हमारा सौभाग्य भी है दुर्भाग्य भी, जो बेचैनी मनुष्य के मन में रहती है वो और कहीं नहीं पाई जाती। पशुओं को आप उनकी प्राकृतिक व्यवस्था के अनुसार आहार और चीज़ें दे दीजिए — वो अपना संतुष्ट पड़े रहते हैं। लेकिन मनुष्य का मन कुछ तलाश रहा है। धर्म का अनिवार्य संबंध उस तलाश से है और क्या तलाश रहा है हमारा मन? अगर बेचैन है हमारा मन, तो स्पष्ट सी बात है — चैन तलाश रहा है। अशांत है, तो शांति तलाश रहा है। उलझन में है, तो सुझाव तलाश रहा है।
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सुभाष चंद्रा: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति, या कहें शख़्सियत, आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं, इन्होंने आईआईटी से इंजीनियरिंग किया, फिर एमबीए किया। उसके बाद सिविल सर्विसेस की परीक्षा में सौ प्रतिशत तक अंक लिए, फिर बिज़नेस में भी कुछ संस्थाओं की मदद की।
परंतु फिर भी जो जिज्ञासा आपके मन में शायद बचपन से ही वेदों के प्रति, उनके बारे में शोध करने के बारे में, धर्म के बारे में जानने की जो रही होगी — उसने आज आचार्य जी को पूर्णकालिक रूप से धर्म की सेवा करने में रत कर दिया है, देश और समाज को तथ्यों के आधार पर एक मार्गदर्शन देते हैं, ऐसे आचार्य जी का स्वागत है। हमारे दर्शकों का हम आपके बहुत आभारी।
आचार्य जी, ये प्रश्न सभी हमारे दर्शक भी और बहुत से लोगों के मन में आता है कि असली धर्म क्या है? और बहुत से लोग एक ही परिवार में रहते हुए भी — कोई किसी प्रकार की साधना करता है, कोई किसी प्रकार की पूजा करता है, कोई कुछ करता है — तो बहुत कन्फ्यूज़न है लोगों के मन में कि सच्चाई क्या है? धर्म की सच्चाई क्या है?




