
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल ये है, हमारी अलरेडी 160 प्लस बुक्स हैं। आपने 160 किताबें लिखी हुई हैं, फिर क्या कारण है कि आपने समय निकाल के ये किताब लिखी? ये अभी हर कहीं चल रही है, अमेज़न पर, ट्विटर पर और बाक़ी सारी जगह। तो क्यों ज़रूरी है सबको कि ये किताब पढ़ें?
आचार्य प्रशांत: देखो भाई, रील्स का ज़माना है। आप लोग सब अटेंशन डेफ़िसिट वाले लोग हो, है न? तो बिल्कुल ठीक कह रहे हो आप, इसमें कुछ भी ऐसा नया नहीं है जो पुरानी किताबों में न हो। लेकिन उसको और ज़्यादा प्रभावी तरीके से लिखा गया है। बाक़ी किताबों में बात बिल्कुल शुद्ध है, साफ़ है। इसमें बात को एक ग्रैविटी और इंटेंसिटी दी गई है, संक्षिप्त किया गया है और सघन किया गया है, तीव्र किया गया है।
तो वही बात जो आप दूसरी जगह सुनते हो या दूसरी किताबों में पढ़ते हो, तो बस वो बौछार जैसी लगती है। वो इसमें इतनी ज़्यादा डेंसली पैक्ड है कि इसमें वो मशीनगन की गोली की तरह लगेगी।
मैं बहुत बार लंबे वाक्यों में बात करता हूँ, क्योंकि विचार का प्रवाह वैसा ही होता है न, कि एक बात शुरू हुई है, कई बार वो लंबी जाती है। इसमें जो चीज़ें हैं, वो स्टैकाटो है, मतलब जिन्होंने पढ़ी होगी, उन्होंने देखा होगा कि सेंटेन्सेस छोटे हैं। वो इसलिए हैं ताकि वो जल्दी से अपना काम करके निकल जाएँ और आपको चतुराई का मौक़ा न मिले। इससे पहले कि आप बच सको, इससे पहले कि आप पन्ना पलटकर भाग सको, एक वाक्य भी अपना काम कर जाए।
मैंने कई बार बोला है कि इस किताब में आप कहीं से भी शुरू करोगे तो पढ़ सकते हो। वो आधी बात है। पूरी बात ये है कि इसमें किसी भी पन्ने के बीच से भी शुरू करोगे, तो भी काम हो जाएगा। इसलिए इसमें समय लगा। दो-तीन महीने गोवा में बैठकर के लगभग पूरे दिन, बाक़ी सत्र तो चलते ही रहते थे और जो एडमिनिस्ट्रेटिव काम है वो भी चलता था, पर कई घंटे इसको दिए, यही करने में।
तो सच्चाई तो इसमें भी उतनी ही है जितनी बाक़ी किताबों में है। और जो आदमी थोड़ा साफ़-सुथरा हो, निर्मल हो, उसके लिए जो दूसरी किताबें हैं, वो बराबर की उपयोगी हैं।
ये लिखी गई है टेढ़े लोगों के लिए, जो भागने में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं। तो ये उनको पकड़कर बाँधने के लिए है कि खोलोगे, जहाँ ही खोलोगे जिस भी वाक्य को पढ़ोगे, वही वाक्य तुमको पकड़ लेगा।
तो इसमें एक ख़ास तरीक़े का आर्किटेक्चरल ट्रैप है, इसका शिल्प जो है, वो फँसाने के लिए है। तो इसलिए इसमें समय लगा और शायद इसीलिए लोग इसको ज़्यादा पढ़ भी रहे हैं, पसंद भी कर रहे हैं। है न?
और ऐसा भी नहीं है वैसे कि आज ही ज़माना ज़्यादा ख़राब हो गया है। आप लोगों ने कभी सोचा है कि दोहे क्यों होते हैं? वो इसलिए होते हैं कि तुम भाग पाओ, इससे पहले ही वो ख़त्म हो जाए। और पूरी साखी भी नहीं चाहिए होती, कई बार आधी साखी, माने दोहे की एक पाँत भी पर्याप्त होती है। आधी साखी, वो भी पर्याप्त होती है।
“हरि मरे तो हम मरे, हमरी मरे बलाय।” ये बात अपने आप में पूरी है। दोहा पूरा नहीं हुआ, पर बात पूरी है। तो लोग कुछ-कुछ ऐसे ही सदा से थे। वो लंबी-चौड़ी बात सुनने को तैयार नहीं होते थे। हर कोई यही कहता था, “हमें हमारा काम करना है, हमें जाने दो, हम गृहस्थ हैं, हमें सौ बंधन हैं, हमें ये निपटाना है।” तो कहने वाले कहते थे कि “अच्छा, तुम जा रहे हो, जाते-जाते पीछे से ही तुम पर एक ग्रेनेड उछाल देते हैं।”
तो ये सब आयुध हैं, ये लड़ाई के औज़ार हैं। जल्दी में काम हो जाए। दोहा तो फिर भी बड़ा होता है, श्लोक, और श्लोक से भी संक्षिप्त होते हैं सूत्र; और सूत्रों से भी संक्षिप्त कई बार होते हैं मंत्र। मंत्र एक शब्द का भी हो सकता है। और सबसे संक्षिप्त होता है ॐ — वहाँ पर क्या है? अक्षर है बस, अक्षर।
क्यों करना पड़ा ये सब?
क्योंकि आप लोग बहुत व्यस्त लोग हो। आप ज़्यादा लंबी-चौड़ी बात सुनोगे नहीं, तो बड़ी से बड़ी बात को ॐ में समेट कर आपको कह दिया गया। बड़ी-सी बड़ी बात आपको एक छोटे-से सूत्र में बोल दी गई, दोहे में बोल दी गई। ये उपाय करने पड़ते हैं।