
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपके चिर-परिचित अन्दाज़ को दर्शन देने के लिए भोपाल में बहुत-बहुत धन्यवाद। जो आपके प्रश्नों के उत्तर होते हैं, उसी शैली और उसी अन्दाज़ से प्रेरित होकर मेरा ये प्रश्न था।
पिछले दस वर्षों से मैं देश के अलग-अलग क्षेत्रों में यात्रा कर रहा हूँ, जिसमें मैं महावारी स्वच्छता प्रोग्राम को लेकर काम करता हूँ, मेंस्ट्रुएशन हाइजीन को लेकर। जिसमें मैं अवेयरनेस कैम्पेन करता हूँ। एक लो-कॉस्ट सैनेटरी नैपकिन मेकिंग मशीन हमने बनाई है, उसका इंस्टॉलेशन करते हैं, ट्रेनिंग करते हैं।
शुरुआत में जब मैं काम करता था तो मुझे ये महसूस होता था कि ये जो सोशल टैबू है, ये जो सामाजिक कलंक है, मेंस्ट्रुएशन हाइजीन पर बातचीत करना, ये केवल गाँव या कुछ पिछड़े इलाक़ों तक ही सीमित है। जब मैं शहरों में गया, महानगरों में गया, विदेशों की भी यात्रा की है कुछ जगह इसी काम को लेकर, तो लगा ये लगभग कॉमन है। हर जगह वही स्थिति है लगभग, इस पर बातचीत नहीं होती है।
तो मैं पूछना चाह रहा था कि क्या आपकी फिलॉसफी के हिसाब से, अपने एजुकेशन सिस्टम के हिसाब से कुछ सॉल्यूशन है इसका? क्या हम इस सामाजिक कलंक से दूर जा पाएँगे, जो कि सदियों से चला आ रहा है? और कितने वर्ष, लगभग कितने दशक तक हमें इंतज़ार करना पड़ेगा कि हम कभी मेंस्ट्रुएशन हाइजीन को लेकर नॉर्मल हो पाएँगे? थैंक यू।
आचार्य प्रशांत: मेंस्ट्रुएशन को लेकर जो बड़ा हौवा है, उसको जो एक टैबू की तरह हम देखते हैं, उसका कारण ये नहीं है कि हम मेंस्ट्रुएशन को लेकर अनकंफ़र्टेबल रहते हैं। उसका कारण ये नहीं है कि हमें अजीब लगता है, असंगत लगता है कि ये मेंस्ट्रुएशन क्या चीज़ होती है। उसका कारण थोड़ा उससे आगे का है एक कदम, हम सेक्स को लेकर ही अभी तक सहज नहीं हो पाए हैं। हमारी असहजता मेंस्ट्रुएशन, मासिक-चक्र से उतनी नहीं है, हमारी असहजता सीधे-सीधे सेक्स से है। और उसके पीछे बड़ा गहरा कारण है, जो अगर हम समझेंगे तो जीवन को ही समग्रता से समझने में मदद मिलेगी।
देखिए, इंसान है तो जंगल से निकला हुआ जानवर ही और जानवरों की सारी प्रकृति उसमें बैठी हुई है। बस जानवरों के पास जो कुछ है उससे थोड़ा अतिरिक्त है मनुष्य के पास, लेकिन मनुष्य वो सब भी लेकर चल रहा है जो जानवरों के पास है। थोड़ा-सा अतिरिक्त क्या है हमारे पास? चेतना। हम सोच-समझ सकते हैं, हम स्वयं को देख सकते हैं, अपनी हालत का अवलोकन कर सकते हैं, जो कि पशु नहीं कर सकते। पशुओं के पास बस वृत्तियाँ होती हैं और वृत्ति-जनित कामनाएँ होती हैं, मनुष्य के पास चेतना भी होती है। इतना ही-सा अंतर है। तो
मनुष्य वो है जो ख़ुद को देख पाए, मनुष्य वो है जो अपने बंधनों को पहचान पाए और उनसे लड़ पाए।
है न? और इसी चीज़ को वास्तव में धर्म कहा जाता है, ख़ुद को जान-समझ पाना, अपने बंधनों को देख पाना और उनसे लड़ पाना।
अब जब बंधनों की बात आती है तो जो सबसे बड़ा बंधन है हमारा, वो हमारी पाश्विक प्रवृत्ति है — पाश्विक प्रवृत्ति। क्योंकि जंगल से ही आए हैं तो पशुओं वाली जो प्रवृत्तियाँ हैं, वो तो हम में मौजूद ही हैं। और पाश्विक प्रवृत्ति में भी जो सबसे ज़्यादा बल रखती है, जो एकदम प्रचण्ड आग की तरह होती है, वो होती है कामवासना। और पशुओं में भी वो उतना ही बल रखती है, वो प्रकृति की सबसे चहेती वृत्ति है क्योंकि उसी से प्रकृति का चक्र आगे बढ़ता है। कोई जीव हो, उसमें और कोई वृत्ति हो न हो, कामवासना ज़रूर होती है। क्योंकि कामवासना नहीं रहेगी तो प्रकृति जो चाहती है, कि तुम्हारा काम समय में आगे बढ़ता रहे, तुम मर जाओगे, अगली पीढ़ी आती रहे, वो काम होगा ही नहीं न।
बाक़ी सब वृत्तियों पर वासना भारी पड़ जाती है। ऋषि भृर्तहरि थे, एक जगह पर वो उदाहरण के तौर पर कहते हैं, कुत्ता देखो, वो बिल्कुल सूखकर दो हड्डी हो चुका है और दस जगह उसके घाव हैं और वो लँगड़ा-लँगड़ा कर चल रहा है और उसके घाव से मवाद बह रहा है, ख़ून बह रहा है। लेकिन फिर भी वो वासना से ही आतुर है, जा वो किसी कुतिया के पीछे ही रहा है। थोड़ी देर में वहाँ जाकर हो सकता है वो मर भी जाए। पर उसे अपनी ज़िंदगी की, अपने खाने-पीने की भी उतनी परवाह नहीं है जितनी उसको वासना चाहिए।
तो अब इंसान बनना है तो भाई, स्वयं को जीतना पड़ेगा, अपने बंधन तोड़ने पड़ेंगे। और बंधन माने यही कि जिधर शरीर ने नचाया उधर को नाच दिए, और बंधनों में एक बड़ा बंधन होता है कामवासना। क़ायदे से धर्म ऐसा होना चाहिए था जो आपको कुछ ऐसा देता कि उसके आगे वासना छोटी चीज़ पड़ जाती। धर्म का ये काम होना चाहिए था, कि धर्म ने आपको कुछ ऐसा दिखा दिया, कुछ ऐसा समझा दिया कि उससे वासना मिट तो नहीं गई लेकिन नम्बर दो की चीज़ हो गई, नम्बर एक पर कोई और आ गया। ये धर्म की सफलता होती।
