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जहाँ दूरी है, वहाँ कल्पना है || आत्मबोध पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं बचपन से ही बहुत डरपोक रहा हूँ। अँधेरे मे जाने से तो डरता ही हूँ, चूहे, बिल्ली, गाय, छिपकली, कुत्ते, खरगोश, इन सभी से भी मुझे बहुत डर लगता है। क्या मेरा यह डर समर्पण के साथ कम होगा?

आचार्य प्रशांत: तुम इतना ही समर्पण कर लो कि एक हफ़्ते की छुट्टी लेकर (यहाँ बोधस्थल) आ जाओ। चूहा, बिल्ली, गाय, छिपकली, कुत्ता, खरगोश, सबसे मिलवा देंगे।

जिनसे डरने लग जाते हो, उनसे दूरी बना लेते हो। जिनसे दूरी बना लेते हो, उनके बारे में तथ्य जानने का तुम्हारे पास अब कोई तरीक़ा नहीं बचता, क्योंकि उनसे तुमने दूरी बना ली। तो दूरी बनाने के साथ ही डर को ये सुविधा हो जाती है कि जिनसे दूरी बनाई है, उनके बारे में अब कोई कहानी बना ले।

कोई जीव, कोई वस्तु तुम्हारे सामने ही हो, साक्षात हो, तो तुम उसके विषय में क़िस्से नहीं गढ़ पाओगे, कल्पना नही कर पाओगे, क्योंकि वो तुम्हारे सामने ही है। पर डर के मारे दूर हो जाते हो, और जब दूर हो जाओगे, तो वो चीज़ तो तुम्हारे सामने है नहीं, तो अब तुम्हें सुविधा हो गई कहानी गढ़ने की। और चूँकि डरे हुए हो, तो इसीलिए डर के विषय के बारे में कहानी कैसी गढ़ोगे?

डरावनी।

अब जो आदमी खरगोश से डरता हो, उससे अगर तुम कहो कि खरगोश कैसा होता है, इसके बारे में कुछ बताना।

“खरगोश नरभक्षी होता है। अभी बीते दिनों बगल के जिले में छह पहलवान मारकर खा गए दो खरगोश ने।"

(श्रोतागण हँसते हैं)

अब वो ऐसा क्यों कह रहा है? अब वो ऐसा इसीलिए कह रहा है क्योंकि उसने खरगोशों से इतनी दूरी बना ली है कि खरगोश वास्तव मे क्या है, इसको वो बिलकुल भूल चुका है। उसकी कल्पना का खरगोश कैसा होता है? उसकी कल्पना के खरगोश के सींग हैं, उसकी कल्पना के खरगोश के बड़े-बड़े दाँत हैं, उसकी कल्पना के खरगोश के मुँह से ख़ून रिस रहा है, उसकी कल्पना का खरगोश बड़े पंजे और तीखे नाखूनों वाला है। और वो ये कल्पना सुविधापूर्वक कर सकता हैं क्योंकि खरगोशों से दूर है, खरगोशों से कोई वास्ता ही नहीं है।

छिपकली देखते ही इतना डर लगता है कि भागे ज़ोर से, ज़रा थम करके दो पल उसे देखा भी नहीं। तो अब जब भाग ही रहे हो, तो तुम्हारे चित्त में छिपकली, छिपकली नहीं, वो अब डायनासोर है जो छत से लटक रहा है, तुम्हारे ऊपर वो अब धावा ही बोलने वाला है। कुत्ते-बिल्ली अब कुत्ते-बिल्ली नहीं हैं, वो चीतें हैं, वो शेर हैं। ये दूरी बनाने से होता है।

ये अहंकार की बड़ी पुरानी, बड़ी घिनौनी, लेकिन बड़ी सफल चाल है। उसको जिससे घृणा करनी होती है, उससे वो दूरी बना लेता है। और तुम्हें ये बात बड़ी स्वाभाविक-सी लगती है न, कि "भाई, जिससे नफ़रत हो, उसके पास क्यों जाएँ?"

वास्तव में जिससे नफ़रत होती है, उसके पास तुम इसीलिए नही जाते ताकि तुम उससे नफ़रत करते रह सको, क्योंकि पास चले गए तो घृणा कर नहीं पाओगे।

घृणा तथ्यों पर कहाँ आधारित होती है? घृणा तो कहानियों पर आधारित होती है, और कहानियाँ बची ही तब तक रहेंगी जब तक तुमने दूरी बनाई हुई है। तो जहाँ तुम अपने-आपको पाओ कि किसी से बहुत दूर रहने का मन है, किसी की शक्ल नहीं देखनी है, बात नहीं करनी है, तहाँ समझ जाना कि तुम भीतर के झूठ को प्रोत्साहन दे रहे हो। सामने जाओगे, मिलोगे, बैठोगे, समय बिताओगे, झूठ का पर्दाफ़ाश हो जाएगा, इसीलिए तुम सामने जाना ही नहीं चाहते, या अगर तुम सामने जाओगे भी तो पल भर को जाओगे और विशेष स्थितियाँ निर्मित कर-करके जाओगे। तुम स्थितियाँ ही ऐसी निर्मित करके जाओगे कि जिसमें तुम्हारी कहानी बची रह सके।

जैसे कि कुत्ते से तुम्हें डर लगता हो, तो तुम कुत्ते के सामने जाओगे ही डंडा ले करके। अब जहाँ कुत्ते ने डंडा देखा, तहाँ वो तुम पर भौकेगा और तुम्हे दौड़ाएगा, और तुम्हें तुरंत प्रमाण मिल गया कि तुम्हारी कहानी ठीक थी। और तुम कहोगे, "देखा, मैं तो पहले ही कहता था कि नरभक्षी कुत्ते हैं; कुत्ता है ही नहीं, ये आदमख़ोर है।" तुम ये नहीं देख रहे कि तुम उस कुत्ते के सामने ख़ासतौर पर योजना बना कर गए ही इस तरीक़े से कि वो कुत्ता तुम पर आक्रमण करे, भौंके।

ये अहंकार की घिनौनी, लेकिन दुर्भाग्यवश सफल चाल होती है। तुम जिसको जैसा देखना चाहते हो, वैसा देख सकते हो, और देख ही नही सकते, तुम प्रमाण भी इकट्ठा कर सकते हो कि तुम जिसको जैसा देख रहे हो, वो वैसा ही है। कितनी ख़तरनाक बात है ये!

जो दुनिया को जैसा देखता है, उसे अपनी दृष्टि के पक्ष में प्रमाण भी उपलब्ध हैं कि दुनिया वैसी ही है। फँस गए। कितनी बुरी तरह फँसे हुए हैं हम, अपने ही बीच में! हम अपनी ही दृष्टि के कारागार में बंद हैं।

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