, न वो बेसन की चीज़ है। उसका स्रोत पता चल गया।

अब आपकी आदत का क्या होगा? आपकी आदत थी आप रोज़ एक लड्डू खाती थीं। अब क्या होगा उस मर्तबान का? आदत का क्या होगा? लड्डू तो नहीं बदला, जैसा था वैसा ही है। लेकिन आपको पता है कि वो कहाँ से आ रहा है। आपका नहीं है, वो कहीं और से आ रहा है। तो आप क्या करोगे उसका?

प्र: बन्द कर देंगे।

आचार्य: तो आदत को काटने का यही तरीक़ा होता है। जिसकी आदत हो उसकी असलियत जान लो। जिसकी आदत लगी हो उसकी असलियत जान लो, आदत छूट जाएगी।

हम क्या करते हैं? उल्टा करते हैं। जिसकी आदत लगी होती है, उससे दूर भागते हैं।

एक बार मैं कॉलेज़ में था, वहाँ पर बहुत परेशान हो गये थे। वहाँ के डायरेक्टर वगैरह, सब एचओडी वगैरह बैठे थे, मैं वहाँ उनको बोल रहा था। मैंने यही उनको बोला, मैंने कहा, 'जिस चीज़ की आदत है, उसके और क़रीब जाओ, आदत छूट जाएगी।’

बोले, 'ये आप क्या कर रहे हो? ये सब-के-सब शाम को वहाँ बाहर जो पान वाला है, उसके यहाँ होंगे। वो सिगरेट भी बेचता है।’

मैंने कहा, 'कुछ नहीं होगा, जो मैं बोल रहा हूँ उसको होने तो दीजिए।' वो बहुत घबरा गये, अगली बार से मेरा आना ही उन्होंने बन्द करवा दिया। पर जो बात बोल रहा हूँ बिलकुल ठीक बोल रहा हूँ।

जिस चीज़ की आदत लगी हो उससे भागो नहीं, उसके और क़रीब जाओ, आदत छूट जाएगी। आदत एकदम छूट जाएगी।

आप हमारे चैनल पर जाएँगी यूट्यूब वाले, उसमें सबसे ऊपर पॉपुलर पर खोजेंगी कि वीडियो नम्बर एक कौनसा है पॉपुलर, तो उसका शीर्षक है, ‘सारी हवस उतर जाएगी।’ है न? वो बहुत लोगों ने देखा। और पता नहीं उतरी कितनों की, पर देखा सबने। उसमें मैंने क्या बात बोली है? एक ने आकर सवाल पूछ दिया था, 'क्या करूँ वासना की लत लगी है, ये है, वो है। कैसे दबाऊँ, कहाँ भागूँ, क्या छुपाऊँ?'

मैंने कहा, 'जो कर रहे हो उसी को ज़रा ग़ौर से करके देखो। ये जो तुम ख़ाल का खेल, खेल रहे हो, ख़ाल के नीचे क्या है, ये भी देख लो न। और वहाँ ख़ाल के नीचे जो गन्धा रहा है मामला, उसको देखो न ग़ौर से। बत्ती बुझा क्यों रखी है? जला दो बत्ती और माइक्रोस्कोप लेकर आओ। फिर पता चलेगा कि मामला क्या है और फिर देखेंगे कि तुम्हारी कितनी लत बचती है — सारी हवस उतर जाएगी।’

अज्ञान ही आदत का कारण बनता है। जिस चीज़ के प्रति इतने आसक्त हो रहे हो, उसको जान लो न, फिर देखो कैसे वो आदत बचेगी!

प्र: मतलब, अन्दर से जानना है उसको?

आचार्य: पूरा जान लो। वो क्या चीज़ है, मैं क्या चीज़ हूँ, हमारा रिश्ता क्या है — कल्पना से नहीं। और इसीलिए आप पाओगे कि जो लोग आदतों के शिकार होते हैं, चाहे कैसी भी आदत हो, उनसे आप ज्ञान की बात करो तो दूर भागते हैं। उनसे आप चर्चा करना चाहो उनकी आदत के विषय पर तो वो दूर भागते हैं। वो उस मुद्दे पर नहीं बात करेंगे, कहेंगे, 'किसी और मुद्दे पर बात कर लो। चेंज द टॉपिक (विषय बदलो)।'

वो कोई भी आदत हो सकती है। वो पैसे की आदत हो सकती है, वो खाने की आदत हो सकती है, किसी व्यक्ति की आदत हो सकती है, सोने की आदत हो सकती है, कोई भी आदत हो सकती है। आप उसके विषय के बारे में बात करना चाहोगे वो बात नहीं करेंगे। उन्हें पता है बात अगर आगे बढ़ेगी तो आदत छूटेगी, तो वो बात नहीं करेंगे।