और वास्तविक धर्म का यही उद्देश्य होता है। वो ये नहीं कहता कि प्रकृति की जो तुम्हारी क्रियाएँ हैं, वो सब बंद कर दो। वो कहता है, वो सब चलती रहेंगी अपनी जगह, लेकिन मैं उन सबको किसी और चीज़ का अनुगामी बना दूँगा। मैं तुम्हें कुछ ऐसा दे दूँगा कि बाक़ी सब चीज़ें जिसके पीछे-पीछे चलने लगें। बाक़ी सब चीज़ें भी चलती रहेंगी लेकिन वो अब आगे-आगे नहीं चलेंगी, वो पीछे-पीछे चलेंगी। ये असली धर्म का काम होता है।
तो धर्म का काम तो ये था कि वो आपको नम्बर एक वाली चीज़ दे दे, और असली धर्म जहाँ कहीं भी पनपा, उसने वो चीज़ दी भी। और सबसे सशक्त रूप में तो भारत ने दी। उसने वो चीज़ दी है, निस्सन्देह दी है। षड्दर्शन है, आप वहाँ पर जाएँ, आप वेदान्त के पास जाएँ, उपनिषदों के पास जाएँ, अष्टावक्र के पास जाएँ, आप भगवद्गीता के पास जाएँ। वहाँ आपको वो मिलता है जो जीवन में प्रथम स्थान का अधिकारी है। वो नम्बर एक की जो चीज़ है न, वो वहाँ मिल जाती है।
तो असली धर्म वो चीज़ देता है जिसके बाद आप अपने पाश्विक बंधनों से आज़ाद हो सकते हैं, वो असली धर्म देता है। पर असली धर्म को हमने बड़ा मिश्रित कर दिया, ख़ूब उसमें गोलमाल, घपला, मिलावट कर दी। तो उससे बन गया लोकधर्म। लोकधर्म माने वो धर्म जिसका आम आदमी पालन करता है। आम आदमी कहता अपने आपको भले धार्मिक, पर वो पालन लोकधर्म का करता है, असली धर्म से वो कोसों दूर है।
अब आप लोकधर्म का भले पालन कर रहे हों लेकिन आप उसको बोल क्या रहे हो? यही तो बोल रहे हो, मैं धार्मिक हूँ। अब अगर आप धार्मिक हो तो धार्मिकता की तो पहचान ये है कि आपने अपने बंधन तोड़े होंगे। आप मेरे साथ-साथ चल रहे हैं, आप पालन कर रहे हो लोकधर्म का। लेकिन आपका दावा तो यही है न, झूठा दावा। क्या? कि हम धार्मिक हैं।
कोई भी व्यक्ति अपने आपको लोकधार्मिक थोड़ी बोलता है। वो क्या बोलता है? मैं एक धार्मिक इंसान हूँ। मैं आस्तिक हूँ भाई, मैं आस्तिक हूँ। कोई ये नहीं बोलता कि मैं लोकआस्तिक हूँ, मेरी आस्तिकता भी बहुत सामाजिक किस्म की है, मैं लोकधार्मिक हूँ। अच्छा, ठीक है आप हो तो लोकधार्मिक, पर अपने आपको आपने यहाँ पर लेबल क्या लगा दिया है? धार्मिक।
अब अगर धार्मिक हो तो पहचान इससे होगी कि धार्मिक आदमी तो अपनी पाश्विकता को लगातार चुनौती देता चलता है। धार्मिक आदमी की पहचान ही यही है कि वो अपनी पाश्विकता को लगातार जीतता चलता है। पाश्विकता समझ रहे हो? जो भीतर ऐनिमल नेचर बैठा हुआ है। धार्मिक आदमी की पहचान ये है कि उसको जीतता चलता है, वो विजयी रहता है, वो योद्धा है, वो संघर्ष करता है और कम-से-कम भीतर तो लगातार जीतता है। यही धार्मिकता है।
लेकिन अब हम असली धार्मिक हैं नहीं, हम क्या हैं? लोकधार्मिक। लोकधार्मिक हो पर दिखाना तो यही पड़ेगा कि तुम भी जीत रहे हो, नहीं तो पोल खुल जाएगी। लोकधार्मिक हो पर प्रदर्शित तो यही कर रहे हो कि धार्मिक हो, तो धार्मिकता के लक्षण भी दिखाने पड़ेंगे, भले ही नकली लक्षण। और धार्मिकता का बड़े से बड़ा लक्षण ये होता है कि वृत्तियाँ अपने ऊपर हावी नहीं होतीं।
तो लोकधार्मिक आदमी फिर ये प्रदर्शित करता है कि सेक्स उसके लिए छोटी चीज़ है। धार्मिक आदमी के लिए सेक्स और दैहिक क्रियाएँ, जिनमें मासिक धर्म भी शामिल है, वास्तविक धार्मिक आदमी के लिए सेक्स और शरीर से संबंधित बाक़ी बातें सचमुच छोटी हो जाती हैं। छोटी माने मूल्य में छोटी, स्थान में छोटी। धार्मिक आदमी के लिए वो सारी चीज़ें सचमुच छोटी हो जाती हैं। लोकधार्मिक आदमी के लिए छोटी बिल्कुल हुई नहीं हैं, पर उसको जताना है, दिखाना है जैसे छोटी हो गई हैं, ऐज़ इफ़ दोज़ थिंग्स हैव बिकम इमटीरियल ऐण्ड इन्कॉन्सिक्वेन्शल। वो अभी छोटी हुई नहीं हैं नहीं पर उसको ऐसे दिखाना है, झूठ-मूठ, नाटक, फ़रेब।
तो धार्मिक आदमी की पहचान ये होगी कि वो सेक्स के मुद्दे को बहुत सहजता से लेगा। उसके लिए हौवा नहीं है, उसके लिए बड़ी बात नहीं है। क्यों? क्योंकि उसको वो मिल गया है, जो सबसे ऊँची चीज़ है। अब उसके आगे सेक्स वैसे ही कुछ नहीं है, दो रुपए की बात है। है तो है, नहीं है तो नहीं है। उसकी उपस्थिति बहुत मायने नहीं रखती, उसकी अनुपस्थिति भी बहुत मायने नहीं रखती है। यही धार्मिक आदमी की पहचान है।
पर जो लोकधार्मिक आदमी होगा, उसके भीतर तो जानवर अभी गुर्रा ही रहा है, भौंक ही रहा है। भीतर जानवर गुर्रा रहा है और ऊपर-ऊपर वो क्या बनकर बैठा है? धार्मिक। तो फिर वो सेक्स का दमन करता है। वो फिर सेक्सुअलिटी से डरना शुरू कर देता है। क्योंकि भीतर तो उसके सेक्सुअल जानवर हावी होकर बैठा ही हुआ है, पर ऊपर-ऊपर से उसको बनना क्या है? धार्मिक। “मैं तो साहब देह को जीता हुआ आदमी हूँ,” पर भीतर देह भौंक रही है, भीतर जानवर गुर्रा रहा है। तो वो ऊपर-ऊपर से सेक्स का ही दमन करता है, वो सेक्स को सप्रेस करता है।
