
आचार्य प्रशांत: जो सही होता है न वो हमें बहुत सुंदर नहीं लगता, आकर्षक, ठीक है। और मन इतने से नहीं मानता कि कुछ सही है, मन को जो सही है वो प्रिय भी लगना चाहिए। जो सही होगा मन उससे दूर भागता है, क्योंकि मन ने सौंदर्य, जो सही नहीं है उसमें देखने का अभ्यास कर लिया है। तो क्या करना होगा? जो सही है, उससे अपने आपको बाँध दो, तब तक बाँधे रखो जब तक जो सही है वही सुंदर न लगने लगे। क्योंकि सचमुच जो सही है, सुंदर तो वही है पर वो हमें सुंदर लगता नहीं, प्रिय नहीं लगता, आकर्षक नहीं लगता, क्योंकि हमने अभ्यास कर लिया है दूसरी फ़िजूल चीज़ों को सुंदर मानने का।
"सुंदरता" क्या है? वो एक सिद्धांत ही तो है जो समाज से सीखा है, कि किसको हम 'सौंदर्य' बोलते हैं। तो वो जो सिद्धांत है, वो बहुत उल्टा-पुल्टा और आत्मसात हो गया है। तो जो सही है, आपकी बुद्धि और बोध कह रहे हैं कि सही तो यही है, उसके सामने अपने आपको मजबूर कर दो बाँध लो अपने आपको वहाँ पर, तब तक बाँधे रखो जब तक बाँधने की फिर ज़रूरत ही ख़त्म न हो जाए।
ज़रूरत कब ख़त्म होती है? जब जो सही है, वही सुंदर लगने लग जाता है, अब ख़ुद ही वहाँ से नहीं भागोगे क्योंकि अब सुंदर लग रहा है न।
सबसे ख़तरनाक स्थिति उनकी होती है जो जानते हैं कि क्या सही है और फिर भी भाग रहे होते हैं दूसरी दिशा में, क्योंकि जो सही है, वो उनकी ज़िंदगी में ज़रा देर से आया। देर से आया, उससे पहले ही उनके मन को इधर-उधर की 50 चीज़ों ने विकृत और भ्रष्ट कर दिया था। इस हद तक भ्रष्ट कर दिया था कि उनका जो ‘सुंदरता का कॉन्सेप्ट’ ही है — सिद्धांत, वो भी विकृत हो गया था।
तो भले ही बुद्धि बता रही हो कि "ये जो मुझे मिल गया है ये सही है," पर वृत्ति को अभ्यास दूसरा मिल गया है तो वो भाग रही है, भाग रही है। इसमें कुछ नहीं करना, इसमें अपने आपको बाँध देना है। इलाज के लिए कई बार रोगी को बिस्तर से बाँधना पड़ता है न, ताकि भागने का विकल्प ही न रहे। अपने पास से कुछ विकल्प छीनने पड़ेंगे, जब तक अपने आपको कुछ विकल्प देकर रखोगे, उन गंदे, ख़तरनाक विकल्पों का इस्तेमाल भी होकर रहेगा।
मैं नहीं कह रहा बात-बात में अपने आपको विकल्प से वंचित कर दो, लेकिन जहाँ जान ही जाओ कि क्या सही है वहाँ फिर विकल्पों को एकदम हटा देना चाहिए, और जब सही है तो भागने वाला दरवाज़ा खोल के क्यों रखूँ। जब ये सही है तो भागने वाले दरवाज़े पर लगाऊँगा ताला और चाबी फेंक दूँगा नदी में। क्योंकि अगर ताला नहीं लगाया तो भी भाग जाऊँगा, ताला लगा दिया और चाबी जेब में रखी, तो भी इस विकल्प का इस्तेमाल कभी न कभी कर ही लूँगा।
एक बार पता चल गया कि सही है, तो अब तो ताला लगेगा और चाबी जाएगी नदी में। और ये बार-बार या लगातार नहीं करते रहना पड़ता, अगर जो आपको मिला है वो सचमुच सही है तो मैं कह रहा हूँ, कुछ समय बाद वो आपको ख़ुद ही सुंदर भी लगने लगेगा। उसके बाद ये हालत होगी कि दरवाज़ा खोल लो, कहीं टहल आओ, फिर भी ख़ुद ही वापस आ जाया करोगे अपने कमरे में। उसके बाद अपने आपको ऐसे अनुशासन में नहीं बाँधना पड़ेगा पर शुरू में वो अनुशासन बहुत आवश्यक होता है।
