मेंस्ट्रुएशन को लेकर जो बड़ा हौवा है, उसको जो एक टैबू की तरह हम देखते हैं, उसका कारण ये नहीं है कि हम मेंस्ट्रुएशन को लेकर अनकंफ़र्टेबल रहते हैं। उसका कारण ये नहीं है कि हमें अजीब लगता है, असंगत लगता है कि ये मेंस्ट्रुएशन क्या चीज़ होती है। उसका कारण थोड़ा उससे आगे का है एक कदम, हम सेक्स को लेकर ही अभी तक सहज नहीं हो पाए हैं। हमारी असहजता मेंस्ट्रुएशन, मासिक-चक्र से उतनी नहीं है, हमारी असहजता सीधे-सीधे सेक्स से है। और उसके पीछे बड़ा गहरा कारण है, जो अगर हम समझेंगे तो जीवन को ही समग्रता से समझने में मदद मिलेगी।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आपके चिर-परिचित अन्दाज़ को दर्शन देने के लिए भोपाल में बहुत-बहुत धन्यवाद। जो आपके प्रश्नों के उत्तर होते हैं, उसी शैली और उसी अन्दाज़ से प्रेरित होकर मेरा ये प्रश्न था।
पिछले दस वर्षों से मैं देश के अलग-अलग क्षेत्रों में यात्रा कर रहा हूँ, जिसमें मैं महावारी स्वच्छता प्रोग्राम को लेकर काम करता हूँ, मेंस्ट्रुएशन हाइजीन को लेकर। जिसमें मैं अवेयरनेस कैम्पेन करता हूँ। एक लो-कॉस्ट सैनेटरी नैपकिन मेकिंग मशीन हमने बनाई है, उसका इंस्टॉलेशन करते हैं, ट्रेनिंग करते हैं।
शुरुआत में जब मैं काम करता था तो मुझे ये महसूस होता था कि ये जो सोशल टैबू है, ये जो सामाजिक कलंक है, मेंस्ट्रुएशन हाइजीन पर बातचीत करना, ये केवल गाँव या कुछ पिछड़े इलाक़ों तक ही सीमित है। जब मैं शहरों में गया, महानगरों में गया, विदेशों की भी यात्रा की है कुछ जगह इसी काम को लेकर, तो लगा ये लगभग कॉमन है। हर जगह वही स्थिति है लगभग, इस पर बातचीत नहीं होती है।