बाक़ी बातें तो सप्रेस कर भी दो, किसी को पता न लगे। पर जो हमारी प्रजाति है और प्रजाति हमारी जो महिलाएँ हैं, उनके शरीर से एक चीज़ ऐसी जुड़ी हुई है हर महीने की जिसको तुम छुपा नहीं सकते। तो उस चीज़ को लेकर जो लोकधार्मिक रहे हैं, सदा से, शताब्दियों से, उन्हें बड़ी असुविधा रही है, वो बहुत परेशान रहे हैं, बड़े असहज रहे हैं। बोल रहे हैं, “हम तो इस सेक्स के मुद्दे को आँख के सामने ले आना चाहते थे।” क्योंकि आँख के सामने आता है तो हमारी पोल खुल जाती है। बाबा लोगों को देखते नहीं हो? वो अब कहेंगे, “कुछ भी कर लेना” मतलब महिलाएँ आएँगी, “हमें छूना मत, हमें छूना मत, हमें छूना मत।”
काहे, क्या हो जाएगा? विस्फोट हो जाएगा? क्या हो जाएगा? महिला छू लेगी तो क्या हो जाएगा? क्योंकि उनके लिए महिला बहुत बड़ा मुद्दा है अभी। और जो वास्तविक धार्मिक आदमी है, वो कहेगा खाल ही तो है। स्त्री की है, पुरुष की है खाल ही तो है, हाथ ही तो है, स्पर्श कर लिया तो क्या हो गया, कुछ नहीं हो गया। इसमें ऐसी क्या बड़ी बात है कि मैं बोलूँ, छूना मत, छूना मत।
ज़ेन कहानी है, आप में से कई लोगों ने पहले भी सुनी होगी। गुरु था, वो धार्मिक था। चेला कच्चा था, अभी अनाड़ी। तो उस गुरु की नकल करे वो लोकधार्मिक चेला। उसके भीतर धर्म नहीं है असली, पर उसको प्रदर्शित ऐसे करना है कि मैं भी धार्मिक हूँ।
तो गुरु-चेला चले जा रहे हैं, गुरु-चेला दोनों चले जा रहे हैं। तो एक ख़ूबसूरत जवान लड़की उनको मिली। वो उसी रास्ते पर थक के कहीं किनारे बैठ गई थी, उसके चोट-वोट भी लग गई थी पाँव में। और सामने नदी वग़ैरह रही होगी कुछ मान लो। मतलब वैसे ही जो मूल बात है, वो समझो। तो उसके चोट लगी हुई है और हमने मान लिया नदी है, कुछ है, तो वहाँ पड़ी हुई है और एकदम आकर्षक है।
तो गुरु ने उसको देखा, बोले, “क्या है? यहाँ क्यों बैठी है?” बोली, “वहीं जाना है जिधर को आप जा रहे हैं, लेकिन थक भी गई हूँ और ये ख़ून बह रहा है।” ख़ून बह रहा है। हम मासिक धर्म की बात कर रहे हैं, ठीक है। तो वो गुरु बोलता है “अच्छा, तेरे ख़ून बह रहा है, तू चल नहीं सकती, तुझे जाना भी है।” तो उसने उसको उठा लिया, कंधे पर ही बैठा लिया। और पीछे चेले के भीतर से कुत्ते भौंकने लगे। बोला, “गुरुजी छान गए मलाई आज।” और गुरु ने उसको ऐसे सहजता से बैठा लिया है और अपना चलते आ रहे हैं, चलते जा रहे हैं। नदी-वदी आई होगी, जो भी पार करा दिया उसको, जहाँ जाना था उतार दिया, अपना चलते गए।
अब वो चलते जा रहे हैं। दो घंटा, तीन घंटा बीत गया, काफ़ी समय बीत गया। गुरुजी अपना सहज चलते जा रहे हैं। चेले के भीतर खलबली मची हुई है, उथल-पुथल, वो पगलाया जा रहा है। उसे चला भी न जाए, इधर-उधर गिरे, कुछ करे। तो गुरु ने कहा, “क्या समस्या है? कुछ अजीब लग रहा है?” बोला, “हमें समझ में नहीं आ रहा है, आप इतने बड़े गुरु हैं और आपके भीतर इतना आत्मसंयम नहीं है, ख़ूबसूरत लड़की दिखी और आपने सीधे उसको शरीर से अपने लगा लिया।” तो गुरु बोलते हैं, “मैंने तो उसे कबका उतार दिया, पर तुम उसे अभी भी ढो रहे हो।” वास्तविक धर्म के लिए ये सब चीज़ें बहुत महत्त्व नहीं रखतीं, सेक्स वग़ैरह।
“पर नारी को स्पर्श न कर देना, पर पुरुष की छाया से भी दूर रहना।” वास्तविक धर्म में इन चीज़ों के लिए कोई स्थान नहीं है। पर लोकधर्म माने यही सब कुछ।
सबसे बड़ी बात लोकधर्म में क्या है? सेक्स। और सबसे पवित्र आत्मा कौन है? जो कभी सेक्स न करता हो। तो बाबाजी के पास जाओगे, वो बस एक ही चीज़ बार-बार बोलेंगे, “बेटा, ब्रह्मचर्य धारण करो और वीर्य-रक्षा करो।”
अरे भाई, बहुत चीज़ें हैं रक्षा करने के लिए। वनों की रक्षा करनी है, नदियों की रक्षा करनी है, पेड़-पौधों की रक्षा करनी है। समाज के दुर्बल वर्ग हैं, सताए हुए वर्ग हैं, मुझे उनकी रक्षा करनी है। और बाबाजी कह रहे हैं, “नहीं, तुम बस नाड़ा बाँधो, वीर्य की रक्षा करो।” क्योंकि लोकधर्म के लिए ये बहुत बड़ी बात होती है, वो बहुत परेशान हो जाते हैं। औरत दिखी नहीं कि पगला जाते हैं बिल्कुल। तो इसीलिए वो कहते हैं, “स्त्री की छाया से भी दूर रहो।” सुना होगा, “स्त्री नरक का द्वार है।” ये बात सब समझ में आ रही है न?
कोई असली आदमी कभी क्यों कहेगा कि स्त्री नरक का द्वार है। ये ज़रूर एक ऐसा आदमी है जिसके भीतर वासना उबल रही है, लेकिन इसको दिखाना ये है कि मैं तो शांत, संयमित आदमी हूँ। तो ये एक तरीका निकालता है कि कम-से-कम सबके सामने पब्लिक में, मैं स्त्री का न तो वर्णन करूँगा, न कोई उसका स्पर्श करूँगा, न उससे बात करूँगा। ये वो तरीके निकालता है। हाँ, अपने एकांत में फिर वो क्या करता है, वो अलग बात है, वो बिल्कुल दूसरा मुद्दा है। समझ में आ रही है बात?
