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इन आंदोलनों का समर्थन करें या विरोध? || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
21 min
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प्रश्नकर्ता: मुझे सही मार्गदर्शन नहीं मिला था। मैं आपके वीडियोज़ यूट्यूब से ही देखा हूँ। मैं इससे पहले भ्रष्टाचार के आन्दोलनों से जुड़ा रहा। अभी जो देश में चल रहा है कि साम्प्रदायिक दंगों को इतना बड़ा करके अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक ले जाते हैं तो मुझे उससे बहुत डिस्टर्बेंस होता है। कोई खून भी कर देता है या कोई कुछ और भी कर देता है, फिर भी उसके लिए वो पूरा जमात, पूरा पॉलिटिकल विंग खड़ा हो जाता है।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि देश का क्या होगा इसमें। उसके साथ-साथ हमारा जीवन भी चल रहा है। एक साधक के लिए उन सब चीज़ों को कैसे लेना है? समाचार देखें या फिर समाचार से दूर रहूँ? आँख बन्द करके रहूँ वो भी नहीं हो सकता है क्योंकि समाज के साथ जीवन भी चल ही रहा है, देश भी चल ही रहा है उसके साथ भी। और उसमें मेरा योगदान कैसे हो सकता है?

आचार्य प्रशांत: एक अन्धी चाल का जवाब दूसरी अन्धी चाल नहीं हो सकती। लेकिन अगर कहीं कुछ है जिसमें बेहोशी है, अन्धता है और उसके खिलाफ़ आप कुछ करें तो ऐसा लगने लगता है कि जैसे आप होश के और रोशनी के पक्षधर हैं। ऐसा ज़रूरी नहीं होता न? कहीं पर कोई स्थिति चल रही हो और उस स्थिति के पीछे कुछ लोग या कई लोग, बहुत सारे लोग ज़िम्मेदार हों। और फिर उस स्थिति के खिलाफ़ कुछ दूसरे लोग हों जो आन्दोलन करने लग जाएँ तो इसमें बिलकुल आवश्यक नहीं है कि दोनों में से कोई भी पक्ष ऐसा है कि जिसका आप समर्थन करने लग जाएँ।

दो शराबी आपस में गुत्थम-गुत्था हो गये, लात-घूँसे चलने लगे, ये कोई राम-रावण की लड़ाई थोड़े ही हो गयी कि आप कहें कि दो लोग लड़ रहे हैं तो आवश्यक है कि उसमें से एक तो रावण होगा और एक राम होगा, एक कंस होगा एक कृष्ण होगा, एक दुर्योधन होगा एक अर्जुन होगा। पर हमारे दिमाग में कुछ ऐसा ही खाका खिंचा हुआ है। मेंटल मॉडल है न वो ऐसा ही है कि दो लोग अगर एक दूसरे के विरोध में है तो दो में से एक गलत है, एक सही है, एक अधर्म की ओर है, एक धर्म की ओर है। क्योंकि हमारी कहानियों ने हमको यही बताया है न।

आपने बचपन से जो भी कहानियाँ पढ़ी है, जो भी फ़िल्में देखी हैं, उनमें आपने क्या देखा है? हीरो और विलेन (खलनायक) की लड़ाई। तो लड़ाई आप जहाँ भी होती देख रहे हैं संघर्ष, टकराव, विरोध, आप जहाँ भी होता देख रहे हैं तुरन्त लगता है कि इसमें एक हीरो होगा, एक विलन होगा। बच्चों की कॉमिक्स में क्या होता है? एक डेयरडेविल होता है और एक डेविल होता है। ऐसा ही होता है न? एक डीमन (दैत्य) होता है और उसके विरोध में एक डीटी (देवी) खड़ी होती है। तो ये बहुत ही बच्चों वाली बात है दुनिया को सफ़ेद और काले में बाँट देना। एक अच्छा-अच्छा और एक बुरा-बुरा।

