मृत्यु में नहीं, मृत्यु की कल्पना में कष्ट है || आचार्य प्रशांत (2014)

प्रश्न: मृत्यु से भय इसलिए नहीं लगता कि शरीर छूट जाएगा, पर मृत्यु से पहले का कष्ट आक्रांत करता है| इस कष्ट से बचने का क्या मार्ग है?
वक्ता: कोई ज़रूरी नहीं है की मृत्यु से पहले कोई कष्ट हो, हो भी सकता है और नहीं भी| मृत्यु से पहले ऐसा कोई भी विशेष कष्ट नहीं होता, जो जीवन में अन्यथा ना होता हो| पच्चीस साल का ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ था, फिलिप ह्यूग्स, अभी उसकी मौत हुई है| उसे कहाँ कोई कष्ट हुआ? गेंद लगी, और क्योंकि गेंद भी हटते हुए पीछे गर्दन में लगी थी, तो बहुत कष्ट नहीं हो सकता| यही गेंद अगर उसने सीधे माथे पर खाई होती तो ज़्यादा कष्ट होता| आप में से जिन लोगों ने क्रिकेट खेला है और चोटें खाईं हैं, वो यह अच्छे से जानते हैं|
कोई कष्ट नहीं है, कुछ ही पलों के भीतर ही वो बेहोश हो गया, और बेहोशी में ही उसके प्राण चले गए| कहाँ कष्ट था? बस एक छोटी-सी नस टूटी, प्राण गए| कहाँ कष्ट था? यह भी मन की कल्पना है| जैसे हज़ार कल्पनाएं मन करता है ना, वैसे ही ये भी| ध्यान देने योग्य बात दूसरी है, वो यह है कि मन यह कल्पना क्यों करता है|
मन यह कल्पना इसलिए करता है ताकि उसका यह असुरक्षा का भाव स्थाई बना रहे, ताकि आघात कोई खतरा है, ऐसी घंटी लगातार बजती रहे| कुछ बुरा है जो भविष्य में होने जा रहा है, यह बोझ मन पर लगातार बना रहे| मन मुक्त ना होना पाए, मन मुक्त हो गया तो अहंकार जगह कहाँ पाएगा?
हल्के मन में अहंकार के लिए जगह नहीं हो सकती, तो किसी न किसी अनहोनी की आशंका बनी रहनी चाहिए| कुछ बुरा है जो घटने जा रहा है, कुछ और नहीं दिखा दे रहा तो यही कल्पना कर लो की बड़ी कष्ट पूर्ण मृत्यु आने जा रही है| मृत्यु में कष्ट हो भी सकता है, लोग तड़प-तड़प कर भी मरे हैं, लेकिन फिर लोग तड़प-तड़प कर जीये भी तो हैं| आप यह ही क्यों सोचते हो कि मौत ही ख़ास तौर पर तड़पाएगी, जीवन भी तो तड़पाता है! और जिन क्षणों में आप मौत के कष्ट की कल्पना कर रहे होते हैं, अगर आप गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि ठीक उसी समय जीवन बड़ा कष्ट पूर्ण हो गया होता है| बात पर ध्यान दीजिये|