ये अब दिखाई पड़ रहा है कि *मेन्स्ट्रुअल साइकिल*इतना बड़ा मुद्दा क्यों है, क्योंकि वो सेक्स से संबंधित है और लोकधर्म में सेक्स की बात करते ही सबके पसीने छूट जाते हैं। सबके पसीने छूट जाते हैं।
हम बोलते हैं, वो फलानी फ़िल्म है, उसे आप फ़ैमिली के साथ बैठ के देख सकते हैं। अच्छा! तो ज़रूर उसमें कोई बहुत ऊँचे सामाजिक मुद्दे पर बात हुई होगी। ज़रूर उसमें कोई बहुत क्रांतिकारी बात की गई होगी। ज़रूर उसमें कुछ ऐसा होगा कि जितने लोग हैं परिवार के, सब एक-दूसरे से बात करें और कहें, देखो, ये बात करने से हमारे-तुम्हारे जीवन में प्रकाश आता है। नहीं, फ़ैमिली के साथ बैठ के देख सकते हैं, मतलब बस एक होता है कि उसमें आगे-पीछे कहीं भी कोई शरीर, देह, सेक्स इत्यादि की बात नहीं है। ये हमारा लोकधर्म है जिसमें कि पायसनेस का, वर्च्यू का, पुण्य का सबसे बड़ा पैमाना यही है कि तुमने अपने जीवन में देह का, विशेषकर सेक्स का दमन कितना किया है। बात आ रही है समझ में?
तो इसलिए फिर तुमने सौ तरह की वर्ज़नाएँ रखीं कि “अभी अगर साइकिल चल रहा है तो किचन में नहीं जाओगी, अचार नहीं छुओगी, मन्दिर में भी नहीं जाओगी। अभी, नहीं, नहीं, नहीं वो मेन्स्ट्रुएटिंग वूमन है। वो ये नहीं करेगी, वो नहीं करेगी।”
कितनी महिलाएँ मर जाती हैं क्योंकि सेक्स इतना बड़ा ज़बरदस्त मुद्दा है कि उनको बीमारियाँ होती हैं तो डॉक्टर को जाकर बता नहीं सकतीं हैं। मेन्स्ट्रुअल हाइजीन को लेकर प्रश्न था, इन्फ़ेक्शन्स होते हैं क्योंकि इस बात को लेकर अवेयरनेस नहीं है। उस इन्फ़ेक्शन से न जाने कितनी महिलाएँ बीमार पड़ती हैं, मरती भी हैं।
जबकि ये एक बहुत सीधी, सहज-सी बात है जिसकी चर्चा करने में किसी को कोई आपत्ति होनी नहीं चाहिए। आपत्ति तो ये होनी चाहिए कि दो ही लिंग होते हैं और 50% है दुनिया की आबादी की महिलाएँ। और उनके शरीर की एक महत्त्वपूर्ण ये क्रिया होती है। तुम इसकी बात क्यों नहीं करना चाहते हो? तुम पहले ये बताओ, तुम पागल हो क्या? तुम हर चीज़ की बात कर रहे हो, तुम इस चीज़ की बात नहीं कर रहे हो। ये दुनिया की आधी आबादी के लिए एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। तुम दुनिया की आधी आबादी की उपेक्षा करके और बातों की बात करना चाहते हो? मैं क्यों करूँ दूसरी बातें? तुम ये बात करो।
पर आप जाइए और बाबाजी की शक्ल देखिए। आप बाबाजी से बस ये पूछ लीजिए, “बाबाजी, मेरा मासिक चक्र अनियमित चल रहा है।” और फिर बाबाजी की शक्ल देखिएगा। “बाबाजी, मुझे तनाव बहुत रहता है और उस कारण मेरी रिप्रोडक्टिव लाइफ़ सफ़र कर रही है।” बाबाजी की शक्ल देखिएगा।
और वही चीज़ जो उधर से चलती है, वो घर-घर में आकर हर घर की संस्कृति बन जाती है। और ये अच्छे से समझ लो, एक सीधी, सहज, साधारण चीज़ को जितना दबाओगे न, उसे अपने लिए उतना बड़ा बना लोगे। जबकि उसमें दबाने जैसा कुछ है नहीं। उसमें ऐसा कुछ नहीं है कि उसको कहो, *“लेट मी स्वीप इट अण्डर द कार्पेट, छुपा दो। अरे-रे-रे-रे! ये कैसी बात कर दी! ये बात क्यों कर रहे हो? ये तो गंदी बातें होती हैं।”
गंदी बात क्या होती है? शरीर है। मिट्टी से वो शरीर उठता है, मिट्टी में मिल जाता है, मिट्टी है। उसमें माने गंदी बात क्या होती है? आप टट्टी-पेशाब की भी बात कर सकते हो, पर रक्त की बात नहीं कर सकते। क्या है इसमें, गंदा क्या है? और वो गंदा है तो फिर गर्भाशय ही गंदा है, और गर्भाशय गंदा है तो दुनिया की सारी आबादी गंदी है। एक-एक इंसान वहीं से आ रहा है। तो गंदा क्या है?
पर जो उसका मनोवैज्ञानिक कारण समझ में आ रहा है न? वी आर हाईली अनकंफ़र्टेबल विथ सेक्स इटसेल्फ। व्हाइ? बिकोज़ सेक्स हैज़ काँस्टैंटली डिफीटेड अस और हम अपनी उस हार को छुपाना चाहते हैं। अगर हम सचमुच धार्मिक होते तो सेक्स से हारे नहीं होते। पर हम हारे हुए लोग हैं और अपनी उस हार को छुपाने के लिए हम ब्रह्मचर्य वग़ैरह की बात करते हैं। हारे हुए आदमी हो। आ रही है बात समझ में?
जिन लोगों को देखो, उदाहरण के लिए कॉलेज में भी ऐसे होते हैं, कैंपसेज़ में। भोपाल में थोड़े ज़्यादा ही होंगे, कि लड़कियों से बात ज़्यादा नहीं करते हैं और कहते हैं जो लड़के लड़कियों से बात कर रहे हैं न, ये तो ये…। जिनको देखो कि वो दूरी वग़ैरह बना करके रखते हैं और कहते हैं, “नहीं, नहीं, हम संस्कारी बालक हैं, हम थोड़ी घुलेंगे मिलेंगे लड़कियों से।” उनको अपनी बैचमेट नहीं दिखाई देती, उनको अपनी कलीग नहीं दिखाई देती, उनको बस एक लड़की दिखाई दे रही है। वो एक लड़की है, उसकी देह है लड़की। जिनको देखोगे, ऐसे हैं। “ये लड़कियाँ हैं, इनसे हमारी ज़्यादा बातचीत नहीं है।” इन्हीं को जान लेना, क्या? कि इनके भीतर कुत्ते भौंकते हैं।
जो लड़कियों से जितनी ज़्यादा दूरी बनाए या बनाने को कहे, वो उतना ज़्यादा वासना का शिकार आदमी है। धर्म तो आपको सहज बना देता है। धर्म को क्या मतलब कि शरीर में क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है? हो रहा होगा कुछ भाई, जीवन की बातें हैं, प्रकृति के खेल हैं। बहुत कुछ होता रहता है। इसमें इतना हौवा क्या है? इसमें ऐसी क्या बात है?
