ज्ञान जहाँ घुटने टेक देता है उसके आगे का काम प्रेम का है || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। हर प्रश्न का जवाब आपके वीडियोज़ के माध्यम से यूट्यूब पर मुझे उपलब्ध है, पर तब भी एक जिज्ञासा बनी हुई है उत्तर जानने की। बिना प्रश्न के हूँ, लेकिन फिर भी उत्तर जानने की इच्छा समाप्त नहीं हो रही है। आचार्य जी, कृपया बताएँ कि यह क्या है और इस बला का क्या समाधान है।
आचार्य प्रशांत: जो प्रश्न बनकर प्रकट होता है, वही मूलभूत प्रश्न है। समझना! जो प्रश्न बनकर प्रकट होता है, जो भाँति-भाँति के प्रश्नों का रूप लेकर प्रकट होता है, वो ही मूलभूत प्रश्न है। हम सत्य से एक आयाम भर दूर नहीं हैं; हमारी दूरी दो-तली है, दोहरी है, दो आयामों की है।
पहली दूरी है आत्मा और अहम् के बीच की, और दूसरी दूरी है अहम् और संसार के बीच की। तुम अहम् बन बैठे, यही अच्छी ख़ासी दूरी बना ली तुमने आत्मा से। और फिर तुम संसार से लिप्त हो गये — ये दोगुनी और दोहरी दूरी हो गयी।
प्रश्न हमारे किससे सम्बन्धित होते हैं? कहिए, आप बोलिए! किससे सम्बन्धित होते हैं? संसार से; और बैठना कहाँ है हमें जाकर अन्ततः? आत्मा में; और आत्मा से हम कितने तलों की दूरी पर हैं? दो तल की। पहला तल ये कि आत्मा से छिटके अहम् बन गये और — एक तो करेला, दूजा नीम चढ़ा — अहम् को भी अपनी कुछ सुधि नहीं। अहम् भी अहम् मात्र बनकर सन्तुष्ट नहीं, वो जाकर लिपट जाता है संसार से। और सारे सवाल जो तुम करते हो वो होते हैं संसार सम्बन्धित।
अब बात ये है कि संसार सम्बन्धित तुम्हारे सारे सवालों के उत्तर दे दिये जाएँ, समाधान भी कर दिये जाएँ तो भी अधिक-से-अधिक एक तल ही तो काटा मैंने — “संसार से गिरे, अहम् में अटके”। मत कहना, “आसमान से गिरे, खजूर में अटके” — “संसार से गिरे, अहम् में अटके।”