इंसान के लिए बड़ी ये विडंबना की कह लो या मज़े की बात कह लो, ये है कि अगर उसको मुक्ति चाहिए तो उसे "सही बंधन" चुनना पड़ेगा। और कुछ ऐसे उत्साही होते हैं वो कहते हैं, "जब मुक्ति लक्ष्य है, तो बंधन क्यों चुनें?" साहब, मुक्ति, मैं कई बार चेता चुका हूँ मुक्ति कुछ नहीं होती बंधन ही बंधन होते हैं, या तो सही बंधन या ग़लत बंधन। जो सही बंधन चुन लेता है वो मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ता रहता है, और जो मुक्ति को चुन लेता है वो गहरे बंधनों में फँस जाता है।
सही बंधन चुनिए, मुक्ति और कुछ नहीं है अपने आप को सही जगह से बिल्कुल बाँध देने का नाम है।
“गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊँ।” बाँध दिया अपने आपको। “कबीर कुत्ता राम का, मोतिया मेरा नाऊँ।” बाँध दिया।
कबीर कुत्ता राम का, मोतिया मेरा नाऊँ। गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊँ।।
अब कुत्ता अपना पट्टा ख़ुद तो खोल नहीं सकता ना, ऐसा ही कर लो कि चाबी नदी में फेंक दी या पट्टा बाँध लिया जो आप ख़ुद खोल ही नहीं सकते। जब अपनी हालत पता है तो अपने आप को चुनने का अधिकार क्यों देकर रखते हो?
एक मोटा आदमी है और उसको अपना पता है कि वो चुराकर खाएगा ही रात में फ्रिज से, कितने लोग हो जो खाते हो चुराकर रात में फ्रिज से? चुराकर माने घरवाले मना कर रहे होंगे, माँ ने बोल रखा होगा, "कुछ नहीं खाना," या अगर हॉस्टल वग़ैरह में है तो वहाँ पर जो साझा डॉरम का फ्रिज है, उसमें से रात में निकाल रहे हैं। कितनों ने किया है? (कुछ श्रोता हाथ उठाते हैं)।
तो ऐसे में क्या करना होता है? अगर सचमुच चाहते हो कि सेहत ठीक रहे रात का इंतज़ार मत करो, दिन में ही फ्रिज में जो कुछ रखा है, फेंक दो। अरे, खा लो नहीं बोला है, दिन में ही फ्रिज में जो कुछ रखा है फेंक दो। भरोसा मत करो अपने आप पर कि रात आएगी और आप संयम, अनुशासन रख लोगे। अपना इतिहास नहीं पता है क्या? इतना कैसे भरोसा कर लिया अपने आप पर?
आप हो इस लायक कि अपने आप पर भरोसा कर सको? दुनिया में कोई नहीं भरोसा करता आप पर, ख़ुद पर कैसे भरोसा कर लिया। तो दिन में ही वहाँ जो कुछ है फेंक दो, ताकि रात में बहकने की नौबत ही न आए।
रात का अगर अपने आप को विकल्प दोगे तो चुपचाप ख़ुद ही तैयारी कर रहे हो कि अब बहकेंगे, मज़ा आएगा। भले ही ऊपर-ऊपर अपने आप को ये बता रहे हो कि “नहीं नहीं, वो तो बस रखा हुआ है जनकल्याण के लिए। कहीं कोई भटकता हुआ भिखारी आ गया रात में 3 बजे और बोला, ‘भिक्षां देहि!’ तो मैं उसको दूँगा न! ये जो ब्रेड रखी है और जो सब माल रखा हुआ है पूरा फ्रिज में पैकेज्ड फूड, उसके लिए है मेरे लिए थोड़ी है ये।”
ये बंद करो बेईमानी, सब उठा के बाहर फेंक दो।
अब रात में कुलबुलाहट उठेगी, स्वयं को बहुत गरियाओगे कि काहे को फेंक दिया, जहाँ फेंका है वहाँ बिनने भी जाओगे। कुत्तों से प्रतिस्पर्धा करोगे कि कुछ छोड़ दो हमारे लिए भी, मैं इसका ओरिजिनल मालिक हूँ। पर अच्छा है कुछ नहीं मिलेगा। कुछ समझ में आ रही है बात ये?
