इंसान के लिए बड़ी ये विडंबना की कह लो या मज़े की बात कह लो, ये है कि अगर उसको मुक्ति चाहिए तो उसे "सही बंधन" चुनना पड़ेगा। और कुछ ऐसे उत्साही होते हैं वो कहते हैं, "जब मुक्ति लक्ष्य है, तो बंधन क्यों चुनें?" साहब, मुक्ति, मैं कई बार चेता चुका हूँ मुक्ति कुछ नहीं होती बंधन ही बंधन होते हैं, या तो सही बंधन या ग़लत बंधन। जो सही बंधन चुन लेता है वो मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ता रहता है, और जो मुक्ति को चुन लेता है वो गहरे बंधनों में फँस जाता है।
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आचार्य प्रशांत: जो सही होता है न वो हमें बहुत सुंदर नहीं लगता, आकर्षक, ठीक है। और मन इतने से नहीं मानता कि कुछ सही है, मन को जो सही है वो प्रिय भी लगना चाहिए। जो सही होगा मन उससे दूर भागता है, क्योंकि मन ने सौंदर्य, जो सही नहीं है उसमें देखने का अभ्यास कर लिया है। तो क्या करना होगा? जो सही है, उससे अपने आपको बाँध दो, तब तक बाँधे रखो जब तक जो सही है वही सुंदर न लगने लगे। क्योंकि सचमुच जो सही है, सुंदर तो वही है पर वो हमें सुंदर लगता नहीं, प्रिय नहीं लगता, आकर्षक नहीं लगता, क्योंकि हमने अभ्यास कर लिया है दूसरी फ़िजूल चीज़ों को सुंदर मानने का।
"सुंदरता" क्या है? वो एक सिद्धांत ही तो है जो समाज से सीखा है, कि किसको हम 'सौंदर्य' बोलते हैं। तो वो जो सिद्धांत है, वो बहुत उल्टा-पुल्टा और आत्मसात हो गया है। तो जो सही है, आपकी बुद्धि और बोध कह रहे हैं कि सही तो यही है, उसके सामने अपने आपको मजबूर कर दो बाँध लो अपने आपको वहाँ पर, तब तक बाँधे रखो जब तक बाँधने की फिर ज़रूरत ही ख़त्म न हो जाए।
ज़रूरत कब ख़त्म होती है? जब जो सही है, वही सुंदर लगने लग जाता है, अब ख़ुद ही वहाँ से नहीं भागोगे क्योंकि अब सुंदर लग रहा है न।
सबसे ख़तरनाक स्थिति उनकी होती है जो जानते हैं कि क्या सही है और फिर भी भाग रहे होते हैं दूसरी दिशा में, क्योंकि जो सही है, वो उनकी ज़िंदगी में ज़रा देर से आया। देर से आया, उससे पहले ही उनके मन को इधर-उधर की 50 चीज़ों ने विकृत और भ्रष्ट कर दिया था। इस हद तक भ्रष्ट कर दिया था कि उनका जो ‘सुंदरता का




