प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले बहुत समय से हिंदु जहाँ भी हैं उनके साथ अन्याय और अत्याचार ही हुआ है, भारत देश में भी और दूसरे देशों में भी। चाहे वह पश्चिमी देश हों और चाहे वह एशियाई देश हों, हर जगह हिंदुओं को असम्मान और उत्पीड़न मिलता रहा है और बड़े समय से मिलता रहा है। और अभी हाल के दिनों में पड़ोसी देशों में भी हिंदुओं पर अत्याचार हुए हैं। तो यह सब देखकर मेरा मन बहुत ही दुखी है कि इतने पुराने हैं हिंदु और इतने सारे हैं हिंदु, फिर भी हिंदु धर्म इतना कमज़ोर कैसे हो गया कि हिंदुओं पर जहाँ देखो वहाँ अत्याचार, इत्यादि होते रहते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखिए! एकदम जो मूलभूत बात है वहाँ से शुरू करता हूँ। यह संवेदनशील प्रश्न होते हैं, इस पर मैं कोई भड़काऊ, उत्तेजक बात बोल दूँ, बड़ा आसान होगा और आप भी उस बात को बड़ी आसानी से ग्रहण कर लेंगे। क्योंकि हममें से ज़्यादातर लोग उसी तरह की सामग्री की तलाश में रहते हैं जो कि हमारी भावनाओं को और उत्तेजित करे और हमारे भीतर इस ख़्याल को और पुख़्ता करे कि हम शोषित लोग हैं और हमें बदला इत्यादि लेना चाहिए। तो मैं उस तरह की बात नहीं कर रहा हूँ। जो मूल बात है, जो सच्ची बात है, वह मैं आप लोगों के सामने रखना चाहता हूँ।
देखिए! धर्म को पोषण तीन जगहों से मिलता है, कोई भी धर्म हो। और यहाँ पर धर्म से मेरा वह ही मतलब है जो आपका मतलब हिंदु, मुसलमान, इसाई वगैरह से होता है। तो अभी यह बहस-कुतर्क मत करने लग जाइएगा कि देखिए साहब! धर्म और मज़हब में अंतर होता है या रिलिजन और धर्म में अंतर होता है और हिंदु धर्म और सनातन धर्म में अंतर है। वह सब बारीकियाँ मैं समझता हूँ, बहुत अच्छे से समझता हूँ पर अभी जब मैं धर्म शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ तो उसी अर्थ में कर रहा हूँ जिस अर्थ में आपने यहाँ पर कहा है कि हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है। जिस अर्थ में सार्वजनिक तौर से, प्रचलित तौर पर धर्म शब्द का इस्तेमाल होता है, उस तौर पर कह रहा हूँ कि धर्म को ताकत और पोषण तीन जगहों से मिलता है।
तीन जगहें कौनसी हैं? तीन जगहें होती हैं –पहली, धर्मग्रंथ। दूसरी, उस धर्म के महापुरुष, अवतारी पुरुष, पैगंबर आदि। और तीसरी, यह विश्वास, यह आस्था कि धर्म का पालन हमें आनंद तक, सत्य तक, मुक्ति तक, हमारी भलाई तक ले जाएगा; माने धर्म में विश्वास। यह तीन चीज़ें चाहिए होती हैं।