आज़ादी उन लोगों को शोभा देती है जो सचमुच आज़ाद हैं। अपनी बाहरी स्थितियों को अपने आंतरिक तथ्य से इतना दूर मत रखो, जब पता है कि भीतर तो हम अपने ही ग़ुलाम हैं, तो बाहर अपने आप को झूठमूठ की आज़ादी दोगे तो उस आज़ादी का दुरुपयोग भी ग़ुलामी की सेवा में होगा। मत दो आज़ादी, ख़ुद ही मत दो। इंतज़ार मत करो कि कोई और आकर आज़ादी छीनेगा बाहर की, ख़ुद ही कह दो, “अभी हम इस लायक नहीं हैं कि अपने आप को ये विकल्प दें।” जिस दिन लायक हो जाएँगे उस दिन कोई दिक्कत ही नहीं। भर दो पूरा फ्रिज और अलमारियाँ पूरा खाने से लाके भर दो, कोई फ़र्क ही नहीं पड़ेगा, अभी हम इस लायक नहीं हैं।
समझ में आ रही है बात?
"ये आगे कर लूँगा, बाद में कर लूँगा।" अरे, फिर बोल रहा हूँ अपनी कुंडली देखो, अपना इतिहास देखो, सारे सबूत देखो। आज तक कभी आगे कुछ करा है? तो क्यों अपने आप को आज़ादी दे रहे हो काम को आगे पर टालने की, क्यों दे रहे हो। सारे आँकड़े उपलब्ध होते हैं अब तो, सब डिजिटल युग है। हर छोटी चीज़ आँकड़ों में उपलब्ध होती है अब, क्या खाया, क्या पिया, क्या किया, हर चीज़ के मिल जाते हैं प्रमाण, तथ्य, देख लो न अपना सब। और उसके बाद भी अपने आप को आज़ादी दे लेते हो, मत दो।
अब मैं जो कह रहा हूँ उसको सुनिए ध्यान से —
प्रेम जो ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाए, वो बड़ी नकली और घटिया चीज़ होती है। सही प्रेम के लिए ख़ुद को मजबूर करना पड़ता है।
सही विषय से, सद्वस्तु से, या सही इंसान से प्रेम कभी ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं होगा जब तक आप अपने आप को मजबूर न करें। दुनिया में सबसे कम प्रेम उनको मिला है जो सबसे सही होते हैं, क्योंकि उनको आप प्रेम कर ही नहीं पाओगे न, वो प्राकृतिक बात नहीं है वो सरलता से होगा नहीं। सरलता से तो जो एकदम सड़ी हुई चीज़ होगी दुनिया में आपको उसी से प्रेम आएगा।
ऊँचाइयों से प्रेम करना चुनौती की बात होती है न, हम तो गड्ढों से प्रेम करते हैं वहाँ बढ़िया कुछ करना नहीं पड़ता, गड्ढे में प्रवेश करने के लिए क्या करना है? कुछ नहीं करना। आप जाओ आगे का काम गड्ढा करेगा, वहाँ पर बस कदम रख दो। अब आपको क्या करना है? कुछ नहीं, अब तो गड्ढा करेगा जो करेगा, पूरा अंदर तक ले लेगा आपको अपने में।
पर ऊँचाइयाँ ऐसी नहीं होतीं, वहाँ ये नहीं होगा कि ऊँचाई के पास चले गए तो ऊँचाई ने आपको ख़ुद-ब-ख़ुद उठा लिया ऊपर की तरफ़। ऐसा नहीं होता न? वहाँ श्रम करना पड़ता है। ऊँचाइयों से प्रेम नहीं कर पाओगे, हाँ ऊपर-ऊपर से उनको आप सम्मान दिखा सकते हो, "वाह! क्या ऊँचाई है! मज़ा आ गया!" पर प्रेम, प्राकृतिक प्रेम तो हमें गड्ढों से ही होता है। फिसलन भरे गड्ढे जहाँ और कुछ न करना पड़े, बस एक क़दम रखा और आगे जो होना था, ख़ुद-ब-ख़ुद हुआ। हमें कुछ करना ही नहीं पड़ा, हो गया। हो गया, ख़ुद-ब-ख़ुद हो गया।
