
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम अरिहंत है। अभी देश में एक नया ट्रेंड चल रहा है, मतलब था पहले से ही परंतु अभी ये मेनस्ट्रीम में है, वो है डार्क ह्यूमर का। उसमें हम दर्द और आघातों का मज़ाक बनाते हैं। इसमें जानवरों के प्रति क्रूरता, किसी महापुरुषों का अपमान, मृत्यु पर चुटकुला किया जाता है, यहाँ तक कि रेप विक्टिम्स और एसिड अटैक विक्टिम्स पर भी चुटकुले बनाए जाते हैं। और उससे भी गंभीर बात ये होती है कि कई सारे लोग उस पर हँसते भी हैं।
तो आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि कैसे तय किया जाए कि हास्य और संवेदनहीनता, इनके बीच में कितनी महीन रेखा होनी चाहिए? और यहाँ स्वतंत्रता और सीमाओं का कैसे आंकना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो सवाल में झूठ कम बोलना चाहिए कि "कुछ लोग इन पर हँसते हैं।” अगर कुछ ही लोग हँस रहे होते, तो किसी भी स्टैंडअप को या कॉमेडियन को कोई ज़रूरत नहीं थी कि वो डार्क ह्यूमर का ख़तरा उठाता। कुछ ही लोग नहीं हँस रहे हैं सब हँस रहे हैं, क्योंकि सब हँस रहे हैं इसलिए ये जो कुछ भी है, जिसको तुम बोल रहे हो कि भावनाओं और संवेदनाओं पर आघात होता है, वो चल रहा है।
ज़्यादातर लोग हँस रहे हैं, क्यों हँस रहे हैं? क्योंकि जिन चीज़ों को तुम भाव से या संवेदना से जोड़ रहे हो, या पवित्र या सैक्रेड मान रहे हो, वो वास्तव में किसी के लिए पवित्र, सैक्रेड वग़ैरह है ही नहीं, ऊपर-ऊपर से लोग पाखंड कर देते थे। तो जब कोई आकर के उस पाखंड का नक़ाब उतार देता है तो लोग कहते हैं, “चलो, अच्छा हुआ, हँस ही लो इस पर।”
तुम कह रहे हो, रेप विक्टिम्स के बारे में कोई आकर के कैसे डार्क ह्यूमर कर सकता है? रेप विक्टिम्स का मज़ाक तो इस समाज ने बहुत पहले से बना रखा था, जो कॉमेडियन है वो तो आकर के बस जो पहले से मज़ाक चल रहा है, उसको वो शब्द दे देता है।
कोई रेप विक्टिम बता दो, जिसके नाम से पॉर्न साइट्स पर और गूगल पर ट्रेंड ना चला हो। कल को किसी लड़की का नाम कुछ ले लो –एक्स, बलात्कार हो जाए जैसे ही ख़बर आएगी, तुरंत ये सर्च एकदम पीक पर पहुँच जाएगा, "एक्स रेप लाइव वीडियो" या "एमएमएस" या "रिकॉर्डिंग" और समथिंग। जो वो स्टैंडअप है वो तो बस समाज को आइना दिखा रहा है, रेप वग़ैरह को तो तुमने कब से मज़ाक बना रखा है।
और कौन सी बातें बोली रेप के अलावा?
प्रश्नकर्ता: एसिड अटैक विक्टिम्स।
आचार्य प्रशांत: तो एसिड अटैक विक्टिम्स को क्या तुमने बहुत इज़्ज़त दे रखी है। कोई एसिड अटैक विक्टिम हो जाए लोग उसको नौकरी तक देने में कतराते हैं, शादी करना तो दूर की बात रही। समाज जैसा होता है, स्टैंडअप और कॉमेडी उसी को आइने की तरह दिखा रहे हैं।
और क्या बोला?