और इसी तरीके से जो हमारे मन में एक खाका खिंचा हुआ है, वो ये है कि जो भी स्थिति चल रही है, वर्तमान स्थिति, करन्ट सिचुएशन , वो चूँकि गड़बड़ है इसीलिए जो भी कोई उसका विरोध कर रहा है, वो अच्छा आदमी है। तो हम डिसेंट को बड़ी ऊँची और बड़ी पवित्र चीज़ मानने लग जाते हैं। हमारा जो अंदरूनी तर्क है, वो समझ रहे हैं आप? जो हमारा अंदरूनी तर्क है वो ये कहता है कि भाई! दुनिया में जो चल रहा है, देश में जो चल रहा है, सत्ता में जो चल रहा है, व्यवस्था में जो चल रहा है, वो तो गलत ही है। उसमें भ्रष्टाचार भी है, ऐसा भी है, वैसा भी है, तो अगर कोई सड़कों पर उतरा है उसका विरोध करने तो जो विरोध करने उतरा, वो सही ही होगा। हमारे मन में ये जो बिलकुल मासूम नहीं, नादान, धारणा बैठ गयी है, उसके बड़े दुष्परिणाम आते हैं। दुष्परिणाम ये आते हैं कि हम एक-एक करके जितने भी विरोध आन्दोलन हैं, डिसेंट मूवमेंट्स हैं, उन पर उम्मीदें टाँगते जाते हैं।

हमें लगता हैं, ‘देखो, काले साम्राज्य का अन्त करने के लिए एक नन्हे से टिमटिमाते तारे का उदय हुआ है। ये तारा अब सूरज बनेगा।’ और पता चलता है कि वो तारा भी अन्धेरे की ही गोद से उठा था, सूरज बनने की जगह वो भी अन्धेरे में ही समा गया। बात समझ में आ रही है?

मूल कारण ये है कि हम जानते ही नहीं हैं कि जो गलत है दुनिया में, देश में, समाज में, राजनीति में, सत्ता में, वो वास्तव में क्या है। क्या चीज़ गलत है हमें पता नहीं। हमें कुछ अखरता तो है पर हमें क्या अखरता हैं, हम जानते नहीं। ठीक वैसे जैसे हमें कुछ चाहिए तो, पर हमें क्या चाहिए वास्तव में वो हम जानते नहीं। तो फिर हम अन्ध विरोध करते है। और जो भी कोई विरोध कर रहा हो, वो हमारे लिए हीरो बन जाता है।

तभी तो आप देखिए न कि मीडिया में भी रोस्टिंग (तीव्र आलोचना) कितनी ज़्यादा चल रही है। वो गलत भी नहीं है क्योंकि जिनको रोस्ट किया जा रहा है, वो हैं इस काबिल कि उनको रोस्ट किया जाए। लेकिन जो रोस्ट कर रहे हैं वो शायद उनसे भी गये-गुज़रे हैं जिन्हें रोस्ट किया जा रहा है। आप बात को समझ रहे हैं?

वो समय नहीं है अभी कि दुर्योधन के सामने अर्जुन खड़ा हो अनिवार्य रूप से। ये भी हो सकता है कि उधर तो दुर्योधन हैं और उसके विरोध में जो खड़ा है वो उतना ही बड़ा दुर्योधन है। क्यों नहीं हो सकता भाई? माताजी के सौ पुत्र थे, पचास-पचास बाँट लेंगे आपस में। पचास इधर खड़े हैं, पचास उधर खड़े हैं, हो जाएगा महासंग्राम। और आपको लगेगा, ‘देखो, उधर वाले दुर्योधन का, इधर वाला जो पक्ष है वो विरोध कर रहा है तो इधर वाला जो पक्ष है वो तो कृष्ण का ही हो गया फिर।’ ऐसा ही लगेगा न? क्योंकि हमने कहानियों में यही देखा है कि बुराई का जो विरोध करे उसका नाम अच्छाई है।

हमारी कहानियों ने हमें बताया है कि जो बुरे का विरोध करे वो अच्छा है, हकीकत ज़रा दूसरी है। हकीकत ये है कि बुरे का विरोध करने के लिए कोई बुरे-से-बुरा भी खड़ा हो सकता है। एक सूखी हड्डी पड़ी हो, उसके पीछे पाँच कुत्ते आकर के भौंकना शुरू कर देते हैं और सब कुत्ते आपस में लड़ रहे हैं।