मजबूर करो अपने आपको, ये मत कहो कि *"फेल इन लव।"
"फेल इन लव"* माने गड्ढे में ही गिरे हो या कि प्रेम हो गया, मजबूर करो जो सही है उससे प्रेम करूँगा, अपने आप को सिखाऊँगा प्रेम। कहता हूँ ना कई बार, “प्रेम सीखना पड़ता है,” इसीलिए। जो सही है, अपने आप को सिखाऊँगा उससे प्रेम करना और फिर बाद में एक दिन अपने आप को धन्यवाद दूँगा कि भला किया कि सिखाया। क्योंकि शुरू में सिखाना पड़ेगा, बाद में कहोगे कि बड़ा ग़ज़ब हो जाता अगर नहीं सिखाया होता। अच्छा किया कि मेहनत कर ली, कष्ट सह लिया, और अपने आपको ये सही प्रेम, ऊँचाइयों से प्रेम करना सिखा दिया। और वो प्रेम एक बार सीख लेते हो तो उसके बाद वो छूटता नहीं है।
है न, “हिरदै पलक न बीसरे," वो वैसा हो जाता है कि पलक मूँदने में भी जितना समय लगता है उतने समय के लिए भी फिर वो प्रेम आपसे दूर नहीं होता। समझ में आ रही है बात?
नहीं तो ये रोना लेकर के आप पूरी ज़िंदगी जी लो, आपकी कुछ उम्र होगी – 25, 35 जो भी हो रहे हो आप, और बहुत जल्दी आप पाओगे कि आप सेवानिवृत्ति की हालत में आ गए हो। जो लोग यहाँ किसी भी उम्र के हों, उनसे पूछो कि पिछले 10 साल कैसे बीते, तो कहेंगे, “ऐसे! पलक झपकी और पूरा दशक बीत गया, पता ही नहीं चला समय कहाँ गया।”
तो ये सोचोगे कि जो सही है, सार्थक है वो ख़ुद होगा, तो वो नहीं होगा उसे ज़बरदस्ती करना पड़ता है। स्वयं को मजबूर करना पड़ता है। कुछ भी जो अच्छा है वो यूँ ही अपने आप नहीं हो जाता, अपने आप तो बस वही होता है — गड्ढा, कि गड्ढे में गिर गए। कभी सुना है कि "अरे, धोखे से हम हिमालय पे चढ़ गए," ये ज़रूर सुना होगा, "धोखे से गटर में गिर गए।"
गटर में धोखे से गिर सकते हो, शिखर पर धोखे से कभी नहीं पहुँचोगे। तो गटर और शिखर में अंतर करना सीखो, गटर आसान होता है लेकिन गटर तो फिर गटर है। ज़िंदगी गटर बनानी है तो जो सामने हो और आकर्षक लग रहा हो तुरंत उसी से कर लो प्रेम, ज़िंदगी पूरी गटर बनेगी। "कि दिखा और हम बहक गए" और क्या बोलोगे? “हो गवो, अभी-अभी हुआ है लव एट फर्स्ट साइट। बिजली सी गिरी और दिल पे लगी!" क्या है? डार्विन नहीं पढ़ा? इवोल्यूशन नहीं पढ़ा? नहीं जानते हो ये सब क्या होता है? हार्मोनल स्टिमुलाई। टफ लव, टफ पीपल टफ लव, स्लाईमि पीपल स्लाईमि लव।