एक और कहानी है। मैंने भी कई बार कही है, आपने भी सुनी होगी। अब पता नहीं ये हुआ था कि नहीं हुआ था ये सब लेकिन बोध कथाएँ हैं, कथा। कथा माने जो कथन के तौर पर अब चली आ रही हैं, कि बुद्ध कहीं पर बैठे हुए थे जंगल में, और जंगल ऐसी जगह होती है जहाँ पर ऋषि भी पाए जाते हैं और चोर-डाकू-लुटेरे भी खूब। तो चार-पाँच थे, वो कहीं से किसी लड़की को उठा लाए थे। अपहरण वग़ैरह कुछ किया होगा और लड़की उनसे किसी तरह जान छुड़ाकर भागी, और बुद्ध बैठे थे, वो भाग गई उनके सामने से।
और लड़की को उठा के लाए थे, आकर्षक रही होगी रूप-रंग-यौवन। जो भाग गई, उसके कुछ देर बाद ये सब आए और बुद्ध से कह रहे हैं, “बताओ लड़की कहाँ छुपाई है।” तो बुद्ध बोले, “मैं यहाँ बैठा हुआ हूँ बस, मैं नहीं जानता।” बोले, “अच्छा, ये तो बताओ कि यहाँ से कोई लड़की भागी थी?” तो जो उनका जवाब बताया जाता है वो समझिएगा। वो बोले, “हाँ, कोई भागा था। अब लड़की थी कि लड़का था, जवान था कि बूढ़ा था, ये हमें पता नहीं चलता। इस पर हमारी नज़र नहीं है, हमारे लिए एक है।” एक सहजता की स्थिति है ये।
वो लड़की भाग रही है, उसके कपड़े भी अस्तव्यस्त रहे होंगे। है तो है, प्रकृति की बात है भाई, इसमें क्या कहें कि कोई बहुत भारी चीज़ हो गई। लेकिन जितनी वासना भीतर होती है, स्त्री का शरीर आपके लिए उतनी भारी चीज़ हो जाता है। फिर आप कहते हो, “ढक के रखो, ढक के रखो।” कहते हो, “संस्कार की बात है, ढक के रखो।” और कुछ संस्कृतियों में तो पूरा ऊपर से नीचे तक ढक देते हैं काला। “ढक के रखो।” ये वासना का सबूत है।
आपको इतना क्या डर लगता है लड़की की देह से कि पूरा ढके दे रहे हो उसको? तुम तो बड़े कमज़ोर आदमी हो यार। कहते हो, “कुछ नहीं दिखना चाहिए, एकदम ज़रा भी कुछ नहीं दिखना चाहिए। कुछ दिख जाएगा तो हम गिर जाएँगे।” तुम गिर जाओगे क्या, तुम पहले ही झड़े हुए आदमी हो।
माँएँ बेटियों को, “ऐसे जा रही है तू, तेरा देख, तेरी पीठ दिख गई।" तो पीठ ही तो है, सबके होती है। आपकी नहीं है? कोई बिरली चीज़ मिली है मुझे? पीठ में क्या होता है, पीठ तो कुछ नहीं, गधे की भी पीठ होती है। "फलानी बदन दिखाती घूमती है, गंदे चरित्र की है।" अच्छा, तो तुमने कपड़ों से उसका चरित्र भी निकाल लिया! बहुत बढ़िया।
मैं पहुँच रहा हूँ आप तक या दूर की, या बहुत इधर-उधर की बात कर रहे हैं आपसे?
श्रोता: पहुँच रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: वास्तविक धर्म न सेक्स को प्रोत्साहित करता है और न ही उसे बुरा बताता है। कहता है, “ये न अच्छी चीज़ है, न बुरी चीज़ है। ये तो बस छोटी चीज़ है। ये इतनी बड़ी चीज़ नहीं है कि इस पर इतना विचार करो और इतने पहरे लगाओ और इतनी वर्जनाएँ और इतने नियम-कायदे, इतनी कहानियाँ। छोटी चीज़ है।” फिर कह रहा हूँ, न अच्छी चीज़ है, न बुरी चीज़ है, छोटी चीज़ है। वो इतनी बड़ी चीज़ है ही नहीं कि उसके बारे में लगातार सोचते रहो, ज़िंदगी उसके पीछे लगा दो, कह दो कि यही पाना है। "मेरी ज़िंदगी का तो उद्देश्य है फलाने का हुस्न हासिल करना।" बहुत छोटी चीज़ के पीछे तुम ज़िंदगी लगा रहे हो।
किसी की देह को हासिल करने के लिए तुम मरे जा रहे हो, तो तुम मरे ही हुए हो पहले से।
महिलाओं पर तो जो इसका अनिष्टकारी असर पड़ा है, तो पड़ा ही है। पुरुषों पर भी पड़ा है। पूरा समाज ही बीमार हो गया है। शरीर को इतना बड़ा बना लिया है कि हर आदमी हर समय बस शरीर ही शरीर के बारे में सोच रहा है, और विशेषकर महिला का शरीर। पुरुष महिला के शरीर के बारे में सोचे जा रहा है, महिला अपने शरीर के बारे में सोची जा रही है।
तो लड़कियाँ ज्ञान, कौशल, प्रतिभा, संघर्ष — इससे ज़्यादा महत्त्व किसको देने लग जाती हैं फिर? कि मैं सुंदर दिखूँ, आकर्षक दिखूँ, सेक्सी दिखूँ। क्योंकि सारा महत्त्व ही उसके शरीर को दिया जा रहा है। वास्तविक धर्म ये नहीं होने देता है। वास्तविक धर्म कहता है कि लड़की हो कि लड़का हो, तुम इंसान हो, एक चेतना हो तुम, जिसका दायित्व है और अधिकार है कि वो आसमान की ऊँचाई हासिल करे।
लेकिन "शरीर, शरीर" कर-करके, हमने अपनी बेटियों को, अपनी लड़कियों को, अपनी महिलाओं को, इन सबको बस माँस का पिंड बना दिया है, माँस है, माँस है। और हमारी ही नज़र महिलाओं ने भी हमसे उधार ले ली है। वो भी अपने आप को इसी तरह से देखने लग गई हैं कि मेरी देह कैसी है।
लड़की बहुत आकर्षक न हो, और थोड़ा गाढ़े रंग वग़ैरह की हो जाए, और थोड़ी मोटी हो जाए, उसे मानसिक बीमारियाँ होने लग जाती हैं। उसका पूरा आत्मसम्मान गिर जाता है। वो घर में दुबक के रहने लग जाती है। वो कहती है, “मेरी हैसियत क्या? मेरी इज़्ज़त क्या?” और इसके विपरीत लड़की बिल्कुल ही नालायक हो। कुछ ना हो उसके पास, न बुद्धि है, न ज्ञान है, न संघर्ष है, न ईमान है, कुछ नहीं है उसके पास। लेकिन अगर उसके पास आकर्षक देह है, तो वो बड़े आत्मविश्वास से भरी रहती है। वो कहती है, “बढ़िया है न, मेरे पास देह है। मुझे कोई-न-कोई मिल जाएगा इस देह को चाहने वाला, मेरा काम चल जाएगा।”
हमने दोनों ही वर्गों — स्त्री और पुरुष — दोनों को ही बर्बाद कर दिया है ये "बॉडी, बॉडी" रट-रट के। और लड़कियों का तो जो मानसिक पतन कराया है, उसकी तो कोई इंतहा ही नहीं। फिर हम पूछते हैं कि महिलाओं के पास उनके नाम पर इतनी कम संपत्ति क्यों होती है? फिर हम पूछते हैं, उन्हें इतने कम नोबेल पुरस्कार क्यों मिलते हैं? फिर हम पूछते हैं, संसद में इतनी कम महिलाएँ क्यों हैं? फिर हम पूछते हैं कि कॉरपोरेट बॉडीज़ में स्टेकहोल्डर्स के तौर पर या जो सीएक्सओ पोज़ीशंस होती हैं, उन पर इतनी कम महिलाएँ क्यों हैं? बात समझ रहे हो ना?