इसका मतलब ये थोड़े ही है कि उनमें से एक कुत्ता इन्द्र का ऐरावत हाथी हो गया कि भाई जो कुत्ते से लड़े वो निश्चित रूप से कुत्ते से बेहतर होगा, सुन्दर होगा, महान होगा। नहीं भाई! ये भी हो सकता है कि जो कुत्ते से लड़ रहा है वो खुद भी कुत्ता ही है। हर सड़क पर यही तो हो रहा है। सूखी हड्डी के पीछे पाँच कुत्ते लड़ रहे हैं।

यहाँ से आ रही है आपकी शंका। आप देखते हैं सड़कों पर आन्दोलन होते हुए, आपके मन में उम्मीद जग जाती है कि अब ज़रूर इस भ्रष्ट व्यवस्था का अन्त होने वाला है। कभी एक नायक उभरता है, कभी दूसरा नायक उभरता है, कभी तीसरा नायक उभरता है। और हर साल-दो-साल में कहीं-न-कहीं कोई बड़ा जन आन्दोलन शुरू हो ही जाता है। और जब भी कोई जन आन्दोलन शुरू होता है आपको लगता है अब कुछ नया होगा। अब कुछ नया होगा, अब कुछ नया होगा। नया कहाँ से होगा? ये तो दुर्योधन वर्सेज़ (बनाम) दुर्योधन है। दोनों में से कोई जीते, जीता अधर्म ही क्योंकि दोनों लड़ रहे हैं अपने-अपने छोटे-छोटे क्षुद्र, संकीर्ण स्वार्थों के लिए। धर्म दोनों में से किधर को भी नहीं है भाई। तो तुम काहे को जाकर के अपना समय खराब कर रहे हो सड़क पर कि मैं भी उतरा हूँ, 'आइ डिसेंट'।

आन्दोलन बहुत अच्छी बात है। भिड़ जाना, संघर्ष में उतर आना बहुत अच्छी बात है। लेकिन तब न जब तुम्हारा मुखिया कोई कृष्ण जैसा हो, नहीं तो फिर दुर्योधन वर्सेज़ दुर्योधन। स्पष्टता तो हो कि धर्म किधर है। ये थोड़े ही है कि कहीं भी कुछ भी हुआ विरोध में, तुम साथ में भीड़ बढ़ाने के लिए चल दिये।

समझ में आ रही है बात?

यहाँ जो भी कुछ हो रहा है, वो एक बड़ी व्यवस्था के अन्दर हो रहा है। उस बड़ी व्यवस्था में इस बात की पूरी गुंज़ाइश रहती है कि व्यवस्था के अन्दर का ही एक पक्ष व्यवस्था के अन्दर के ही दूसरे पक्ष से भिड़ जाए। तो एक पक्ष को दूसरे पक्ष से भिड़ते देखना, तो ये मत सोच लेना कि दोनों में से कोई भी व्यवस्था के, सिस्टम के बाहर का है। (दोहराते हुए) वो दोनों ही सिस्टम के अन्दर के हैं। वो दोनों ही सिस्टम के अन्दर के हैं। और दोनों लड़ रहे हैं। दोनों में से किसी से भी उम्मीदें मत रख लेना। हड्डी काले कुत्ते को मिले या सफ़ेद कुत्ते को मिले, उससे धरती पर स्वर्ग नहीं आ जाने वाला। लेकिन हमारा ऐसा ही है हम बात-बात में एक काल्पनिक नायक खोजते हैं। और वो नायक खोजने में भी कोई दिक्कत नहीं है। बात ये है कि वहाँ खोजते हैं जहाँ वो है ही नहीं। और फिर हमें क्या मिलती है? निराशा, और एक के बाद एक निराशाएँ मिलती रहती हैं।

भारत में और दुनिया भर में देख लो कि इसी शताब्दी में पिछले बीस साल में ही छोटे-बड़े कितने सारे नायक, हीरोज़ , नये मॉडल्स उभरे हैं। और फिर देखो कि उनका क्या हुआ? ठीक दो हज़ार से शुरू करो और इस साल तक आ जाओ। और पता चलेगा कि ये उभरते हैं, तुम इनकी उम्मीदें लगाते हो और फिर पता चलता है कि ये तो वही है जिनके ये खिलाफ़ थे।