किसी व्यक्ति को जानना हो तो यही देख लो उसे कौन सी चीज़ें पसंद हैं या कौन से इंसान पसंद हैं, देख लो। और कैसे जानोगे किसी को अपने मुँह से तो सब अपनी बड़ाई कर देते हैं। सचमुच जानना है कि किसका चरित्र क्या है, तो बस ये देख लो उसे पसंद क्या है, या पसंद कौन है। मजबूर करो — मजबूर।
कितनी किताबों का मैंने आपके लिए नाम लिया है इतनी बार, उसमें से कोई किताब ऐसी नहीं है जिसको आप स्वेच्छा से और मज़े से और बिल्कुल उत्साह में कूदकर स्वयं पढ़ोगे, कभी नहीं होने वाला। किसी ने अभी कम्युनिटी पर "अन्ना कारेनीना" का एक चित्र डाल दिया। इतनी मोटी है वो ख़रीद ली तो ख़रीद ली। कहोगे, “अब कोई बात नहीं, ₹350 डूब गए दिल पर पत्थर रख के भूल जाएँगे।” पढ़ के दिखाओ।
हाँ, अभी कुछ वो आ जाए हमारे समय में चलती थी "मस्तराम," फुटपाथ पर मिलती थी, हॉस्टल में घूमती थी। तो देखो, कैसे लपक के पढ़ोगे दोगे नहीं किसी को। "अन्ना कारेनीना" में फ़र्क तो होगा ना, एक आकर्षक है और दूसरे की ओर जाने के लिए ख़ुद को मजबूर ही करना पड़ेगा। और मैं लेकिन दे रहा हूँ आश्वस्ति, एक बिंदु आता है जिसके बाद मजबूर कम करना पड़ता है।
“अब मनवा हंसा भया, मोती चुन-चुन खात,” मन हंस हो जाता है।
पहले तो मन कागा था, करता आतमघात। अब मनवा हंसा भया, मोती चुग-चुग खात।
ऐसा हो जाता है कि उसके बाद वो कौए वाली चीज़ें खाने का मन ही नहीं करता। कोई सामने भी ला के रख देगा, "ये पढ़ लो, ये है, वो है,” 50 चीज़ें हैं, "ये पेज-3 अख़बार का ये पढ़ लो, ये tabloids हैं ये देख लो, ये बेकार की चीज़ें, व्हाट्सऐप फॉरवर्ड्स पढ़ लो," मन ही नहीं करेगा। इंसान दूसरे हो गए हो, चीज़ दूसरी हो गई हो, भूखे रह जाओगे टट्टी नहीं खाओगे।
कौआ? (जमीन में अपनी चोंच मारता रहता है)
हम कौएहैं। कौए का क्या काम? (जमीन में अपनी चोंच मारता रहता है) उसके सामने आप ला के बिल्कुल आप स्वादिष्ट, ताज़ा फल रख दो एकदम। और दूसरी तरफ़ पड़ा हो भैंस का सड़ा हुआ गू चार दिन का। कौवा कहाँ चोंच डालेगा? और सेब दे दो तुम कौवे को, इधर सेब रखा है उधर वो सड़ा हुआ गोबर, कौवा क्या करेगा? हम कौवे होते हैं।
प्रमाण बताए देता हूँ मैं।
वैसे तो अगर हमारी पब्लिशिंग टीम को ज़रा भी अक़्ल होगी तो ये जो अभी बात हो रही है ये पब्लिश नहीं होगी, पर अगर ये पब्लिश हो गई तो मजाल है कि इसके व्यूज़ आ जाएँ। ये सेब है और पूरी जो यूट्यूब की ऑडियंस है वो कौआ है। उसको जहाँ सड़ा हुआ वो भी नहीं कि ताज़ा है, जो एकदम सड़ा हुआ जिसमें दहकते हुए कीड़े जश्न कर रहे हों, उसको जहाँ पर वो कंटेंट मिलेगा, वो वहाँ जाकर के मुँह मार देगी। वहाँ पर 3 मिलियन व्यू, 30 मिलियन व्यू, 300 मिलियन व्यू। और अभी ये जब पब्लिश होगा मजाल है कोई इसको देख ले।
