उनको अब सही लगा कि गलत लगा, पर उनको जैसा भी लगा कि ये ठीक है उस पर उनको अड़ना था। और दुबला-पतला आदमी अड़ा हुआ खड़ा है, ऐसे। दुबला-पतला, वृद्ध व्यक्ति, जल्दी-जल्दी चलने वाला, उसकी ज़िद से यही नहीं कि अंग्रेज घबरा रहे हैं, हिंदुस्तानी भी घबरा रहे हैं। और यही नहीं कि विरोधी घबरा रहे हैं, कि जिन्ना और माउंटबेटन को कुछ लग रहा है और चर्चिल को कुछ लग रहा है। उनकी अपनी पार्टी के लोग भी घबरा रहे हैं कि ये कहीं फिर से न ज़िद पर बैठ जाएँ।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। कल 30 जनवरी है, गांधी जी की पुण्यतिथि है। 78 वर्ष हो गए जब वो पंचतत्त्व में विलीन हुए थे। इन 78 वर्षों में हम देखते हैं बहुत सारा बदलाव, विकास, लेकिन साथ ही हम देखते हैं नफरत, ध्रुवीकरण और निरंतर एक टकराव की प्रवृत्ति बनी रहती है। ऐसे समय में फिर गांधी जी की जो सत्य और अहिंसा की जो विचारधारा है, वो कैसे सार्थक है?
आचार्य प्रशांत: सत्य विचारधारा नहीं होता है। अहिंसा भी कोई विचारधारा नहीं होती है। ठीक है? तो किसी व्यक्ति के साथ आप ऊँचे शब्द जोड़ दोगे, तो नतीजा ये निकलेगा कि किसी भी वजह से अगर आप उस व्यक्ति को रिजेक्ट करोगे, तो वो शब्द भी फिर नकारे जाते हैं और बदनाम हो जाते हैं।
अध्यात्म में सत्य-अहिंसा कोई विचारधारा नहीं होते। द्वैत के एक सिरे पर अहंकार हमेशा बैठा होता है। यही अहंकार जब स्वयं को देखने लगता है तो द्वैत निर्मूल प्रतीत होता है। ठीक है? ये सत्य है, इसमें कोई विचार नहीं है, कोई सिद्धांत नहीं है। ये सीइंग की बात है, ये तात्कालिक बात है।
और अहिंसा क्या है? कि दूसरा होगा, तो उससे पराएपन का ही तो रिश्ता होगा क्योंकि वो दूसरा है। दूसरे का होना माने उससे पराएपन का रिश्ता, यही परायापन हिंसा है। अहिंसा माने दूसरा है ही नहीं। दूसरे से अच्छा रिश्ता रखना अहिंसा नहीं कहलाता, दूसरे से प्रेम रखना अहिंसा नहीं कहलाता। ये देख पाना कि दूसरे को दूसरा बनाने वाला, दूसरे को पराया बनाने वाला अहंकार है, और वो अहंकार मिथ्या है। दूसरा कोई है ही नहीं।




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