उदाहरण के लिए, किसी को माँस की आदत लगी हुई है। लोग लगे हुए हैं, 'अरे, माँस खाता है।' 'आचार्य जी, आपको सुन रहे हैं पर माँस पूरी तरह छूट नहीं रहा, छोड़ देते हैं, दो महीने बाद फिर आदत हो जाती है।’

मैं बोलता हूँ, 'तुम्हें क्या करना है, तुम जाओ और देखकर आओ कि तुम्हारा माँस आ कहाँ से रहा है। ये नहीं कि बाज़ार से पैकेज़्ड फ्रोज़न (पैकेटबन्द) खरीद लाये माल और उसको खोल दिया और खा लिया।' ऐसे नहीं।

देखकर आओ कि ये माँस कैसे तैयार हुआ है। इसका पूरा जो प्रोडक्शन साइकल (बनने की प्रक्रिया) है वो देखकर के आओ। फिर मैं देखता हूँ तुम कैसे खा लोगे। पेटा वालों ने जो एक काम बेहतरीन करा है वो ये है कि उन्होंने जो स्लॉटर हाउसेज़ (कसाईख़ाने) हैं, ये जो पूरा मैकेनाइज़्ड (मशीनीकृत) काम चलता है मीट प्रोडक्शन (माँस उत्पादन) का, जानवरों की हत्या का, वो इसके वीडियो निकालकर डाल देते हैं सोशल मीडिया पर।

वो दिखाते हैं कि देखो कैसे ये गाय है, ये भैंस है, ठीक-ठीक देखो कि इसकी हत्या कैसे करी जाती है। ये मुर्गी है, ठीक-ठीक देखो कि इसमें से अंडा कैसे निकाला जाता है, देखो पहले। और इस बात को सफलता मिलती है। ग़ौर से देखो न, तुम्हें जिस चीज़ की आदत है वो चीज़ क्या है, ग़ौर से देखो। और फिर हम देखेंगे कि तुम्हारी आदत कैसे बरकरार रहती है।

प्र: लेकिन अगर हमें जैसे आदत है दूध वाली चाय की, तो उसके लिए हम क्या देखें?

आचार्य: अरे, जाकर देखिए न दूध कैसे आता है आपके पास। आप तो क्या करते हो, आप बाज़ार से दूध घर ले आते हो पैकेट। वही ले आते होंगे आप वो जो पैकेट में आता है दूध या दूधवाला देकर जाता होगा आपको। आप पूरा जो दूध का, मैं कह रहा हूँ, प्रोडक्शन साइकल (बनने की प्रक्रिया) है उसको देखकर तो आइए न कि दूध कहाँ से आ रहा है।

ये सब जो दूध के प्रेमी घूम रहे हैं कि अरे दूध तो बहुत बढ़िया चीज़ होती है, इन्होंने कभी देखा है कि एक गाय पैदा होती है, वहाँ से लेकर के उसके आख़िरी दिन तक उसका साइकिल (चक्र) क्या होता है? उसका जीवन देखा है? और उसके साथ जो कुछ भी हो रहा है वो इसलिए हो रहा है ताकि आपको दूध मिल सके। और आपके पास तो गाय का आता भी नहीं होगा, ज़्यादातर तो भैंस का दूध चलता है। अस्सी-नब्बे प्रतिशत तो भैंस का दूध है चारों तरफ़। गाय का कहाँ है?

भारत ये जितना निर्यात करता है माँस का, वो अधिकांशतः भैंस का ही तो माँस है। आप जिसका दूध पी रही हैं, ये हो नहीं सकता है कि कल उसका माँस बाज़ार में बिक न रहा हो। दूध आप जब भी देखो, इसीलिए मैं याद दिलाता हूँ, 'दूध का रंग लाल है।' लेकिन आप दूध देखते हो, कहते हो, 'पी लो, गाय है, गाय खड़ी है। उसने दूध दिया है और दूध पी लो।’ पूरी बात तो देखो। कैसे आया वो दूध आपके पास, ये देखो।

वो बात हर चीज़ पर लागू होती है। कपड़े पर भी लागू होती है, इलेक्ट्रॉनिक्स पर भी लागू होती है, हर चीज़ पर लागू होती है, विचार पर लागू होती है। देखो जो विचार पकड़ रहे हो वो विचार कहाँ से आ गये आपके पास। ये भी देखो आपके पास कैसे आया और अगर वो कोई स्थूल पदार्थ है, प्रोडक्ट है, तो ये भी देखो कि जब आप उसको छोड़ दोगे तब उसका क्या होगा।

एक साहस रखिए कि इतना भयानक कुछ नहीं है कि उसको जान लेंगे तो मर जाएँगे। हम जानने से बहुत डरते हैं। ज्ञान से बिलकुल, जिसे कहते हैं 'हवा निकल जाना', ये हालत होती है हमारी। क्योंकि अहंकार नाम ही अज्ञान का है, तो ज्ञान से बेहद घबराता है।

जानिए, पूछिए। चेतना की साधारण अवस्था ही जिज्ञासा की होनी चाहिए, मान्यता की नहीं। ये नहीं कि कुछ दिख रहा है तो कह दिया, 'हाँ, ठीक ही होगा।'

'फ़लानी चीज़ लाल है?'