दोनो कुत्तों में लड़ाई इस बात की नहीं थी कि हड्डी खाना बुरी बात है। दोनों कुत्तों में लड़ाई इस बात की थी कि हड्डी कौन खाएगा। और हड्डी में है कुछ नहीं, वो सूखी है। तो ये दोनों कुत्ते जितने धूर्त हैं उतने ही मूर्ख हैं। धूर्त इसलिए है क्योंकि दोनों ही तुमको ये भरोसा दिलाना चाहते हैं कि वो कुत्ते मात्र नहीं हैं, वो किसी ऊँचे लक्ष्य, हाइयर परपज़ के लिए लड़ रहे हैं। वो कोई हाइयर परपज़ नहीं है। हड्डी में दाँत गड़ाने हैं बस और मूर्ख इसलिए हैं क्योंकि दोनों में से कोई भी जीतेगा वो दोनों खुद भी कुछ नहीं पाने वाले। तुम्हें तो बेवकूफ़ बना गये लेकिन मिलेगा उन्हें भी कुछ नहीं। बात समझ में आ रही है?

तो यूँही नये-नये नायकों के दीवाने मत हो जाया करो। और फिर जब चोट लगती है, देखते हो कि जिसको तुमने बड़ा सम्मान दे दिया वो तो यूँही निकला। आर गॉर्ड्स हैव फीट ऑफ क्ले (हमारे देवताओं के पैर मिट्टी के हैं) तो फिर दिल टूट जाता है। फिर तुम कहते हो, ‘घोर कलयुग है! यहाँ तो सब भेड़ की खाल में भेड़िये हैं!’ भाई, वो तो भेड़ की खाल पहनकर भी नहीं आया था। वो तो सरेआम बता रहा था कि मैं भेड़िया ही हूँ।

तुम इतने ज़्यादा कलपे हुए हो बदलाव के लिए तुमको भेड़िया भी दिखता है तो तुम्हें लगने लग जाता है कि ये तो भेड़ है।

बात समझ में आ रही है?

कहाँ तुम लग जाते हो जल्दी से कि फ़लाने आन्दोलन का समर्थन करो, इसका करो, उसका करो। इनमें से किस आन्दोलन में वास्तव में किसी ऊँची चीज़ के पीछे संघर्ष हो रहा है, मुझे बताना? दो पक्ष भिड़े हुए होंगे और दोनों का ही इरादा ये होगा कि ज़्यादा कौन लूटेगा। एक पक्ष कह रहा है माई लूटूँगा, दूसरा कह रहा है मैं लूटूँगा। लूटेरे दोनों तरफ़ है और तुम एक तरफ़ कतार बाँध कर खड़े हो गये कि नहीं, नहीं, नहीं मैं हूँ। इंडिया गेट पर जब मोमबत्ती वाली रैली निकलेगी तो मैं भी आऊँगा। जाओ। नतीजा क्या निकलता है जानते हो? बहुत खौफ़नाक बात है ये, सुनिएगा। शोले फ़िल्म में असरानी का किरदार याद है, जेलर का? वो क्या बोलता है? बहुत उसका मशहूर डायलॉग है — 'आधे इधर जाओ, आधे इधर जाओ, बाकी मेरे साथ आओ'। ये दुनिया की आबादी से कहा जा रहा है, आधे जा रहे हैं उन कुत्तों की टोली में शामिल होने, काले कुत्तों की। आधे जा रहे हैं सफ़ेद कुत्तों की टोली में शामिल होने और सच्चाई का साथ देने के लिए कौन बचा? कोई नहीं।

आधे पक्ष में हैं, आधे विपक्ष में हैं, सच्चाई के साथ कौन है? कोई नहीं। तो फिर जो असली आन्दोलन हो सकता है वो कभी होने ही नहीं पाता क्योंकि जो लोग बदलाव चाहते भी हैं वो नकली आन्दोलनकारियों के साथ खड़े हैं। असली कहाँ से होगा? असली के साथ कौन है? कुछ समझ में आ रही है बात?

ये बहुत अच्छा तरीका होता है भीड़ इकट्ठा करने का — ‘मैं विपक्ष में हूँ।’ तुम किसी भी चीज़ के विपक्ष में हो जाओ तुम्हारे साथ कुछ लोग आ जाएँगे क्योंकि कुछ भी चल रहा हो उससे कुछ लोगों को हमेशा तकलीफ़ रहती ही है। दिक्कत ये नहीं है कि बहुत सारे लोग भ्रष्ट हैं। ज़्यादा बड़ी दिक्कत ये है कि जो लोग भ्रष्टाचार नहीं चाहते, वो भी भ्रष्टाचार का विरोध गलत मंचों से कर रहे हैं। समझ में आ रही है बात?

