
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। कल 30 जनवरी है, गांधी जी की पुण्यतिथि है। 78 वर्ष हो गए जब वो पंचतत्त्व में विलीन हुए थे। इन 78 वर्षों में हम देखते हैं बहुत सारा बदलाव, विकास, लेकिन साथ ही हम देखते हैं नफरत, ध्रुवीकरण और निरंतर एक टकराव की प्रवृत्ति बनी रहती है। ऐसे समय में फिर गांधी जी की जो सत्य और अहिंसा की जो विचारधारा है, वो कैसे सार्थक है?
आचार्य प्रशांत: सत्य विचारधारा नहीं होता है। अहिंसा भी कोई विचारधारा नहीं होती है। ठीक है? तो किसी व्यक्ति के साथ आप ऊँचे शब्द जोड़ दोगे, तो नतीजा ये निकलेगा कि किसी भी वजह से अगर आप उस व्यक्ति को रिजेक्ट करोगे, तो वो शब्द भी फिर नकारे जाते हैं और बदनाम हो जाते हैं।
अध्यात्म में सत्य-अहिंसा कोई विचारधारा नहीं होते। द्वैत के एक सिरे पर अहंकार हमेशा बैठा होता है। यही अहंकार जब स्वयं को देखने लगता है तो द्वैत निर्मूल प्रतीत होता है। ठीक है? ये सत्य है, इसमें कोई विचार नहीं है, कोई सिद्धांत नहीं है। ये सीइंग की बात है, ये तात्कालिक बात है।
और अहिंसा क्या है? कि दूसरा होगा, तो उससे पराएपन का ही तो रिश्ता होगा क्योंकि वो दूसरा है। दूसरे का होना माने उससे पराएपन का रिश्ता, यही परायापन हिंसा है। अहिंसा माने दूसरा है ही नहीं। दूसरे से अच्छा रिश्ता रखना अहिंसा नहीं कहलाता, दूसरे से प्रेम रखना अहिंसा नहीं कहलाता। ये देख पाना कि दूसरे को दूसरा बनाने वाला, दूसरे को पराया बनाने वाला अहंकार है, और वो अहंकार मिथ्या है। दूसरा कोई है ही नहीं।
तो क्या हैं? ये दूसरे नहीं हैं, क्या हैं?
प्रकृति समुद्र है और उसमें उठने वाली लहरें हैं ये सब। एक लहर दूसरी लहर को कितना पराया बोल सकती है? ये बात जमती नहीं न, एक लहर दूसरी लहर से बोल रही है, "मैं तुझसे अलग हूँ," किस अर्थ में अलग हो, भाई? वही पानी, वही समुद्र, वही उठना, वही गिरना, वही बुलबुले, वही गुरुत्वाकर्षण, वही चाँद। एक लहर दूसरी लहर से कितना अलग हो सकती है?
जब अहंकार स्वयं को देखने लगता है, तो पराएपन का भाव बड़ा व्यर्थ सा हो जाता है। जब कोई पराया है नहीं, तो अब हिंसा नहीं हो सकती। परायापन ही हिंसा है।
अहिंसा माने ये नहीं है कि किसी को मारेंगे-पीटेंगे नहीं। अहिंसा का अर्थ होता है कोई दूसरा अब है ही नहीं।
उसको दूसरा नहीं मानना है। ये विचारधारा नहीं रखनी है कि मैं किसी को पराया नहीं मानूँगा। ये देखना है कि मैं जो स्वयं को विशिष्टता देता हूँ, इंडिविजुअलिटी, मैं जो स्वयं को पृथकता देता हूँ, अलगाव; ये पृथकता ही झूठ है, ये है अहिंसा। अहिंसा माने अच्छा आचरण नहीं होता कि आप मुझसे मिलने आए और मैं कहूँ, "आइए, आइए, बैठिए, गुड़ खाइए, पानी पीजिए। आपने मुझे थप्पड़ मार दिया, कोई बात नहीं, मैं आपको घूँसा नहीं मारूँगा क्योंकि मैं अहिंसक हूँ।" ये नहीं होता अहिंसा। और सत्य माने ये नहीं होता कि किसी ने पूछा, "तुम्हारी जेब में कितने रुपए हैं?" और मेरे पास 555 हैं, तो मैं बता दूँ 555 हैं। ये सत्य नहीं होता। तो ये कोई विचारधाराएँ ही नहीं हैं। बात आप समझ रहे हैं?