'हाँ, तो!'

'ये त्रिभुज दिखाई दे रहा है?'

'हाँ।’

अरे 'हाँ' नहीं बोलो, पूछो न। वो जो तुम्हें अभी त्रिकोणी दिखाई दे रहा है वो एक इंसान है, उसके तीन कोण कहाँ से आ गये? कुछ भी दिख जाए, बोलेंगे 'हाँ।' बात-बात में बोलेंगे, ‘हाँ, ठीक ही है।‘

ये काम पशुओं का है, उनको कुछ भी दिखा दो, कोई फ़र्क पड़ता है? कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ता। उनको कुछ भी दिखा दो, ठीक है। बकरी के सामने आप कुछ भी रख दो, वो क्या करेगी? आईफ़ोन रख दिया उसके सामने, वो तो तब भी चारा ही चबा रही है, मज़ा आ रहा है उसको। ऐसे थोड़े ही हो जाना है!

चेतना की डिफ़ॉल्ट (स्वाभाविक) अवस्था जिज्ञासा की होनी चाहिए। पूछो, जानो, सजग रहो। ज्ञान पढ़कर ही नहीं आता है।

अभी मैं सुन रहा था, किसी ने गान्धी जी से पूछा, 'आपने किताबें ज़्यादा क्यों नहीं पढ़ीं?' हालाँकि वो भी अच्छे-ख़ासे पढ़े-लिखे आदमी थे। लेकिन ऐसे भी होते हैं जिनको आप कह सकते हो फिर ‘किताबी कीड़ा’, वो पढ़ते ही रहते हैं, उन्हें कुछ और नहीं करना बस पढ़ना है। तो उनमें से किसी ने पकड़ लिया होगा गान्धी जी को और कहा होगा, ‘गान्धी जी, आपने और किताबें नहीं पढ़ीं?’ बोले, 'अपनी आँखों से मैं जगत को अपने सामने पढ़ता हूँ, “ आई सी द वर्ल्ड इन अन्फ़ोल्डिंग इनफ्रंट ऑफ माई आइज़।”

ये होती है चेतना की सतत जिज्ञासा की अवस्था कि आप कुछ भी देख रहे हो वो ऐसा है जैसे किताब पढ़ रहे हो। अब बहुत ज़्यादा पढ़ने की ज़रूरत नहीं। नहीं-नहीं, मैं ये नहीं कह रहा हूँ खूब किताबें पढ़िए। हम लोग जैसे हैं हमें तो बहुत सारी किताबें पढ़नी चाहिए। पर जगत भी अपनेआप में एक खुली किताब है। आप उसे पढ़ोगे तब न जब आँख खुली हो। किताब खुली हो, आँख न खुली हो तो क्या पढ़ोगे!

प्र: हम जानते तो हैं लेकिन ऊपर-ऊपर का जानते हैं।

आचार्य: हम कुछ नहीं जानते, न हमें कुछ जानना है। हमें तो बस ये है कि पैकेट खोलना है और चबाना है। आप पैकेट खोलकर क्या-क्या नहीं खाती होंगी, आपने कभी ये भी पढ़ा कि उसमें क्या लिखा हुआ है? हमें भोग करना है बस। 'भाई पैदा हुआ है बस भोग वास्ते। क्या करना है? पैकेट खोलो, चबा जाओ। पूरा ब्रह्मांड एक विशाल पैकेट है और मैं आविर्भूत हुआ हूँ उसको खोलकर चबाने के लिए।' ये हमारा जीवन-दर्शन है कुल मिलाकर।

देखिए, सोचिए, पढिए। उसमें कष्ट होते हैं। ज्ञान की क़ीमत चुकानी पड़ती है और जिज्ञासा के ख़तरे उठाने पड़ते हैं। काहे कि पैकेट खोलकर चबाने ही जा रहे थे — मेरे साथ तो खूब होता है, कहीं जाता हूँ, कुछ ले आते हैं, उनसे पूछ दो, 'भाई वीगन (शाकाहार) है?' तो दाँत दिखा देगा।

अब भूख लगी थी, वहाँ खोला मेन्यू तो मुश्किल से कुछ दो-चार शाकाहारी चीज़ें मिलीं। उसमें से भी कुछ चुनकर मँगाया कि शायद भई इसमें भी घी न डला हो। फिर वेटर को बुलाया, उससे पूछा 'वीगन (शाकाहार) है?' वो तुरन्त दाँत दिखा देगा, कहेगा, 'नहीं, नहीं।'