ये सेब है ताज़ा, इसे कोई नहीं देखेगा। हम कौवे होते हैं।
मजबूर करो अपने आप को, मजबूर — आत्म-अनुशासन। कड़ाई करो थोड़ी अपने साथ, हम इस लायक नहीं हैं कि अपने आप को बहुत ढील दें, मोहलत दें, रियायत दें, अपने ऊपर सख़्ती किया करो। जैसे कहते हो ना, "दूसरे की क्यों सुनें?" वैसे सबसे पहले कहा करो, "अपनी तो नहीं सुनेंगे।"
हाँ महर्षि, सबसे पहला सूत्र क्या है? "अपनी नहीं सुनूँगा।" क्योंकि तुम्हारे भीतर पता नहीं क्या-क्या बैठा हुआ है, न जाने कितने प्रकार के जानवरों का सम्मिलित, प्रागैतिहासिक, आदिकालीन, फ़र्मेंटेड। “अपनी नहीं सुननी है।” नहीं तो यही जो कशमकश है, आपकी चलती रहेगी। मैं कह रहा हूँ, 25-35 के आप हो गए होगे, यही कशमकश लिए-लिए मर जाओगे।
कोई मीठी चाशनी वाली बात करने का कोई मतलब नहीं, अभी मर जाओगे। और यही कहते रह जाओगे, बहुत कुछ कर सकते थे, जानते भी थे सही क्या है पर जो सही था कभी किया नहीं, जो सच था उसे कभी जिया नहीं, पता नहीं वक़्त कहाँ निकल गया। खैर कोई बात नहीं, माया है। ज़िंदगी तो सभी को गटर में डालती है हम भी डाले गए, उसमें क्या है?” ये सब फिर शायरी बचेगी बस। लूज़र शायरी।
ट्रक के पीछे वाली शायरी, व्हॉट्सऐप शायरी –
“वक़्त करता जो वफ़ा, आप हमारे होते, हम भी ग़ैरों की तरह आपको प्यारे होते।” लूज़र शायरी।
तुम इस लायक हो कि कोई भी ढंग का आदमी तुम्हारा हो, तुम्हारे जैसों को हम ये नहीं बोलते कि जाकर नहा के आओ, शॉवर ले आओ। तुम्हारे जैसों को बोलते हैं, जाओ, फ्लश करके आओ। ऐसे ही तो होते हैं। ये मैं ऐसा नहीं कि किसी और को, सब हम ऐसे ही होते हैं। हम कौवे हैं, हम में "मैं" भी हूँ।
जिसको अभी कुछ पता ही नहीं चला उसको तो एक बार माफ़ भी कर दिया जाए, कुछ जानता नहीं। पर आप लोग सब जो मेरे साथ हो और आप में से कई लोग अब साल, डेढ़ साल, दो साल से मेरे साथ हो, गीता हमारी यात्रा है, यज्ञ है। हो ही नहीं सकता कि आपने आधे सत्र भी सुने हों और आपको पता न चला हो कि सही क्या है, या कम से कम थोड़ी आहट न आने लग गई हो सही दिशा की। इतना तो पता लगने लग गया होगा। उसके बाद भी अगर आप कहते हो कि "जो सही है, वो मैं करता नहीं हूँ" तो फिर आप जानो, आपका काम जाने, मेरा कोई लेना-देना नहीं, अभी मर जाओगे।
जब से गीता-समागम शुरू हुआ है, उतने समय में अभी तक आपको क्या लग रहा है, जिन्होंने सब साथियों ने यात्रा साथ शुरू की थी, वो सब अभी शेष हैं? नहीं, मैं ये नहीं बोल रहा कि वो कोर्स से हट गए, “उड़ जाएगा हंस अकेला।” उसके बाद हाथ मलते रहना कि "अरे, जो सही था, वो कभी किया नहीं।" यही मौका है करना है तो कर लो, नहीं तो शायरी कर लो। आ रही है बात समझ में?
