दो महत्वपूर्ण शब्द - कूटस्थ और अन्तर्यामी || आचार्य प्रशांत, वेदान्त पर (2020)

प्रश्नकर्ता: कूटस्थ और अंतर्यामी क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: ध्यान दीजिएगा।
कूटस्थ शब्द जितना सुंदर है, जितना विभूति युक्त है, उतना ही रहस्यमयी भी है। कूट शब्द ही एक-दूसरे से जुड़े हुए कई अर्थ रखता है। कूट का एक अर्थ होता है – आधारभूत, प्रतिष्ठा - वो जिसके ऊपर सब कुछ प्रतिष्ठित या आधारित हो। वो जो मूल हो, वो जो बुनियादी हो, उसको कहते हैं - कूट।
इसके ठीक विपरीत और इससे बिलकुल मिला-जुला अर्थ है कूट का- वो जो उच्चतम हो, जो शीर्षस्थ हो। जैसे जब आप कहते हैं – चित्रकूट, तो उससे आपका आशय होता है पर्वत-शिखर। और कूट का एक अर्थ वो भी होता है कि ऐसी वस्तु जो वैसी न हो जैसी वो बाहर से दिखाई देती हो; ऐसी वस्तु जो बाहर से विशेषकर प्रिय दिखाई देती हो पर भीतर से दोषपूर्ण हो। तो माया को भी कूट कहते हैं।
तो कूटस्थ माने फिर क्या हुआ? कूटस्थ माने हुआ कि ये जो पूरी राशि है - समस्त जगत की, संसार की, ब्रह्मांड की, ये जिस आधार पर खड़ी हुई है, 'सत्य' उसका नाम है। सत्य संसार-रूपी पर्वत-राशि की आधारशिला है। जब कहा जाए कि आत्मा कूटस्थ है, तो इसका मतलब कि ये जो पूरी दुनिया है ये तो मिथ्या है, पर इस दुनिया के आधार में जो सत्य है वो आत्मा है। जगत की राशि मिथ्या है, जगत का आधार आत्मा है; जब इस अर्थ में आत्मा को संबोधित या इंगित करना होता है तो हम कह देते हैं, 'आत्मा कूटस्थ है। '
दूसरी ओर, जब हमें ये कहना होता है कि इस जगत में ये जितनी भी राशि है वो सब इसलिए है ताकि अंततः तुम उसका आरोहण, अतिक्रमण, उल्लंघन करके उसके शीर्ष पर पहुँच जाओ, तो हम कह देते हैं कि सत्य कूटस्थ है, इस अर्थ में कि वो इस जगत का सर्वोच्च लक्ष्य है और शिखर है; ये दूसरी बात।