तुमने उसके भीतर कूट-कूट कर ये भर दिया है, कि यू आर अ बॉडी। तो हर समय बस वो अपनी बॉडी का ही ख़्याल कर रही होती है। और ऐसे काम तो बिल्कुल भी नहीं करती जिनमें बॉडी की उपेक्षा करनी पड़े। एकदम ही गरीब हो जाए तो अलग बात है, फिर तो वो एक मज़दूर भी बन लेगी। पर वो ग़रीब नहीं हो रही है तो वो धूल और धूप से बचने की भरसक कोशिश करती है। क्योंकि कहती है, “अरे, कुछ कमाने के लिए अगर मैंने धूल-धूप खा के अपना रूप-रंग ख़राब कर लिया तो ये ज़्यादा बड़ा नुकसान है।”
एफ़.एल.पी.आर. आप जानते हैं क्या होता है? फ़ीमेल लेबर पार्टिसिपेशन रेट। पिछले बीस साल में भारत में ये गिर गया है। माने आज से बीस साल पहले जितनी महिलाएँ घर से बाहर निकल कर काम कर रही थीं, आज उससे कम महिलाएँ बाहर निकल कर काम कर रही हैं। बताइए क्यों? क्योंकि घर में पैसा आ गया है। बीस साल पहले की अपेक्षा आज घर में पैसा ज़्यादा है। तो पहले तो फिर भी महिला बाहर मज़बूरी में निकल कर काम कर लेती थी। अब घर में पैसा आ गया है तो ख़ुद भी ऐसा सोचती है और उसके आसपास वाले भी उसे यही बोलते हैं, कि “अब तू बाहर क्यों जा रही है? तू घर का ख़याल रखना और तू बाहर जाती है तो काली हो जाती है। धूप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला न हो जाए।”
अच्छी-अच्छी डिग्रियाँ लेकर भी लड़कियाँ नौकरियाँ नहीं कर रही हैं। वो ट्रॉफ़ी वाइफ़ बनके सज-सँवर कर, बन-ठन के घर में बैठना पसंद कर रही हैं। ये है वो बॉडी-सेंट्रिसिटी जो पॉपुलर कल्चर ने, लोक-संस्कृति ने महिलाओं के मन में डाल दी है। “तुम और कुछ बाद में हो, फ़र्स्ट ऐंड फ़ोरमोस्ट, यू आर अ बॉडी। तो तुम्हारी सेल्फ-वर्थ भी किससे जुड़ी हुई है? तुम्हारी बॉडी से।” नहीं।
आपकी सेल्फ-वर्थ जुड़ी होती है आपकी सत्यनिष्ठा से, आपके प्रेम की गहराई से, आपके ज्ञान से, आप कितने संघर्ष जीवन में स्वीकार कर रही हैं, इससे।
चेहरा लीप-पोत करके दूसरों को लुभाने से कोई श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
अपने बच्चों में, अब जो हुआ सो हुआ महिलाओं के साथ, कम-से-कम अपने बच्चों में बॉडी-सेंट्रिसिटी कम-से-कम डालिए। उसको मेकअप मत सिखाइए। मैं देख रहा हूँ बहुत छोटी-छोटी लड़कियाँ हैं, वो लिपस्टिक लगाकर घूम रही हैं, वो नेल पेंट कर रही हैं। ये बहुत गलत कर रहे हो तुम उनके साथ। बिल्कुल ठीक नहीं है यह।
ये तो नाख़ून है न। नाख़ून को रंगने का क्या मतलब है भाई? नाख़ून कोई क्यों रंग रहा है? मुझे तो आज तक नहीं समझ में आया, कोई होंठ क्यों रंगता है? होंठ तो वैसे ही लाल होते हैं। उसको और रंग काहे के ले रहे हो? क्यों घिस रहे हो? और ये तो खाने की जगह है। तो या तो वो खाने की चीज़ होती है जो यहाँ लगाई है कि भीतर ही चली जाए। मतलब ऐसी जगह जहाँ से खाओगे, पियोगे, वहाँ तुमने कुछ लगा लिया है। असुविधा नहीं होती?
शरीर अगर स्वस्थ है तो होंठ अपने आप लाल रहते हैं या जो भी उनका रंग है प्राकृतिक वैसा ही रहेगा। तो शरीर को स्वस्थ रखो, बेहतर ये है न, जाओ, दौड़ो, जिमिंग करो, स्पोर्ट्स करो। अपने आप शरीर बढ़िया रहेगा तो होंठ भी बढ़िया रहेंगे, बाहर से लीपापोती करके क्या मिलेगा? नहीं जम नहीं रही बात?
