
प्रश्नकर्ता: हेलो सर। मेरा क्वेश्चन एजुकेशन को लेकर था। तो थोड़ा कॉन्टेक्स्ट के लिए, मैं एक साल से आपको सुनने के बाद काफ़ी काम कर रहा हूँ बैंगलोर में, हमने आई.एस.सी में क्लब भी बनाया है, जिससे हम बच्चों के लिए, मोस्टली अंडर प्रिविलेज़्ड बच्चों के लिए, एजुकेशन पर काम करते हैं, अपलिफ्टमेंट के लिए।
बट मेरे साथ प्रॉब्लम क्या होती है मुझे लगता है कि जो मैं एफर्ट्स डाल रहा हूँ, उनका इफेक्ट नहीं निकलेगा, ड्यू टू, टू रीज़न्स। वन इज़ दैट जब तक वो सेंट्रल आईडिया नहीं है कि एजुकेशन होनी क्या चाहिए, एक्चुअली, तब तक मैं उनका शायद अच्छा करने भी जाऊँगा इंटेंशन के साथ तो शायद मैं मतलब इतना इफेक्ट नहीं डाल पाऊँगा। और दूसरा, मैं कोशिश करने के बाद उनको भेज भी दूँ, तो मैं भेज भी उनको इसी सिस्टम में रह रहा हूँ, जिसमें यही सब जैसे चल रहा है, प्लेसमेंट के पीछे भागना और फाइनेंशियल गोल्स के पीछे भागना। तो मैं उनको पुश भी इसी सिस्टम में कर रहा हूँ।
तो बहुत बड़ा रेडिकल या तो शिफ्ट चाहिए, या फिर इन दो प्रॉब्लम्स की वजह से मुझे लगता है कि मेरे एफर्ट्स, जो हैं, वो काम नहीं कर पा रहे हैं। आइ वॉन्टेड यू टू एक्सप्लेन कि प्रिसाइसली क्या एजुकेशन होनी चाहिए? और क्यों उस बच्चे को एजुकेट होना चाहिए? उस चीज़ की इंक्वायरी करना चाहते हैं हम।
आचार्य प्रशांत: बहुत बड़ा सवाल है, इसके लिए तो पूरी किताब लिखनी पड़ेगी। किताब है भी, आप उसको पढ़ भी सकते हो।
संक्षेप में कहूँ तो, एक तो एजुकेशन हमें इसलिए चाहिए ताकि कपड़े पहन सकें और रोटी खा सकें। ठीक है? क्योंकि कपड़े नहीं मिल रहे और रोटी नहीं मिल रही है, तो बाक़ी बातें हो नहीं पाती हैं। बहुत आदर्शवाद काम आता नहीं है फिर। आप सब भी यहाँ बैठे हैं, तो मैं भी यहाँ खड़ा हूँ क्योंकि यहाँ का वातावरण ठीक-ठाक है, तापमान ठीक है। बहुत उमस नहीं है, हमारे पेट भरे हुए हैं। ठीक है? और हमारे पास कपड़े हैं, हम नंगे नहीं खड़े हैं। और ऐसा भी नहीं हो रहा है कि हमें लग रहा है कि यहाँ से बाहर निकलेंगे तो कहीं जाने को नहीं है, सबके पास घर वग़ैरह कुछ न कुछ है। तो इसलिए हम ये सब बात कर पा रहे हैं। तो एक शिक्षा तो वो चाहिए, जिससे ये सब संभव हो पाए।
उसको आप कह सकते हैं हाइजीन फैक्टर्स। ऐसे होते हैं न हाइजीन फैक्टर्स, माने दैट आर नेसेसरी बट नॉट सफ़िशिएंट। ये नेसेसरी बातें होती हैं। ये माइक ना काम करे तो हमारी बात नहीं हो पाएगी, लेकिन हमारी बात कोई इस माइक की वजह से नहीं हो रही है। तो ये कौन सा फैक्टर हो गया उस अर्थ में? नेसेसरी बट नॉट सफ़िशिएंट। ये नेसेसरी ये सफ़िशिएंट भी हो जाए अगर, तो मैं माइक यहाँ रख के ख़ुद चला जाऊँ। बोलो माइक से ही बात कर लो। पर अगर माइक ना हो, तो भी समस्या आएगी।