गांधी जी की जो पारिभाषिक बात थी, वो थी आग्रह, दृढ़ता, ज़िद, धृति। उनको अगर आपको याद करना है, तो न सत्य से करिए, न अहिंसा से करिए। उनको याद करना है तो उनकी ज़िद के लिए करिए। आप अनावश्यक ही उनका नाम सत्य और अहिंसा से जोड़ते हैं। जो चीज़ उनको विशेष बनाती है, एकदम यादगार बनाती है, वो है उनका संकल्प। ये व्यक्ति परम आग्रही था। ठान लिया तो ठान लिया। इनकी ज़िद से सब घबराते थे। इस बात के लिए उनको याद करिए।
सत्य-अहिंसा वग़ैरह अच्छी बात है, बढ़िया है, पर इन बातों का गांधी जी के साथ प्राथमिक संबंध नहीं है। और जिस बात का प्राथमिक संबंध है, उसका हम उल्लेख नहीं करते। वो क्या है? आग्रह। आग्रह बोलो। सत्य का क्या आग्रह करोगे तुम? आग्रह।
उनको अब सही लगा कि गलत लगा, पर उनको जैसा भी लगा कि ये ठीक है उस पर उनको अड़ना था। और दुबला-पतला आदमी अड़ा हुआ खड़ा है, ऐसे। दुबला-पतला, वृद्ध व्यक्ति, जल्दी-जल्दी चलने वाला, उसकी ज़िद से यही नहीं कि अंग्रेज घबरा रहे हैं, हिंदुस्तानी भी घबरा रहे हैं। और यही नहीं कि विरोधी घबरा रहे हैं, कि जिन्ना और माउंटबेटन को कुछ लग रहा है और चर्चिल को कुछ लग रहा है। उनकी अपनी पार्टी के लोग भी घबरा रहे हैं कि ये कहीं फिर से न ज़िद पर बैठ जाएँ।
ज़िद बड़ी बात होती है। आग्रह बहुत बड़ी चीज़ होती है। और उतना नैतिक सामर्थ्य तभी आ सकता है जब आप आग्रह उसी बात का करें जो आपको ईमानदारी से उचित लगती हो। नहीं तो आप अपनी ज़िद के लिए आमरण अनशन तो नहीं कर पाएँगे। ये तो नहीं कर पाएँगे आप, फिजूल की उथली किसी बात के लिए कहें, "खाना नहीं खाऊँगा," तो दो ही दिनों में इधर-उधर से वही फ्रिज खुलने की आवाज़ आने लगेगी।
ये चीज़ उनसे सीखने लायक है। पर इस चीज़ पर बहुत कम वजन रखा जाता है। इस चीज़ की बात बहुत कम होती है। हम गांधी जी को अहिंसा के नाम से याद करना चाहते हैं। हम कहते हैं, "ये गौतम और गांधी की धरती है, अहिंसा।” गांधी जी दार्शनिक नहीं थे। गांधी जी ने अहिंसा का भी जो अर्थ दिया, वो ठीक था पर बस व्यवहार के तल पर। अहिंसा मूलतः पारमार्थिक होती है और उस तल पर गांधी जी ने उसकी कोई बात नहीं करी है। कम से कम समझा या नहीं समझा, ये मैं नहीं जानता। पर यदि समझा भी, तो कम से कम उसकी बात नहीं करी है।
उनके लिए अहिंसा यही थी कि दूसरे को दुख न देना, दूसरे को चोट न देना। उनकी अहिंसा में दूसरा शामिल था। और जब तक दूसरा है तब तक अहिंसा नहीं हो सकती। क्योंकि अगर दूसरा है तो मैं भी हूँ न। दूसरे के होने का अर्थ ही होता है कि मैं हूँ, तभी तो दूसरा है। दूसरे के होने का अर्थ ही होता है अहंकार, मैं हूँ। और अहंकार और अहिंसा साथ नहीं चलते।
गांधी जी से अहिंसा नहीं, आग्रह सीखो। जो सही लग गया, तो लग गया।
लग गया, तो लग गया और फिर न दिन देखेंगे, न रात देखेंगे, न अपना देखते, न पराया देखते। बड़ी कोशिश की थी अंग्रेजों ने, वहाँ गए थे गोलमेज वार्ता के लिए कि इन्हें कपड़े पहना दें, बोले, नहीं पहनते। और चर्चिल जैसा आदमी, सूट-बूट ही नहीं सिगार वाला, वो बड़ा अजीब लग रहा है कि ये बैठा दिया यहाँ पे नंगे बुजुर्ग को, और वो वहाँ बैठे हुए हैं बीच में। और कांग्रेस ने बोला, "ये हमारे एकमात्र प्रतिनिधि होंगे।"
तो इतनी सारी कुर्सियाँ हैं, पर आदमी कौन बैठा है? एक। चर्चिल को एकदम नहीं सुहाते थे गांधी, जिन्ना को एकदम नहीं सुहा रहे। और वहाँ नोवाखली में दंगे शुरू कर दिए तो वहाँ पर वो पहुँच गए अकेले। भारत जब स्वतंत्रता का जश्न मना रहा था, गांधी जी क्या कर रहे थे? वो पद यात्राएँ कर रहे थे अपने ही देशवासियों के ख़िलाफ़।