प्रश्नकर्ता: सर, जैसे महापुरुषों के लिए भी।
आचार्य प्रशांत: तुम किसी को महापुरुष मानते हो? “महापुरुषों का अपमान कर दिया कॉमेडियन ने,” तुम किसी को महापुरुष मानते हो क्या? किसको मानते हो महापुरुष, जिससे तुम्हारा अहंकार जुड़ जाए उसका तुम नारा लगा देते हो, और क्या करते हो।
महापुरुष वास्तव में वो होता है जो बिल्कुल तुम्हारे जैसा नहीं हो और फिर भी तुम उसकी इज़्ज़त कर पाओ। और तुम तो महापुरुष उसी को मानते हो जो तुम्हारे वर्ग का, पंथ का, या समुदाय का प्रतिनिधित्व करता हो। तुम उसी की जयकार कर देते हो और कहते हो, ये मेरे महापुरुष है। महापुरुष हम वास्तव में किसी को नहीं मानते। जो हमारे स्वार्थों के प्रतीक के रूप में खड़ा हो सके, उसको हम कह देते हैं कि हमारे वर्ग का महापुरुष है।
महापुरुषों को तो हमने कब का मज़ाक बना ही रखा है। कॉमेडियन ने आकर के मंच से भी वो मज़ाक कह दिया, तो अब परेशान क्यों हो रहे हो। और अगर तुमने महापुरुषों को और रेप विक्टिम्स को मज़ाक नहीं बना रखा होता, तो कोई कॉमेडियन नहीं आता स्टेज से उनके बारे में मज़ाक करने।
और ये आज की बात नहीं है। हम बच्चे थे, स्कूल में थे, उस समय भी महापुरुषों को छोड़ दो, अवतारों तक को लेकर के छोटे-छोटे बच्चे चुटकुले सुना रहे होते थे। और ऐसे चुटकुले कि जिनको तुम अभी पब्लिक में बोल दो तो फ़साद हो जाए। ये छठी, सातवीं, आठवीं के बच्चे होते थे। और मैं आज की नहीं बात कर रहा हूँ, मैं अस्सी-नब्बे के दशक की बात कर रहा हूँ, तब भी छोटे बच्चे चुटकुले सुना रखे होते थे।
क्यों?
क्योंकि उन्होंने घर में देखा है कि माँ-बाप ही इनको कुछ नहीं मानते, तो इनका मज़ाक ही उड़ा दो। उनके घरों में ऐसा माहौल था कि मीरा हों कि सूरदास हों, दादू हों कि कबीर साहब हों, श्रीकृष्ण हों कि राम हों, वहाँ पर अंदर ही अंदर बच्चे जान जाते थे कि ऊपर-ऊपर का पाखंड है कि इज़्ज़त दी जा रही है, अंदर ही अंदर कोई इज़्ज़त नहीं है। तो बच्चे चुटकुले बना देते थे।
दोहों को, साखियों को लेकर के उनकी पैरोडी बनाई जाती थी, और ऐसी पैरोडी बनाई जाती थी कि जिस संत का वो दोहा है, उसी संत को भारी पड़ जाए। उसी को लाकर के वहाँ पर…। तुमने भी सुनी होंगी, सुनी है कि नहीं सुनी है?
(प्रश्नकर्ता हाँ में सिर हिलाते हुए)।
तो अब क्या पूछने आए हो, कि ये स्टैंडअप आर्टिस्ट ने महापुरुषों का मज़ाक बना दिया। वो तो 30 साल पहले भी बन रहा था, और 30 साल पहले अगर बच्चे बना रहे थे, तो माने उनके माँ-बाप भी वैसे थे, माने और पहले से ये चल रहा है।
जिसको हम लोकधर्म कहते हैं, वो पाखंड के अलावा कुछ नहीं है।
ऊपर-ऊपर से कुछ बोल दो, नीचे-नीचे घर में बच्चे होते हैं, बच्चों में उतना पाखंड नहीं होता उन्हें दिख जाता है कि असलियत क्या है। हाँ, यही बच्चे जब बड़े हो जाएँगे, तो फिर ख़ुद ही ये आउटरेज करेंगे। "अरे, किसी ने हमारे महापुरुष को ऐसा बोल दिया! हम उसकी जान ले लेंगे!" जबकि जब तुम बच्चे थे, तुम ख़ुद ही देखो कैसे भद्दे चुटकुले बना रहे थे इन्हीं महापुरुषों के बारे में।
हम किसी को महापुरुष नहीं मानते, अहंकार स्वयं से बड़ा किसी को नहीं मानता। वो किसी को आराध्य नहीं मानता, वो अधिक से अधिक किसी को प्रतिनिधि मान सकता है। वरना सोच के देखो ना समाज अगर इन बातों को अस्वीकृत कर दे, तो वो जो स्टैंडअप कॉमेडियन है, वो ख़ुद ही पीछे हट जाएगा। समाज ने नहीं अस्वीकृत कर रखा। समाज में इन बातों की डिमांड है। समाज कहता है, “और सुनाओ, मज़े आ रहे हैं।” तो वो सुनाता है वहाँ से।
और कौन लोग मज़े ले रहे होते हैं?