कई बार तो ये भी होता है कि वो बोल देता है कि है वीगन (शाकाहार) और फिर शक हो जाता है कि इसमें ये डालते होंगे कुछ-न-कुछ दूध-पनीर। तो उसके शेफ़ को बुलाओ तो वो बता देता है कि नहीं इसमें नहीं है। तो शेफ़ को राज़ी करना पड़ता है कि तू यही बना दे पर इसमें पनीर मत डालना भाई। तो वो आपका मुँह ऐसे देखता है, कहता है अभी चिड़ियाघर से छूटा है ताज़ा-ताज़ा।

जिज्ञासा के ख़तरे तो उठाने ही पड़ते हैं न। ज़्यादा सवाल करोगे तो यही पता चलेगा कि इसमें भी दूध है, इसमें भी घी है, इसमें भी यही है। जितना पूछो, उतना जो आपके सामने विकल्प हैं वो कम होते जाते हैं खाने के। तो मन करता है, मैं काहे को झूठ बोलूँ! मेरा भी मन करता है कि पूछो ही मत। उसके आगे वो हरा निशान लगा है न, वो देखा है ग्रीन डॉट (हरा बिन्दु) लगा देते हैं। कहते हैं इसमें हरा निशान लगा है और इसके डिसक्रिप्शन (विवरण) में लिखा हुआ है कि इन-इन सब्ज़ियों से बना है तो इसका मतलब इसमें घी नहीं होगा, मँगा लो, आँख बन्द करके मँगा लो।

भीतर तो एक बैठा ही हुआ है नालायक, लोभी, वो तो यही चाहता है कि पेट भर जाए बस। “भजन करन को आलसी, भोजन को तैयार।” पैकेट फाड़ो, मुँह में डालो।

कबीर यह मन लालची, समझे नहीं गँवार। भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।

~ कबीर साहब

जिज्ञासा करनी होती है। और जिज्ञासा के बाद तैयार रहना होता है कि जवाब जो है अप्रिय भी हो सकता है। बहुत बढ़िया माल दिख रहा था कि जल्दी से ऑर्डर कर दें और पता चल सकता है कि भाई इसमें तो कहीं-न-कहीं दूध कहीं डला हुआ है। पता चल सकता है, पता चलेगा तो अपना सा मुँह हो जाएगा, मुँह लटक तो जाता ही है। मेरा भी लटक जाता था। अभी बिलकुल सपने सजा लिये थे कि अब बढ़िया वाला पकवान आएगा, खाएँगे। और ये सामने खड़ा हो गया नामुराद, बोल गया इसमें दूध है। मैं चाहता हूँ कि बोल इसमें दूध नहीं है। पर अब तो उसके मुँह से निकल ही गया कि दूध है, अब क्या करोगे। अब हो गया, अब है तो है। 'कुछ और दे दे भाई, पापड़ होगा? पापड़ ले आ भाई।' कई बार हुआ है, पापड़-चटनी खाकर वापस लौटा हूँ।

बिस्किट मँगाता था, वहाँ पर जो वेटर था वो मेरा श्रोता निकला। नालायक ने आकर बता दिया — चाय मँगाता था। चाय तो वीगन है, उसने वो आलमंड मिल्क या सॉय मिल्क में बना दी। उसके साथ में वो फ्री के बिस्किट रख देते थे। तो मैं खा लेता था — अब वो वेटर जो है वो श्रोता निकला। वह आकर मेरे कान में फूँक गया। बोल रहा है, 'ये जो बिस्किट है न इसमें भी दूध है।' मैंने कहा, 'धन्यवाद इस ज्ञान के लिए।' अगले दिन से बिस्किट बन्द हो गया। अब वो ख़ुद ही कुछ ले आता है पपड़ी जैसा कि लो ये चबा लो अपनी चाय के साथ। तो चबा लेते हैं।

तो जिज्ञासा की क़ीमत देनी होती है। हम ज्ञान से इसीलिए घबराते हैं, कहीं कुछ ऐसा न पता चल जाए जो जानकर नुक़सान हो जाएगा। लेकिन फिर भी साहस के साथ दृष्टि यही रखिए कि कुछ भी है, 'भई क्या है, क्या है।' ऐसा नहीं कि बिलकुल ठप पड़ गये यहाँ (मस्तिष्क) से, जानवर हो गये। कुछ पूछना ही नहीं, जानना ही नहीं, देखना ही नहीं, चल रहा है।

ये तो इनफॉर्मेशन एक्सपलोजन (सूचना विस्फोट) का युग है। कुछ आपको नहीं पता चल रहा, खट से गूगल करिए, विकिपीडिया पढ़िए, सब पता चल जाता है।

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