जिस आदमी ने अपने जीवन की शुरुआत की दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष करके, उसके जीवन का संघर्ष आगे बढ़ा अंग्रेजों के ख़िलाफ़ संघर्ष करके। उसके बाद और आगे बढ़े, तो बोले, "ये जो सामाजिक व्यवस्था है, गंदगी है, छुआछूत है, जातिभेद है, इसके ख़िलाफ़ करूँगा।" और अपने जीवन के आख़िरी समय में ये जो हिंदू-मुसलमान चल रहा था, वो उसके ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे थे। और फिर गोली भी इसीलिए खाई।
ये था वो आदमी। इस बात के लिए आप उनका सम्मान करें। जो बात उन्हें सचमुच सम्मान का अधिकारी बनाती है, उस बात पर ज़्यादातर हमारी नज़र नहीं जाती है। कभी फकीर बोल दिया, कभी महात्मा बोल दिया। ऐसे कुछ नहीं होता, भारत में तो हर दसवाँ आदमी महात्मा है और गली-गली फकीर घूमते हैं। उससे कुछ नहीं होता। पर ऐसा जिद्दी आदमी भारत के इतिहास में कम देखने को मिला है। क्या? और देख के नहीं लगता है कि इतने जिद्दी होंगे।
भागे जा रहे हैं, पैदल-पैदल। कोई लेने आने वाला था, कहीं पहुँचना है, नहीं आ रहा तो पैदल ही पहुँच गए वहाँ भाग-भाग के। आप छोटे होंगे, ये सब कहानियाँ पढ़ते होंगे। गांधी जी कहीं जा रहे थे, जहाँ जा रहे थे, वहाँ पता नहीं क्या था, तांगा था, कुछ भेजना था किसी ने भेजा नहीं तो पैदल ही भाग लिए। जब पैदल ही भाग लिए, देख रहे हैं अपना घड़ी में बोले, "पहुँचेंगे नहीं।" तो एक आदमी रास्ते में साइकिल बोले, "इधर आ।" उसकी साइकिल ही लेके भाग लिए।
पर हमको लगता है ये छोटी बातें, ये छोटी बातें नहीं हैं। ये वो बातें हैं जिनके लिए उनका सम्मान करो। कि जो भी थे, जैसे भी थे, पर जो उनको सही लगा उस पर अड़े वो तबीयत से, जम के अड़े। ये कभी नहीं था कि आधी-अधूरी संधि-समझौता कर लेंगे।
हाँ, उनको जो सही लगा, क्या वो सचमुच सही था? इस पर बहस हो सकती है, हो भी रही है, होनी चाहिए। उनको जो बातें गलत लगती थीं, क्या वो सचमुच गलत थीं? इस पर भी बहस हो सकती है। बढ़िया बात है, आप कर लो बहस। और बिल्कुल हो सकता है कि उनको बहुत कुछ जो सही लगता था उसमें खोट हो। विशेषकर अर्थव्यवस्था को लेकर उनके जो विचार थे, वो बहुत व्यवहारिक नहीं थे। ग्राम स्वराज्य से लेकर अंतरराष्ट्रीय संबंध, सैन्य संबंध, बहुत सारी बातें ऐसी थीं जिस पर आप आज गांधी को पढ़ेंगे तो आप कहेंगे, "ये बातें जम नहीं रही हैं। ये बातें व्यवहारिक नहीं हैं।"
ठीक है, आपको जो बातें व्यवहारिक नहीं लग रही हैं, आप उन्हें खारिज करिए। लेकिन एक बात मत भूलिएगा कि वो इंसान ऐसा था कि उसको अपनी ईमानदारी में जो बात सही लगी, वो उससे पीछे नहीं हटी। और ये बहुत बड़ी बात है, बहुत बड़ी बात है। ख़ासकर वो वर्ग जिसके पास संसाधन नहीं हैं, उसको गरिमा सिखा गए गांधी। बोले, "तुम्हारे पास और कुछ नहीं है न विरोध करने को, अपनी जान तो है न। तुम्हारे पास तोप-तलवार कुछ नहीं है, रुपया-पैसा नहीं है, समाज में आवाज़ नहीं है तुम्हारे पास, राजनैतिक बल नहीं है तुम्हारे पास, पर तुम्हारे पास तुम्हारी जान तो है न। अपनी जान लेकर अड़ जाओ।" ये है उनका योगदान।
क्या कुछ नहीं है। क्या? कुछ नहीं है, इतना-सा कोई कपड़ा पहन रखा है, वो भी ख़ुद ही। एक, पर नैतिक बल, "जो मुझे सही लगता है, अडूँगा।" आपको ये बात पता है अपनी पत्नी के भी खूब ख़िलाफ़ हो गए थे। ये जानते हैं आप? किस बात पर हुए थे?