अगर आप एक महिला हैं या आप एक अभिभावक हैं और आपके घर में बच्चा है छोटा या आपकी बहन है, कोई है या आपके आस पड़ोस में भी कोई है, तो इतना करिए कि उनको उनकी देह ही मत बन जाने दीजिए। इतना उन पर एहसान कर दीजिएगा।
छोटे बच्चों में, अभी तो वो बहुत छोटी है, छोटे बच्चों में लड़के और लड़की के कपड़ों में अंतर क्यों करते हो भाई? अभी तो दोनों का शरीर एक जैसा ही है न। आठ-दस साल तक एक ही जैसा रहता है। तो उनके कपड़ों में अंतर क्यों करते हो? एक-से कपड़े पहनाओ। बच्ची अभी छोटी है, अभी से उसके बाल बढ़ाने क्यों शुरू कर दिए भाई? क्यों उसको जता रहे हो कि तू नारी है, नारी है। क्योंकि वो फिर वही नारी बन जाएगी जैसी हमें चारों ओर दिखाई देती है, अबला नारी। क्यों उसको नारी बनाए दे रहे हो? उसको इंसान बनाओ, नारी नहीं।
अभी चार दिन पहले मैं खिलौने ख़रीदने गया तो उसने पूछा, कितने साल का बच्चा है? मैंने उम्र बता दी। फिर मुझसे पूछ रहा है, गर्ल ऑर बॉय? मैंने ऐसे देखा, मतलब छ: साल का बच्चा है ये तेरे लिए पर्याप्त नहीं है। तू ये क्यों पूछ रहा है, गर्ल ऑर बॉय? क्योंकि गर्ल सेक्शन अलग है। उसमें बार्बीज़ और ये सब रखे हुए हैं। मैंने कहा, मुझे जाना ही नहीं उधर। है तो गर्ल, पर बॉय वाले दिखा।
तुम क्यों अभी से उसको बार्बी बनने की ट्रेनिंग दे रहे हो? तुम उसके लिए साइंस के गेम्स क्यों नहीं ला सकते? मैथ्स की पज़ल्स क्यों नहीं ला सकते? एक-से-एक सजी-धजी डॉल्स रखी हुई हैं। और सारी डॉल्स ने क्या लगा रखी है? (होंठों में कुछ लगाने का इशारा करते हुए)। और जितने तरीके के आभूषण हो सकते हैं, वो सब उन डॉल्स ने पहन रखे हैं। अब वो छोटी-सी बच्ची है, तुम उसके हाथ में वो दे रहे हो। तुम क्या कर रहे हो? ज़हर दे रहे हो तुम उसको।
देखो जीवन की गाड़ी न, अस्तित्व की गाड़ी ही इन दोनों पहियों पर चलती है। एक को कमज़ोर कर दोगे तो दूसरे पर ज़्यादा बोझ आ जाएगा। एक पहिया ख़राब है तो दूसरा भी जल्दी ही ख़राब हो जाएगा। तो जो मैं बात बोल रहा हूँ, पुरुषों के लिए भी है। महिला को अगर सिर्फ़ देह मानोगे तो वो बहुत कमज़ोर हो जाएगी और महिला कमज़ोर हो गई तो तुम्हारी ताक़त भी चली जाएगी। तो अपनी ख़ातिर ही सही, लेकिन उसको इंसान समझना शुरू करो, बॉडी-बॉडी मत कर दो। रिश्ता दोस्ती का रखो।
ठीक है, सुख चाहिए है और सुख देह से मिल जाता है, लेकिन दोस्ती का भी अपना एक अलग आनंद होता है। और लड़कियाँ बहुत अच्छी दोस्त भी बन सकती हैं, बस भौंकना मत शुरू कर देना। ऐसे कहो कि दो इंसान बैठे हैं, आपस में बात कर रहे हैं, घूम-फिर रहे हैं, जो भी कर रहे हैं उसका भी अपना अच्छा, ऊँचा आनंद है। यही आनंद थोड़ी है कि आई लुक एट हर ऐज़ अ बॉडी?
ये सब बातें मैं बोल रहा हूँ ऐसे ही नहीं आ जातीं। यही सब बातें सिखाना असली धर्म का दायित्व होता है। और उसी के लिए गीता कार्यक्रम है, जो इतनी मेहनत से हम चला रहे हैं। पूरी संस्था उसी को समर्पित है और इतने-इतने हज़ार लोग उसमें जुड़ चुके हैं, वो इसलिए है।
जब असली धर्म आता है न ज़िंदगी में, श्रीकृष्ण वाला धर्म, बाबा जी वाला धर्म नहीं — भगवद्गीता वाला धर्म। जब असली धर्म ज़िंदगी में आता है तो बहुत सारे, समझ लो, कि फल-फूल लगते हैं। असली धर्म ऐसा है जैसे जड़, फिर बहुत तरीके के फल-फूल लगते हैं। जिसमें से एक फल ये भी होता है कि न आप स्वयं को देह मानते हो, न महिला की देह को बहुत महत्त्व देते हो, ये एक फल है।और सौ तरह के फल लगते हैं। पर वो सबके सब फल आते एक साझी जड़ से हैं, जिसका नाम है — अध्यात्म। और आध्यात्मिक नहीं हो आप, तो ऊपर-ऊपर से कितना भी दिखा दो कि हम तो ब्रह्मचारी हैं कि संयमी हैं, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
कबीर साहब, मेरे पूज्य, क्या बोला करते हैं? बोलते हैं, “कामी कुत्ता।” बोलो, बोलो।
श्रोता: कामी कुत्ता चार दिन।
आचार्य प्रशांत: कामी कुत्ता, तीन-चार जो भी बोलना है बोल लो। माने, कम। कामी कुत्ता तीन रोज़ अन्तर रहे उदास। ‘उदास’ से मतलब है ‘उदासीन’। ‘उदासीन’ मतलब इग्नोर करता है, उपेक्षा करता है। ‘उदास’ माने उदास वैसा वाला उदास नहीं। बोल रहे हैं कि कुत्ते की भी ऋतु आती है, सिर्फ़ तभी उस पर वासना हावी होती है। कुत्ते की भी प्राकृतिक एक ऋतु आती है, हीट की, सिर्फ़ तभी वो जाकर के जोड़ा बनाते हैं कुत्ते-कुतिया। ये हम जानते हैं, ऐसा है, सभी पक्षी, सभी पशु ऐसे ही करते हैं। उनका जब मेटिंग-सीज़न आता है, सिर्फ़ तब उनमें वासना उठती है, वरना नहीं उठती।
तो बोलते हैं, कामी कुत्ता तीन दिन अनतर माने, बाक़ी दिनों में, अनतर रहे उदास। बाक़ी दिनों में वो सेक्स की उपेक्षा करता है। सिर्फ़ तीन दिन, तीन दिन माने कम अवधि में, सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए वो सेक्सुअली स्टिम्युलेट होता है, बाक़ी उसको फ़र्क़ नहीं। पर “कामी नर कुत्ता सदा छ: ऋतु, बारह मास।”
कामी कुत्ता तीस दिन अन्तर होय उदास। कामी नर कुत्ता सदा छह ऋतु बारह मास।