तो एक शिक्षा चाहिए जो हमें माइक बनाना सिखाए। जो इलेक्ट्रॉनिक्स और इकोनॉमिक्स सिखाती है, सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक्स से भी काम नहीं चलेगा। इकोनॉमिक्स नहीं है, तो माइक अफोर्डेबल ही नहीं हो पाएगा। तो इलेक्ट्रॉनिक्स भी चाहिए, इकोनॉमिक्स भी चाहिए। एक ये ही वाली शिक्षा चाहिए।
भाषा चाहिए, भाषा न हो तो हम कैसे बात करेंगे? हुलु-लुलु करेंगे। आप भी कर रहे हैं, मैं भी कर रहा हूँ। कितना अजीब होगा। तो कोई-न-कोई तो चाहिए न, जो हमें भाषाएँ सिखाए। गणित सीखनी पड़ेगी, नहीं तो गिनती ना हो पाए कि यहाँ कितनी कुर्सियाँ हैं, वहाँ कितनी कुर्सियाँ हैं, लोग आए हैं या नहीं आए हैं, क्या कर रहे हैं। सोचो, बैठ कर ऐसे (कुर्सियाँ गिनने का मूक प्रदर्शन करते हुए) कर रहे हैं।
तो एक तो ये शिक्षा, और दूसरी शिक्षा चाहिए जो हमें इंसान बनाए, क्योंकि सिर्फ़ रोटी, कपड़ा, मकान हो जाए, तो काम चलने लग जाता है, पर हम इसलिए नहीं पैदा हुए हैं कि बस काम चलता रहे। इंसान होना एक बहुत बड़ी संभावना होती है, एक ज़बरदस्त अवसर है। उसको हम खा के पी के, कपड़े पहन के, हाथ में माइक ले कर के, कंधे पर झोला टांग के, कुछ पैसे कमा के, शादी-ब्याह करके, बच्चे पैदा करके, घर ख़रीद के और मर जाएँ। तो कितना अजीब है न ये? कोई पूछे क्या किया उम्र भर? तो बोले, पैदा हुए थे, वो तो पक्का ऐसा लग रहा है कि पैदा…। उसके बाद 25 साल इधर-उधर जाकर किसी तरह पास-वास हो गए, कुछ लोग 28-30 साल भी लगा देते हैं, लगा दिए। उसके बाद कुछ कमाने धमाने लगे। क्योंकि जब 30 साल पढ़ोगे, तो कमाने-धमाने तो लगोगे ही रो-धो के।
तो उसके बाद फिर जब पैसा आने लग गया, तो शादी-ब्याह हो गया, दो-तीन बच्चे हो गए। उन्होंने हमारा खून पिया, हमने उनका खून पिया। और उसके बाद, हमने फिर जो हमसे कराया था, वही हमने उनसे करवाया कि हम बर्बाद हुए, तुम्हें भी करेंगे। उसके बाद ये सब करने के कारण दिल की बीमारी हो गई और एक दिन टॉयलेट में गिर के मर गए। लाश मिली, मुँह कॉमोड के अंदर था। ये है हमारा महान गरिमामयी जीवन, जिसको हम कहते हैं द ग्रेट डिग्निफाइड ह्यूमन लाइफ़। यही है, और इससे अलग किसी की कुछ हो तो बता दो कहानी। तो इसलिए पैदा हुए हो क्या?
तो फिर एक शिक्षा चाहिए जो जीवन को उद्देश्य और ऊँचाई दे सके, नहीं तो उसके बिना बस ऐसे ही रहेगा, तुम झोला लेकर, मैं माइक लेकर हम भटकते रहेंगे और मर जाएँगे, समझ रहे हो?
