प्रश्नकर्ता: मुझे सही मार्गदर्शन नहीं मिला था। मैं आपके वीडियोज़ यूट्यूब से ही देखा हूँ। मैं इससे पहले भ्रष्टाचार के आन्दोलनों से जुड़ा रहा। अभी जो देश में चल रहा है कि साम्प्रदायिक दंगों को इतना बड़ा करके अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक ले जाते हैं तो मुझे उससे बहुत डिस्टर्बेंस होता है। कोई खून भी कर देता है या कोई कुछ और भी कर देता है, फिर भी उसके लिए वो पूरा जमात, पूरा पॉलिटिकल विंग खड़ा हो जाता है।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि देश का क्या होगा इसमें। उसके साथ-साथ हमारा जीवन भी चल रहा है। एक साधक के लिए उन सब चीज़ों को कैसे लेना है? समाचार देखें या फिर समाचार से दूर रहूँ? आँख बन्द करके रहूँ वो भी नहीं हो सकता है क्योंकि समाज के साथ जीवन भी चल ही रहा है, देश भी चल ही रहा है उसके साथ भी। और उसमें मेरा योगदान कैसे हो सकता है?
आचार्य प्रशांत: एक अन्धी चाल का जवाब दूसरी अन्धी चाल नहीं हो सकती। लेकिन अगर कहीं कुछ है जिसमें बेहोशी है, अन्धता है और उसके खिलाफ़ आप कुछ करें तो ऐसा लगने लगता है कि जैसे आप होश के और रोशनी के पक्षधर हैं। ऐसा ज़रूरी नहीं होता न? कहीं पर कोई स्थिति चल रही हो और उस स्थिति के पीछे कुछ लोग या कई लोग, बहुत सारे लोग ज़िम्मेदार हों। और फिर उस स्थिति के खिलाफ़ कुछ दूसरे लोग हों जो आन्दोलन करने लग जाएँ तो इसमें बिलकुल आवश्यक नहीं है कि दोनों में से कोई भी पक्ष ऐसा है कि जिसका आप समर्थन करने लग जाएँ।
दो शराबी आपस में गुत्थम-गुत्था हो गये, लात-घूँसे चलने लगे, ये कोई राम-रावण की लड़ाई थोड़े ही हो गयी कि आप कहें कि दो लोग लड़ रहे हैं तो आवश्यक है कि उसमें से एक तो रावण होगा और एक राम होगा, एक कंस होगा एक कृष्ण होगा, एक दुर्योधन होगा एक अर्जुन होगा। पर हमारे दिमाग में कुछ ऐसा ही खाका खिंचा हुआ है। मेंटल मॉडल है न वो ऐसा ही है कि दो लोग अगर एक दूसरे के विरोध में है तो दो में से एक गलत है, एक सही है, एक अधर्म की ओर है, एक धर्म की ओर है। क्योंकि हमारी कहानियों ने हमको यही बताया है न।




