प्रश्नकर्ता: कुछ सालों में देखा है कि ज़्यादातर रिश्ते जो थे वो छूट चुके है, कुछ रिश्ते अभी भी है — जैसे माता-पिता से और एक-दो लोगों से और पैसो से भी है। तो उन रिश्तों में दिखता है कि बिलकुल भी स्वस्थ नहीं हैं, सारे रिश्ते। बस ऐसा लगता है कि छूट ही जाएँ तो ज़्यादा अच्छा है। लेकिन कभी-कभी लगता है कि — शायद किसी स्वार्थ के कारण — सुधार दें। तो इन्हीं दोनों में फँसे रहते हैं, कभी लगता है सुधार दें, कभी लगता है छोड़ ही दें, ज़्यादातर तो यही लगता है कि छूट जाएँ।
आचार्य प्रशांत: छोड़ दें माने क्या? अभी रिश्ता कैसे है, अभी है कैसे? पकड़ कैसे रखा है? जब दिख ही रहा है कि मामला गड़बड़ है, तो फिर रिश्ता बचा कहाँ है?
प्र: आस-पास हूँ, उस हिसाब से।
आचार्य: वो तो आस-पास तो इनके (अन्य श्रोता के) भी हो, उनके भी हो।
प्र: यहाँ से तो फिर चला जाऊँगा।
आचार्य: वहाँ से भी चले जाते हो, तो? यह तो अन्तर बस परिमाण का हुआ, यह तो अन्तर बस डिग्री का है — वहाँ चार दिन रहते हो यहाँ चार मिनट रहते हो। कोई डायमेंशनल, आयामगत अन्तर तो नहीं है न?
प्र: उनसे मन ज़्यादा विचलित होता है।