तो ये दो तरह की शिक्षाएँ हैं जो चाहिए होती हैं। वेदान्त एक को विद्या, एक को अविद्या बोलता है। अभी जैसी दुनिया चल रही है, उसमें वो वाली शिक्षा तो खूब है — इलेक्ट्रॉनिक्स और इकोनॉमिक्स वाली। वो जो दूसरी है, असली वाली जो ज़िंदगी को बर्बाद होने से बचाए, वो शिक्षा कोई नहीं देता। जो संस्था है, सब लोग हैं, गीता प्रतिभागी बहुत सारे बैठे हैं।
आपकी जो संस्था है, वो वही काम कर रही है कि जो दूसरी और ज़्यादा आवश्यक शिक्षा है, वो लोगों को दे पाए।
प्रश्नकर्ता: सर, एक छोटा सा फॉलो-अप था, कि फिर जैसे मैं एक काम करता हूँ, मेरा एक साइड है जैसे मेरी स्टडीज़ हैं, पीएचडी जैसे मेरी चल रही है, तो मुझे वो भी पार्ट बहुत अच्छा लगता है — फ़िज़िक्स के बारे में पढ़ना और पूरा समझना नेचर को डीपेस्ट लेवल पर। और फिर दूसरी तरफ़ मैं ऐसे इनजस्टिस देखता हूँ, जैसे एजुकेशन है, लोग प्रॉब्लम में अलग-अलग इनजस्टिस।
तो एक बार उसको देखने के बाद मैं मुँह भी नहीं मोड़ पाता हूँ। तो फिर दोनों में एक थोड़ा सा डिसोनेंस आता है। क्योंकि दोनों ही क्षेत्रों में अगर मुझे इफेक्ट डालना है, सीरियस, तो मुझे पूरा ध्यान उसमें देना पड़ेगा। तो क्या बैलेंस बनाया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: बैलेंस नहीं है। पहला माध्यम है, दूसरा अंत है। पहला मीन्स है, दूसरा एंड है।
आप जो कुछ भी पढ़ रहे हो, जिस भी क्षेत्र में आपकी पीएचडी है, जो भी है, आप इसीलिए पढ़ रहे हो ताकि एक सार्थक जीवन ख़ुद को और दूसरों को दे सको। तो इसमें कोई बैलेंस बनाने की बात नहीं है।
शिक्षा इसलिए ली जाती है ताकि आपको सशक्त कर सके, एमपावर कर सके, ताकि आप दुनिया में जाकर के कोई अच्छा काम कर सको।
उसमें बैलेंस थोड़ी बनाना है। लोग पूछते हैं कि आपने आई.आई.टी, आई.आई.एम करके ये क्यों किया? तो क्या बिल्कुल अनपढ़ रह के करता? ये कैसा सवाल है?
भाई, एजुकेशन का काम है एमपावर करना, ताकि आप और बेहतर चुनाव कर सको। ये थोड़ी कि अब मैंनेजमेंट कर लिया है, तो मैनेजर ही बनो। वो तो फिर आपके जो विकल्प थे, उनको और सीमित कर दिया गया न। कि नहीं पढ़े-लिखे थे, तो फिर भी 10 काम कर सकते थे। अब पढ़-लिख गए हो, तो एक ही काम करोगे। ये कौन सी शिक्षा है?
तो जो टेक्नोलॉजी में सीखा, जो मैनेजमेंट में सीखा, उसका जो सबसे बेहतरीन इस्तेमाल हो सकता था, वो हम कर रहे हैं। अभी भी एक ऑर्गेनाइज़ेशन है, बहुत बड़ा ऑर्गेनाइज़ेशन है। इसको आप एक नॉन-प्रॉफिट स्टार्टअप बोल सकते हो। है न? और उसको मैनेज कर रहे हैं, तो मैनेजमेंट स्किल तो लगती होगी उसमें सारी। इसमें बैलेंस की तो कोई बात नहीं है। आपने टेक्नोलॉजी सीखी, आपने मैनेजमेंट सीखा। चलिए अब उसको किसी सार्थक काम में लगाइए।
आप भी जो कुछ सीख रहे हो, उसको किसी सार्थक काम में लगा दो।