मन गलत दिशा को क्यों जाता है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

आचार्य प्रशांत: दिनेश का सवाल है कि मन सभी का अधिकतर गलत कार्यों की तरफ ही क्यों भागता है। मन कैसे ऐसा कर ले कि उधर को ना जाए?
यदि मन को साफ़-साफ़ पता ही हो कि कुछ गलत है, तो उधर जाएगा नहीं। मन उधर को ही जाता है जिसके सही होने की तुमने उसे गहरी शिक्षा दे रखी होती है। पहले तो इस यकीन को, इस मान्यता को निकाल दो मन से कि मन गलत तरफ की ओर आकर्षित होता है। मन गलत की ओर आकर्षित नहीं होता। मन उधर को ही जाता है जिधर जाने में सुख है। ये तुमने उसे बता रखा है। मन का अपना कुछ होता नहीं। मन तो एक खाली जगह होती है जिसमें वही सब भर जाता है जो तुम भरने देते हो। मन तो लगा लो एक खाली डब्बे की तरह है या एक खाली कंप्यूटर की तरह है। उसमें सॉफ्टवेयर तुम डालते हो। मन को पूरी ट्रेनिंग तुम देते हो। मन में सारे संस्कार, कंडीशनिंग तुम भरते हो। अब दिक्कत ये आती है कि तुम्हीं ने वो संस्कार उसमें भरे, और एक दूसरे मौके पर तुम देखते हो कि ये संस्कार तुम्हें नुकसान पहुँचा रहे हैं। तुम कहते हो कि ये तो गलत दिशा है। यही तुम मुझसे सवाल पूछ रहे हो कि मन गलत दिशा में क्यों भागता है। अरे, वो दिशा गलत है ही नहीं। तुम्हीं ने तो उसे सिखाया है।
एक उदाहरण देता हूँ। एक छात्र है, वो पढ़ रहा है। उससे पूछो कि, "पढ़ क्यों रहा है?" तो उसको ये सिखाया गया है, और उसने ये बात स्वीकार कर ली है कि पढ़ा इसलिए जाता है ताकि परिणाम अच्छा आए। और ये बात उसने मान ली है। इस शिक्षा को उसने अपने अंदर बैठा लिया है कि पढ़ा इस हेतु जाता है कि परिणाम आ जाए। ठीक? मैं अब उससे पूछूँ कि, "परिणाम तुझे अच्छा क्यों चाहिए?" तो वो ये कहेगा कि, "परिणाम इसलिए अच्छा चाहिए ताकि अंततः नौकरी लग जाए।" ये बात भी वो लेकर पैदा नहीं हुआ था। ये बात भी उसके भीतर डाल दी गई है, और उसने स्वीकार कर ली है कि शिक्षा इसलिए होती है ताकि अंततः नौकरी लग जाए। अब उसने ये बात मान ली है।
"अच्छा तुझे नौकरी क्यों चाहिए?"
"सर, पैसे मिलेंगे।"