श्रोता: खाने को लेकर।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ये तो बहुत रोचक बात है।
श्रोता: उन्होंने बोला था कि जाकर वॉशरूम साफ़ करो।
आचार्य प्रशांत: कौन बताएगा?
श्रोता: उनके पिताजी *एक्सपायर हुए थे।
आचार्य प्रशांत: वो तो अलग क़िस्सा है, पिताजी एक्सपायर हुए थे पत्नी के साथ थे। वो ठीक है। देखिए, अब यही बात है न, जिस बात का उनको सचमुच श्रेय मिलना चाहिए, वो बातें प्रचारित नहीं हुई हैं।
श्रोता: एक हरिजन बच्ची को गोद नहीं लेने दे रही थी।
आचार्य प्रशांत: एक हरिजन बच्ची को गोद लेने से मना कर रही थी। अड़ गए। बोले, "अगर ये हरिजन बच्ची मेरी बेटी नहीं बन सकती, तो ये आश्रम भी नहीं चलेगा। निकलो सब यहाँ से और मैं भी निकल जाऊँगा।" अगर ये हरिजन लड़की यहाँ नहीं आ सकती, बच्ची थी, तो फिर यहाँ कोई नहीं आ सकता।
ये तो छोड़ो कि बाहर वालों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। अपने ही आश्रम के विरुद्ध भी संघर्ष कर रहे थे। अपनी पत्नी के विरुद्ध भी संघर्ष कर रहे थे। पर जो सही लगा, तो लगा। जो सही है तो है, और नहीं मानोगे मेरी बात तो कुछ नहीं चलने दूँगा। कम से कम मैं उसमें कोऑपरेट नहीं करूँगा। ये बड़ी बात है। ये वेदान्त जैसी बात हो गई है। विथड्रॉ योर कोऑपरेशन, असहयोग, नॉन-कोऑपरेशन, याद है न उनका तरीका, नॉन-कोऑपरेशन मूवमेंट। वो कहते थे, "इतना तो कर सकता हूँ, रोक नहीं सकता। कुछ हो रहा है गलत उसको रोक नहीं सकता तो कम से कम उसको सहयोग देना बंद करूँगा।"
इन बातों का उनको श्रेय नहीं देते हैं। और बहुत रोचक उनकी जीवनी है। अब जो व्हाट्सऐप वग़ैरह में विकृत किया जाता है, कैरिकेचर बनाया जाता है, वो सब हटाओ। वो तो बहुत ही गिरी हुई बातें हैं। उनको देवता आदि भी बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि बहुत विषयों पर उनके विचार अव्यवहारिक हैं, वो ठीक है। कोई बाध्यता नहीं है उन विचारों को स्वीकार करने की बिल्कुल। लेकिन जिस आदमी को जिस बात का श्रेय मिलता है इंसाफ के नाते, उसको उसका श्रेय दिया भी जाना चाहिए। और वो काफ़ी गहरे श्रेय के अधिकारी हैं।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं ये कहना चाहती हूँ अगर उनके सत्य से, यानी आग्रह से अहिंसा आया है, तो बहुत बेहतर है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो अच्छा है, बढ़िया है। देखिए, जो जहाँ पर खड़ा है अगर वो अपनी ही स्थिति के प्रति ईमानदार है तो फिर हमें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। जिसको जो बात ईमानदारी से, बहुत ज़ोर देकर कह रहा हूँ, इस शब्द को रेखांकित करके कह रहा हूँ, ‘ईमानदारी से,’ जिसको जो बात अपनी पूरी ईमानदारी से सही लग रही है, अगर वो उस पर अमल कर रहा है, तो फिर हमें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए।
