निषिध्य निखिलोपाधीन्नेति नेतीति वाक्यत:। विद्यादैक्यं महावाक्यैर्जीवात्मपरमात्मनो:॥
‘नेति-नेति’ शास्त्र-वाक्यों की सहायता से सभी उपाधियों का निषेध करके महावाक्यों द्वारा इंगित जीवात्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव करो।
—आत्मबोध, श्लोक ३०
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। पिछले सत्र में आपने कहा कि ज्ञान को हटाना व झूठ को जानना ही नेति-नेति का अर्थ है। आचार्य जी, इसके आगे की यात्रा के बारे में जानना चाहता हूँ, इसके आगे की यात्रा कैसे हो? नेति-नेति के बाद कोई भी नया काम करने में कोई रुचि नहीं आ रही है। श्लोक के मुताबिक नेति-नेति से ‘अहम् ब्रह्मस्मि’ की यात्रा अब कैसे हो? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: देखा? रुचि के मारे! जो पूरी उलझन है, वो इस एक शब्द पर केंद्रित है, क्या?
श्रोतागण: रुचि।
आचार्य: “रुचि नहीं आ रही है।“ ये मसला मुझे कभी समझ में ही नहीं आता। रुचि नहीं आ रही हो तो ना आए। रुचि इतनी ज़रूरी क्यों है, भाई?