मैं अगर एक भ्रष्ट आदमी हूँ, मैं एक भ्रष्ट नेता हूँ। और मुझको पता है कि इधर जो लोग बैठे हैं, बाईं तरफ़, ये भ्रष्टाचार नहीं चाहते, तो मेरे लिए इससे बड़ी खुशखबरी क्या होगी कि ये लोग खुद ही किसी भ्रष्ट नेता के अनुयायी बन जाएँ। और वो जो भ्रष्ट नेता है वो कह क्या रहा है इनसे? 'मैं भ्रष्टाचार मिटा दूँगा, भ्रष्टाचार मिटा दूँगा'। मैं कहूँगा, बहुत अच्छी बात है, तुम लोग उसी के साथ रहो। क्योंकि उसने एक चीज़ निश्चित कर दी है, क्या? कि ये लोग अब किसी भी तरीके से मेरे ऊपर आक्रमण नहीं करने वाले।

ये तो उसके साथ हो गये अब वहाँ पर अपना कुछ-कुछ खेल चलता रहेगा। जो असली क्रान्ति हो सकती थी वो कभी होने नहीं पाएगी क्योंकि क्रान्ति चाहने वाले बहुत लोग हैं। पर वो सब क्रान्ति को गलत जगहों पर ढूँढ रहे हैं। गलत नेताओं के साथ ढूँढ रहे हैं। गलत कॉज़ेज़ (कारणों) में ढूँढ रहे हैं। उन जगहों पर तुम कुछ भी कर लो, कितना हो-हल्ला कर लो, कितना बड़ा संघर्ष खड़ा कर लो, कोई क्रान्ति आने नही वाली है।

तो ये बात एकदम पकड़कर रखिएगा, दो पक्षों को आप जब भी लड़ता देखें तो पहले ये जाँच लीजिएगा कि कहीं ये बस काले कुत्ते और सफ़ेद कुत्ते की तो लड़ाई नहीं चल रही है, सूखी हड्डी के पीछे। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये दोनों भीतर से बिलकुल एक ही हैं।

और दुनिया में आप जानते हैं ज़्यादातर लड़ाइयाँ इसी किस्म की हैं। अन्दर से सब एक ही हैं। बस एक को जो चाहिए था वो दूसरे को मिल गया। दोनों को चाहिए एक ही चीज़ थी। ऐसा नहीं है कि दोनों की माँगें अलग-अलग हैं, लक्ष्य, इरादे अलग-अलग हैं। कुछ नहीं। दोनों को एक ही चीज़ चाहिए थी। एक को मिल गयी, दूसरे को नहीं मिली, तो दूसरा भड़क गया है और शोर मचा रहा है। कि जैसे एक रेस हो जिसमें बहुत सारे लोग दौड़े हों और जो पीछे रह गया हो, वो कहे, ‘रेसबाज़ी मुर्दाबाद, रेसबाज़ी मुर्दाबाद।’ उसको इस सिस्टम से, रेस की व्यवस्था से इतनी आपत्ति क्यों है? क्योंकि वो पीछे रह गया है। लेकिन इरादा इसका भी यही है कि जीत जाऊँ।

ऐसा नहीं है कि ये दौड़ा ही नहीं, ऐसा नहीं है कि इसने कहा कि आइ ऑप्ट आउट , मैं रेस से बाहर हूँ, ये भी पूरी जान लगाकर दौड़ा। लेकिन किस्मत की कमी होगी, मेहनत की कमी होगी, बुद्धि की कमी होगी, कोई भी बात हो सकती है, ये पीछे रह गया। ये पीछे रह गया तो ये कहने लग गया, ‘मैं तो रिवोल्यूशनरी हूँ। मैं ये पूरी व्यवस्था बदलना चाहता हूँ।’ तुम व्यवस्था नहीं बदलना चाहते, तुम बस ये चाहते हो कि वो जो आगे निकल गये हैं, तुम उनके बराबर पहुँच जाओ या उससे आगे निकल जाओ। हो तुम भी इसी ट्रैक पर ही, इसी रेस पर ही।