ठीक है हम कह सकते हैं कि सत्य किसी सिद्धांत से आगे की बात है। ठीक, हम कह सकते हैं कि अहिंसा सिर्फ़ किसी को हानि न पहुँचाने का नाम नहीं है, हम ये कह सकते हैं। लेकिन इससे उनका ये श्रेय नहीं छीनना चाहिए कि उनको जो बात ठीक लगी, उन्हें अहिंसा का जो रूप समझ में आया उन्होंने अंत तक ईमानदारी से उसका पालन किया। और ये बहुत बड़ी बात है।
हमें बहुत बड़ी‑बड़ी बातें पता होंगी। आपको उपनिषदों के महावाक्य पता हैं बहुत अच्छी बात है। आपको गुण-सिद्धांत पता हैं, पालन कर लेते हो? चलो, ये भी मान लिया। गांधी आपसे कम ज्ञानी थे, मान लिया, कम ज्ञानी थे। चलो, ठीक। पर उनको जो भी ठीक लगता था उसको जीते थे, जो भी ठीक लगता था उस पर अड़ते थे। ये है उनकी खासियत। और ये खासियत अक्सर सामने नहीं ली जाती। आग्रह, आग्रह, अड़ना, ज़िद, ज़िद, धृति।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी। बस दो कुछ कहना चाहते हैं। धन्यवाद आचार्य जी, मेरे आप ही सब कुछ हैं। मेरे मम्मी‑पापा नहीं हैं। घर भी कुछ भी, जो कुछ भी हैं वो आप ही हैं। और बहुत अच्छा लग रहा है आपसे मिलकर के। मैं और कुछ नहीं कहना चाहती हूँ, कि बस इतना रहे कि आपके सानिध्य में रहूँ।
जो कुछ भी जान रही हूँ, बहुत बल आया है। और इतने सारे चीज़ें थीं कि अंदर से भ्रांतियाँ थीं। अभी आपने जैसे कि कहा न, कि मांस सामने रखा है और उसको छी बोल रहे हैं तो ये चीज़ मैंने मम्मी को देखा था बचपन में कि बगल में एक लोग ने मुर्गा पाल रखा था। वो घर में आ गया था, तो उन्होंने पूरे घर को पानी से धोया, मतलब गंगाजल डाला। तो इतनी सारी भ्रांतियाँ थीं, और भी बहुत सारी हैं, जो एकदम कट रही हैं, दूर हो रही हैं। और बहुत अच्छा लग रहा है आचार्य जी।
आप ही मेरे सब कुछ हैं। मतलब शारीरिक रूप से कोई नहीं है, लेकिन सब कुछ आप ही हैं। बहुत‑बहुत धन्यवाद आचार्य जी। और मैं अपने आप को टूटने नहीं दूँगी। और मुझे अंदर से, जैसे आप कहते हैं न अगर अंदर से रोना आ रहा है तो रो, लेकिन उसके साथ भी काम करो। कभी खुशी है तो भी ज़्यादा उसमें बह नहीं जाना है, सत्य को याद रखना है। काम करो। तो मैं कोशिश पूरी कर रही हूँ, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: इतना पर्याप्त है। देखिए, आपसे फिर कहूँगा हम मिट्टी के पुतले हैं। किसी तरह के परफेक्शन की न ख़ुद से उम्मीद करिए, न दूसरे से करिए। ईमानदारी काफ़ी है। नहीं आपसे ये अपेक्षा है कि अंतिम ज्ञान, ब्रह्म‑अवस्था को आप उपलब्ध होंगे, कोई ये उम्मीद नहीं कर रहा है। लेकिन इतना ज़रूर चाहता हूँ कि जितना समझ में आया है, कम से कम उससे पीछे मत हटिए, उसको ज़िंदगी बनने दीजिए। बस इतनी‑सी उम्मीद है।