ये क्यों हुआ? हम भी जंगल से ही आए हैं। कोई पशु-पक्षी उतना कामी नहीं होता जितना मनुष्य है। तो तुलना करके बता रहे हैं कि कुत्ता भी कुछ समय के लिए कामवासना में पड़ता है, बाक़ी समय उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता। पर आदमी अकेला है, जो बारह मास सेक्स में डूबा रहता है। क्यों? क्योंकि आदमी अकेला है, जिसने सेक्स को दबाया है, दमन किया है, सप्रेस किया है।
और चूँकि तुमने उसका इतना सप्रेशन किया है, इसलिए वो उछल करके तुम्हारे पूरे जीवन पर छा गया है। मनोविज्ञान की पिछली शताब्दी की ये बड़ी क्रांतिकारी खोज थी। फ़्रॉयड से शुरू हुई थी, क्योंकि फ़्रॉयड से पहले जो लोकधर्म चलता था, ख़ासकर जो यूरोप में चलता था, उसमें दमन का बड़ा महत्त्व था कि “नो, नो, नो, बैड थॉट्स, गंदे विचार मत आने देना।” वहाँ पर भी जो चर्च था, पादरी, प्रीस्ट ये सब ऐसे ही कहा करें, “नो, नो बैड थॉट्स। अवॉइड बैड थॉट्स।” तो बैड थॉट से क्या करना है? बैड थॉट आए तो दबा दो।
फ़्रॉयड ने कहा, जिस चीज़ को दबाते हो वो सौ गुना बढ़ जाती है। मत दबाओ। मत दबाओ। हाँ, इतना कर दो कि उसको कभी एक नंबर का स्थान नहीं देंगे। जीवन में जो कुछ भी है सब नंबर दो, तीन, चार, पाँच से शुरू होगा। एक नंबर का स्थान तो उसको ही देंगे, जिसको वेदान्त सत्य बोलता है — सत्य, आत्मा, ब्रह्म — जो भी बोल लो। तुम्हारे लिए उसका जो भी अर्थ होता हो — सच्चाई, मुक्ति, आनंद — जो भी कहना चाहो, पहले नंबर की जगह उसको दे देंगे। बाक़ी पीछे अपनी पूँछ की तरह लगे रहेंगे, हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता। दबाने से तो मामला और बिगड़ना ही बिगड़ना है।
अब आप कह दें, नहीं, कई ऐसे होते हैं। वो सिनेमा हॉल में, उनके बगल में…। क्या हो गया? पिक्चर देखने गया था। पूछ रहा हूँ, क्या कहानी थी? बता काहे नहीं रहा है? बोल रहा है, “बगल में एक हॉट लड़की बैठ गई थी।” बोले रहे, “एक पिक्चर वहाँ चल रही थी स्क्रीन पर, एक यहाँ (दिमाग में) चल रही थी। और ऊपर से एक-दो बार कोहनी छू गई।” बोले रहे हैं, “ऐसा झटका लगा, 440 वोल्ट।”
ये दिखा ऐसे रहे हैं जैसे इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है, पर इनके दिमाग में लगातार यही-यही चल रहा है, लड़की, लड़की, लड़की। देह, देह, देह। सेक्स, सेक्स, सेक्स। जिस चीज़ का दमन करोगे वो तुम्हारे जीवन पर छा जाएगी। दमन की ज़रूरत नहीं है, समझने की ज़रूरत है। दबाओ नहीं, समझो, जानो। उसी जानने का नाम वेदान्त है। जानना है मुझे, बोधोऽहम् — बोध ही मैं हूँ। न सिर्फ़ मेरा स्वभाव है बोध, मैं बोध मात्र हूँ। बोधोऽहम् — मैं जानूँगा। मैं दबाऊँगा नहीं, मैं जानूँगा। उसके बाद जो होना होगा अपने आप होगा।
और जानने से ये पता चलता है कि जिसको पहला स्थान देना है वो कौन है। मैंने अभी कहा था कि उसको ब्रह्म भी कहा जाता है। तो जानने से, जब आप जान जाते हो कि पहला स्थान किसका है, तो उसको कहते हैं वास्तविक ब्रह्मचर्य।
एक प्रकार के आचरण को ब्रह्मचर्य नहीं कहा जाता कि सदाचारी बनो, अच्छे-अच्छे काम करो। ये सब दो कौड़ी की बातें हैं और इनसे बहुत दुख पैदा होता है।
श्रोता: जस्ट लास्ट, आई ऍम सॉरी, बहुत आप टाइम के बाद मुझे लगा कि मुझे कह देना चाहिए। दरअसल मैं आचार्य प्रशांत को बहुत लंबे समय से सुन भी रही हूँ और आज जो एक बात कही सर ने, तो मुझे लगा कि मुझे बोलना चाहिए। वो इसलिए बोल रही हूँ, वरना कुछ भी नहीं है। आपने जो-जो कहा, वो मैं उससे पूरी सहमत रहती हूँ हमेशा।
ये जो आपने कहा कि कुछ लोग ऐसे हैं जो पूरा काले कपड़े में। तो भोपाल में क्योंकि एक कम्युनिटी है मुस्लिम, जो पूरे काले कपड़े में रहती है और मुझे पता है कि उनका बिल्कुल भी उस तरह निशाना करने की वो नहीं था उनका। लेकिन हमारे यहाँ जितने भी लोग हैं वो अलग धर्म के भी हैं। तो काला कपड़ा अगर एक कोई पहना है तो कोई ऐसा भी है जो पूरा साड़ी में ढकते हैं, है न? तो वो भी ऐसी ही, उनकी भी वैसी ही मानसिकता होती है। तो ऐसा नहीं है कि मुस्लिम कम्युनिटी वाले ज़्यादा उसको गलत समझते हैं। हिन्दू भी उतना ही बराबर। तो हिन्दू-मुस्लिम का कोई फ़र्क़ मत देखिएगा प्लीज़। क्रिश्चियन वाइट में रहते हैं।
तो कोई भी जात है, जात से मत लीजिएगा इसको। क्योंकि उनका कोई मंशा ये नहीं, मेरे को ऐसा लगता है।
आचार्य प्रशांत: मुझे जो कहना होता है न, वो मैं ख़ुद ही समझा लेता हूँ आमतौर पर। और जब मैं सबकी बात कर रहा हूँ, जब मुझे सुनने वाले सब हैं, तो डाँटूँगा भी मैं सबको ही। मैं डाँटने में फिर भेदभाव नहीं करूँगा कि मैं एक समुदाय को ही क्यों डाँटूँ और दूसरे को क्यों न डाँटूँ।
तो जब मैं इतनी बार बाबा जी को बोलता हूँ, तो जब मुझे बाबा जी को और हिन्दू धर्म में जितनी मुझे बुराइयाँ दिखती हैं उनको बोलने का हक़ है, तो अगर मेरे श्रोताओं में दूसरे समुदायों से भी लोग बैठे हैं, मुस्लिम भी बैठे हैं, तो मुझे उन्हें डाँटने का भी हक़ है। तो बस ठीक है। और मुझे जो समझाना है, वो ठीक है।