नाव आगे हो तो सलमान अच्छे साथी लगते हैं, पिछड़ जाए तो उन्हीं में कमियाँ दिखने लगती हैं। एशियाई खेलों के पदक जीत चुके खिलाड़ी भी साथी की एक बर्पी ज़्यादा होने पर रात भर सो नहीं पाते, एक हार को पूरे जीवन का फ़ैसला मान लेते हैं, और बुआ के शादी वाले सवाल से बचने के लिए खेल की आड़ लेते हैं। पदक परिणाम बदल सकता है, पर उस ‘मैं’ को नहीं जो उसे अपनी कीमत का सबूत बनाना चाहता है। अगर जीत को हमारे बारे में कुछ साबित न करना हो, तो हम कैसे खेलेंगे?
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Originally published in Navbharat Times on 25 October '26
नाव आगे चल रही हो तो सलमान बहुत अच्छे साथी लगते हैं। नाव पिछड़ने लगे तो उन्हीं सलमान में कमियाँ दिखने लगती हैं। रोइंग के खिलाड़ी सतनाम सिंह ने अपने साथी सलमान के सामने यह बात स्वीकार की। सलमान ने कहा कि उनके भीतर भी कुछ ऐसा ही चलता है। दोनों हँस पड़े। एशियाई खेलों में साथ कांस्य जीतने के बावजूद उन्होंने प्रतियोगिता के दौरान कभी एक-दूसरे से यह बात नहीं कही थी।
मैंने पूछा, सलमान का व्यक्तित्व क्या नाव की गति के साथ बदल रहा है? अभी अच्छे थे, थोड़ी देर में बुरे कैसे हो गए? बदला तो केवल परिणाम है। लेकिन परिणाम बदलते ही दूसरे व्यक्ति के बारे में हमारा निर्णय बदल जाता है। और अपने बारे में भी। नाव आगे हो तो हम योग्य हैं, पिछड़ जाए तो अपनी योग्यता पर संदेह होने लगता है। आखिर बदल क्या रहा है?
यह बातचीत दिल्ली-एनसीआर में मेरे एक संवाद सत्र में हुई। पिछले कुछ सप्ताहों में एशियाई खेलों के पदक विजेताओं सहित