एक बार एक शॉपिंग मॉल में था। तो वहाँ कुछ फर्नीचर देख रहे थे, बोधस्थल के लिए। वहाँ वो जो रेट बता रहा था, अच्छी बड़ी दुकान थी, वो गलत थे। बढ़ाकर बता रहा था बहुत ज़्यादा। तो मेरे साथ जो थे उन्होंने उससे थोड़ी बहस करी और फिर दाम कम करवा लिये। और वो ब्रैंडेड, बड़ी दुकान। फिर हम बाहर आये, गाड़ी में बैठे, निकलने लग गये तो एग्ज़िट पर पार्किंग के जो पैसे देने होते हैं वहाँ वो हमसे चालीस रुपये की जगह साठ रुपये माँगने लग गया। जबकि जो दाम हैं वो बँधे होते हैं। वो जो टिकट, कूपन, टोकन अपना लिखा होता है। माँग रहा है। वहाँ फिर उससे बहस करी, उसको बोला, ‘चालीस लिखा है, तू साठ कैसे माँग रहा है?’ चालीस ही दिये।

फिर मैंने कहा, देखा तुमने? एक बात देखी? दोनो में अन्तर बता दो मुझे। ऊपर जो था वो चालीस हज़ार के साठ हज़ार माँग रहा था। नीचे जो है वो चालीस का साठ माँग रहा है। अमीर और गरीब में अन्तर कहाँ है, मुझे ये बताओ? लेकिन तुम कहोगे, ‘अरे! अमीर तो बड़े ज़ुल्मी होते हैं, ज़ालिम होते हैं और अमीरों ने बड़ी लूट मचा रखी है।’ गरीब का भी उतना ही इरादा है लूट मचाने को बस वो मचा नहीं पा रहा। अभी उसका बस नहीं चल रहा है। उसका बस चले तो वो भी बराबर की लूट मचाएगा क्योंकि है ये भी उसी व्यवस्था में शरीक। अमीर फोर्टी के (चालीस हज़ार) का सिक्स्टी के (साठ हज़ार) कर रहा है और गरीब फोर्टी (चालीस) का सिक्स्टी (साठ) कर रहा है। मुझे अन्तर बता दो। अन्तर कहाँ है दोनों में? लेकिन आप जल्दी से आन्दोलनकारी बन जाते हो, ‘अमीरों, हाय-हाय!’ क्यों भाई?

मैं ये नहीं कह रहा कि तुम जिनका विरोध कर रहे हो उनका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। मैं कह रहा हूँ, जो विरोध कर रहे हैं वो बराबर के गलत हैं। पहले उनके मनसूबे तो देख लो जो विरोध में खड़े हुए हैं। तो असली क्रान्ति कैसी होगी फिर? असली क्रान्ति वो होगी जिसमें इन दोनों ही पक्षों का विरोध होगा और वो क्रान्ति करने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए। समझ में आ रही है बात? असली क्रान्ति वो होगी जहाँ डंडा लेकर जाओ और काले और सफ़ेद दोनों कुत्तों को भगा दो। ये थोड़े ही कि तुम काले की पार्टी में शामिल हो गये या सफ़ेद के पीछे-पीछे लग गये। हमें वो डंडा चाहिए जिससे ये दोनों ही भगा दिये जाएँ। उनको भगाना ज़रूरी है। इनके हित में भी कि इनको भगा दिया जाए। क्यों? क्योंकि ये आपस में लड़े जा रहे हैं, एक-दूसरे को खरोंच रहे हैं, काट रहे हैं। और पाएँगे क्या? सूखी हड्डी।

तो तुम इन दोनों को ही भगा दो इसमें तुम्हारा भी भला है, उनका भी भला है। लेकिन जो तीसरा है न यही तो हमें पकड़ में नहीं आता। हम द्वैत में उलझे रहते हैं। प्लस-माइनस, ए और बी या तो इधर या तो उधर। ये तीसरा हमेशा मुश्किल पड़ता है। तीसरा ही तो फिर अद्वैत होता है न। इसलिए अध्यात्म चाहिए रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में ताकि द्वैत के चक्करों में जल्दी से न फँस जाओ। ज़्यादातर संघर्ष इस लायक नहीं होते कि उनमें से तुम किसी भी पक्ष का समर्थन करो। तुम पागल होगे अगर सास-बहू की लड़ाई में जाकर एक तरफ़ खड़े हो गये। वो दोनों एक हैं क्योंकि सास भी कभी (बहू थी)। (श्रोतागण हँसते हैं)