और ये आठवीं बार दोहरा रहा हूँ — जो सही है, वो करने का मन कभी भी नहीं करेगा। और कोई माफ़ी उसकी नहीं, जो जानता है क्या सही है, उसके बाद भी नहीं करता।
बहुत सुंदर वक्तव्य है मेरे ख़्याल से आइऩ रैंड का: “इफ़ यू नो व्हाट इज़ राइट ऐंड स्टिल यू डोंट डू इट, देन यू डू नॉट नो व्हाट इज़ राइट ऐंड यू आर नॉट अ मैन।”
तुम इंसान ही नहीं हो। जिसको अभी तक पता नहीं है कि क्या सही है उसको तो माफ़ कर दें, जो जान गया है क्या सही है उसको कैसे माफ़ करें? तुम्हें अच्छे से पता है कि क्या सही है, तुम्हें क्या करना है। "यू आर नॉट अ मैन। "तुम इंसान नहीं हो, तुम जानवर हो।" और फिर तुम्हारे साथ ज़िंदगी बर्ताव भी जानवर वाला ही करती है।
अर्जुन को नहीं समझ में आ रही गीता, श्रीकृष्ण समझा रहे हैं, समझाते जा रहे हैं। किसी बिंदु पर आकर के अर्जुन बोल दे, "समझ तो मैं सब गया हूँ, पर फिर भी नहीं करना, जो सही है वो नहीं करना, नहीं लड़ूँगा।" तो फिर श्रीकृष्ण आगे कुछ बोलेंगे ही नहीं। वो बोल इसलिए रहे हैं, ताकि अर्जुन समझ जाए। समझने के बाद भी या समझने का दावा न करने के बाद भी जो समझी हुई चीज़ को जिए नहीं उसको तो फिर यही कहेंगे: "यू आर नॉट अ मैन,* तुम जानवर हो, तुमसे क्या बात करें?
क्या गाते हो तुम? "कि पत्ता टूटा जो डाल से,” क्या है? अरे तो ज़ोर से बोलोगे? बुदबुदाओगे?
श्रोता: “बहुरि न लागे डार।”
आचार्य प्रशांत: “बहुरि न लागे डार।” बार-बार मौत याद दिला रहा हूँ, एक बार पत्ता टूटेगा डाल से दोबारा नहीं आके लगने वाला। किसकी प्रतीक्षा में हो, अपनी भलाई चाहते हो तो अपने को मजबूर करके रखो। और प्रेम तो ख़ासतौर पर ऐसी चीज़ है, जो अपनी स्वेच्छा, स्वच्छंदता में कभी कर मत डालना। वो स्वच्छंदता नहीं होती वो उदंडता होती है, जिसको हम प्रेम का नाम देते हैं। प्रेम सीखो।
साफ़ अपने आप को बता दो, "जो ऊँचा है, बस वही हमारे प्रेम का हक़दार है।" बाक़ी नीचे वाले कितने भी लुभा रहे हों, आकर्षक लग रहे हों, मीठे लग रहे हों, तुम उन्हें प्रेम नहीं कर सकते। प्रेम बहुत बहुत बड़ी बात है, तुम्हारे जैसे छोटे आदमी के लिए तो नहीं हो सकती ना वो। इतनी बड़ी बात, इतना छोटा आदमी, मामला ठीक बैठेगा ही नहीं।
मजबूर तो देखो होना ही है, या तो ख़ुद को मजबूर कर दो सही से प्रेम करने के लिए नहीं दुनिया मजबूर कर देगी ग़लत से बंध जाने के लिए। अब चुन लो कि कौन सी मजबूरी चाहिए। और फिर दोहरा रहा हूँ, सही बंधन को अपना के आज़ादी मिल जाती है।