प्रश्न: जीवन ऐसा क्यों है? क्यों कदम-कदम पर धोखा है, कष्ट है, चिंता है, बोरियत है, बेचैनी है?
वक्ता: जीवन ऐसा कहाँ है? मुझे बता दो इस अस्तित्व ऐसा क्या है जो तुम्हें उदास दिखाई देता है? क्या तुम्हें बादल उदास दिखाई देते हैं? क्या तुम्हें फूल उदास दिखाई देते हैं? जानवर भी थोड़े बहुत कष्ट में हो सकते हैं, पर उदास नहीं दिखाई देंगे। उदासी पर तो मनुष्य का ही अधिकार है। केवल आदमी है जो दुःख में जिये जा रहा है, वरना अस्तित्व में दुःख कहीं नहीं है।
यह सब कुछ जो तुम्हें चारों ओर दिखाई देता है, वह कहाँ से आया है? यह आ कहाँ से रहा है इसको समझो, ध्यान से देखो। तुम सब सुख चाहते हो ना? इसलिए शिकायत कर रहे हो कि दुःख क्यों है। यही बात है ना? सुख सब चाहते हो, शिकायत यही है कि दुःख क्यों है। सुख की तुम्हारी अपनी परिभाषा हो सकती है, पर एक बात पक्की है कि सुख सबको चाहिए। इसलिए ये तकलीफ़ है कि दुःख क्यों है। मैं तुमसे पूछ रहा हूँ, ‘क्या बिना दुःख के सुख हो सकता है?’
श्रोतागण: नहीं सर।
वक्ता: जब तक तुम गहरे से दुखी नहीं हो, क्या ये संभव है कि तुम सुखी हो जाओ? परीक्षा का परिणाम आने वाला है, और तुम्हें गहरा तनाव है। परिणाम आता है, और तुम पास हो जाते हो, बड़ा सुख होता है। क्या वह सुख हो सकता था बिना तनाव के? क्या तुम्हें सुख का ज़रा भी अनुभव होता अगर पहले तनाव नहीं होता, अगर तुम पहले भी प्रसन्न होते, मुक्त होते?
तुम्हें दुःख इसलिए है क्योंकि तुम्हें सुख चाहिए, बहुत सारा। बिना दुःख के सुख हो ही नहीं सकता। जीवन का एक नियम है, उसे ध्यान से समझना। तुम जो चाहते हो, तुम्हें उसके विपरीत का भी निर्माण करना ही पड़ेगा, वरना जो तुम चाहते हो वो तुम्हें मिल नहीं पायेगा।