तुम क्या पगला रहे हो कि एक के साथ खड़े हो गये! जो तुमको आज शोषित लग रहा है उसका इरादा है कल शोषक बनने का, तो दोनों एक हैं। समझ में आ रही है बात कुछ?

फिर लोग आते हैं, कहते हैं, ‘आचार्य जी, आप हर बात पर बोलते हो, छोटी-छोटी बात बोलते हो। आपने एनआरसी पर नहीं बोला, सीईए पर नहीं बोला, किसान आन्दोलन पर नहीं बोला।’ क्या बोलूँ? कुछ बोलने जैसा हो तो बोलूँ। तुम पगलाये जा रहे हो, तुमको लग रहा है कि बहुत बड़ा मुद्दा है, मुझे दिख रहा है कि ये तो कुछ नहीं है। बहुत पुराना खेल है। न मैं इस पक्ष का समर्थन कर सकता हूँ, न उस पक्ष का समर्थन कर सकता हूँ। हाँ! मैं ये ज़रूर बता सकता हूँ कि ये जो लड़ाई है ये वास्तव में है क्या। और जब मैं ये बता दूँगा ये लड़ाई वास्तव में क्या है तो दोनों ही पक्ष मुझसे नाराज़ हो जाते हैं। होने दो। वो मैं दिन-रात बता रहा हूँ कि दुनिया के सारे संघर्ष वास्तव में क्या हैं। और ये भी बता रहा हूँ कि कौनसी ऐसी असली चीज़ है जिसके लिए संघर्ष किया जाना चाहिए। और वो संघर्ष कोई करता नहीं। भूलना नहीं, ‘आधे उधर जाओ, आधे उधर जाओ’, और असली संघर्ष में असरानी साहब अकेले खड़े हैं। उनके साथ कोई नहीं है।

आ रही है बात समझ में?

झूठी क्रान्तियों से बचो और असली क्रान्ति की तैयारी करो। और असली क्रान्ति कभी ला नहीं पाओगे अगर झूठी क्रान्तियों में उलझ कर रह गये तो। इसीलिए असली क्रान्ति कभी आती नहीं है क्योंकि तुम झूठी लड़ाइयाँ लड़कर सन्तुष्ट हो जाते हो कि हमने तो बड़ा काम कर दिया।

दुर्योधन वर्सेज़ दुर्योधन में ’आइ फ़ेवर्ड दुर्योधन एंड दुर्योधन वन’ (दुर्योधन और दुर्योधन कि लड़ाई में मैंने दुर्योधन का साथ दिया और वो जीत गया)। कुछ बदला? कोई फ़र्क पड़ा?

इस बात से भी कोई फ़र्क पड़ता है कि तुमने इधर वाले दुर्योधन का समर्थन किया या उधर वाले का किया? पर तुम कितने खुश हो जाते हो! दुर्योधन वर्सेज़ दुर्योधन, ’आइ फेवर्ड दुर्योधन, दुर्योधन वन।’ तुम नहीं भी होते तो भी नतीजा यही निकला था न? वन ऑफ़ द दुर्योधन्स वुड हैव वन (एक दुर्योधन को तो जीतना ही था)। कृष्ण के लिए तुम्हारे पास कोई जगह नहीं, गीता से कोई लेना-देना नहीं। कुछ आ रही है बात समझ में?

बड़ी लड़ाई लड़ो और छोटे मुद्दों को बड़ा समझने से बचो। हकीकत में जीने का मतलब होता है कि सबसे पहले तथ्यों की छानबीन करो, बिलकुल निष्पक्ष होकर के। हम तथ्य भी सामने नहीं रखते हैं। इतनी जल्दी में रहते हैं एक को अच्छा और एक को बुरा घोषित करने की कि ठीक से जाँच-पड़ताल भी नहीं करते कि ज़मीनी यथार्थ क्या है।

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