खुद को बदलने का एक अचूक तरीका (ज़िद्दी आदतें छूट जाएँगी) || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा आज का प्रश्न है कि अगर हम जगत से ही बने हैं, जगत साकार है, उसी से हम सब चीज़ें ले रहे हैं। फिर एक समय आता है जब हम आदतों को छोड़ना चाहते हैं। तो अगर जगत की चीज़ें बदलना आसान है तो हमें अपनेआप को बदलना इतना मुश्किल क्यों लग रहा है?
आचार्य प्रशांत: वो बदलाव तो हम कर देते हैं न। जैसे जगत की चीज़ें बदलना आसान है तो वैसे ही हम अपनी चीज़ें तो बदल ही देते हैं।
भई, जगत के मॉल से आप कल लेकर आयी थीं चने का आटा, और उसमें आपने बना दिया चीला। उसमें भीतर से समस्या बुझी नहीं और बेचैनी हटी नहीं। तो आज आप लेकर आ गयी हैं चावल का आटा और उससे आपने बना दिया डोसा। कल गेहूँ का ले आयी, उससे तन्दूरी रोटी आपने बना दी। तो बदलाव तो हम करते ही रहते हैं।
जो नहीं बदलता वो ये अज्ञान है कि ये सब जगत का माल है, ये मैं नहीं हूँ। बदलाव कौन नहीं करता, रोज़ बदल-बदलकर खाना खाते हैं, हम रोज़ बदल-बदलकर कपड़े पहनते हैं, घूमने चले जाते हैं, लोगों से बात करते हैं। टीवी देखते हैं, बदल-बदलकर प्रोग्राम और पिक्चरें देखते हैं। बदल-बदलकर तो काम चलता ही रहता है। लेकिन एक चीज़ को हम बदलने नहीं देते। वो क्या है? कि ये सब जो माल आया है ये मैं हूँ।
इसमें परिभाषागत विरोधभास है। क्या है? आया बाहर से है तो मैं कैसे हो गया? आया बाहर से है तो ओरिजिनल (असली) कैसे हो गया? नाम कह रहे हो आत्मा, ला रहे हो बाहर से। ये तो एक फंडामेंटल कंट्राडिक्शन (मूलभूत विरोधभास) हो गया न? लेकिन पूरा संसार इसी में ही जीता है। सब इंसान इसी में ही जीते हैं। ये फंडामेंटल कंट्राडिक्शन है एक। परिभाषा के स्तर पर ही हमने विरोधाभास खड़ा कर दिया है। लाये कहाँ से थे?