और अब ताज्जुब की और पाखंड की बात सुनो। आधे लोग जो उन्हीं महापुरुषों की यशोगाथा कहते हैं या सुनते हैं, और संतों के भजन करते हैं उन्हीं को तुम जाकर के ये डार्क ह्यूमर सुना दो महापुरुषों पर और संतों पर, तो वो ज़ोर से ठठा करके ताली मार के हँसेंगे। एक ही आदमी दोनों काम कर ले जाएगा। कोई बड़ी बात नहीं है कि वही आदमी जो रेप विक्टिम्स के समर्थन में इधर-उधर जाकर ट्वीट कर रहा हो, किसी मार्च या रैली में भी शामिल हो गया हो वही आदमी रात में जाकर 12–1 बजे फिर पॉर्न पर सर्च कर रहा है कि "ये रेप का वीडियो मिल जाएगा क्या? कहीं सीसीटीवी फुटेज वग़ैरह कुछ हो, थोड़ा रात की खुजली का भी तो देखना पड़ता है।" बिल्कुल ऐसा संभव है। सबसे बड़ा पाखंडी होता है आम आदमी। बाद में बोलना कि नेता पाखंडी होता है या धर्मगुरु पाखंडी होता है,
सबसे बड़ा पाखंडी है आम आदमी। और आम आदमी पाखंडी न हो तो वो अपने नेता क्यों पाखंडी चुनेगा, आम आदमी पाखंडी न हो तो वो क्यों पाखंडी धर्मगुरुओं के दरबार में हाज़िरी लगाएगा।
मैं सेण्ट पॉल्स में था, तो वहाँ क्रिसमस जब आता था तो वो पूरी जो कम्युनिटी थी कॉन्वेंट की, टीचर्स थीं, नंस थीं, सिस्टर्स थीं, फादर भी थे। उनके लिए ये बड़ी बात होती थी, वो क्रिसमस से पहले दो–तीन लड़के पकड़े गए, वो छठी, आठवीं के रहे होंगे या शायद और भी किसी नीचे वाली क्लास के। वो जाकर के टॉयलेट्स में जीसस और मैरी पर लिमरिक्स बना रहे थे, कुछ अभद्र अश्लील लिख रहे थे।
तो किसको बुलाया गया? उनके पेरेंट्स को बुलाया गया। इनके घर में ऐसा माहौल होगा न।
तुम किसी को भी बड़ा मानते कहाँ हो। और यहाँ ये भी मत कह देना कि वो लड़के हिन्दू थे, तो चलो उन्होंने ईसाई धर्म पर कुछ अश्लील टिप्पणी कर दी होगी। ज़्यादातर तो जो हिन्दू बच्चे होते हैं, वो हिन्दू संतों और महापुरुषों पर ही कॉमेडी, पैरोडी सब कर रहे होते हैं। कहाँ से मिल रहा है उन्हें ये सब? ये सब उन्हें परंपरा से ही मिल रहा है।
बच्चों के पेरेंट्स बुलाए गए थे स्कूल, घर में ही हो रहा होगा, परंपरा ही ऐसी है।