डराने वाले को छोड़े बिना डर कैसे छोड़ोगे? || आचार्य प्रशांत (2015)

प्रश्नकर्ता: लोग बोलते हैं, “मैंने साधना की तो तत्व ज्ञान मिला, उससे परम शान्ति प्राप्त हो गयी”। वो कहते हैं कि, "तत्व ज्ञान मिला,” लेकिन आप कह रहे हैं कि मिलता कुछ नहीं है, तो ये भी एक गलत वक्तव्य है कि, "तत्व ज्ञान मिला”? और उसके बाद कहते हैं, "परम शान्ति को मैं प्राप्त हो गया”। मतलब तत्व ज्ञान के पहले 'मैं' जो था, उसी को परम शान्ति मिली है, मतलब – "मैं अभी भी हूँ"। ये तो पूरा-का-पूरा वक्तव्य ही गलत है। पूरा गलत है? कृपया सहायता करें।
आचार्य: (मुस्कुराते हुए) हाँ।
प्र: मैं बहुत बड़ी गलतफहमी में था। इसे हटाना है।
आचार्य: हटाना जिसको है उसको हटाने में बाधा ये है कि तुम उसके साथ बहुत जुड़े हुए हो। उसी को तुमने ‘मैं’ का नाम दे दिया है। अगर ये कहा जाए कि कमरे में गन्दगी है, मान लो तुम किसी कमरे में खड़े हो और उसमें से खूब बदबू उठती है, उस कमरे में खूब बदबू आ रही है और तुम कह रहे हो – "बड़ी बदबू आती है, कैसे साफ़ करें?”
कोई बताए कमरे में गन्दगी है तो तुम्हारे लिए आसान होगा, तुम गन्दगी साफ कर दोगे। पर किसी दिन ऐसा हो गया कि तुमने ईमानदारी से जानना चाहा कि ये बदबू आती क्यों है, और तुम्हें पता चला कि तुम्हीं से आती है, तो बड़ी दिक्कत हो जाती है। क्योंकि अब यदि बदबू हटेगी तो बदबू हटने के बाद जो सफ़ाई है उसका अनुभव लेने वाला अनुभोक्ता भी नहीं बचेगा।
आध्यात्मिक शोधन में साधक की यही मूल अड़चन रहती है कि – जिसकी सफ़ाई करनी है, वो मैं ही हूँ। कचरा मुझसे बाहर नहीं है, मैं स्वयं ही कचरा हूँ। अगर बदबू बाहर कहीं से आ रही हो और तुम हटा दो तो उसके बाद स्वच्छता के आनंद का अनुभव लेने के लिए तुम बच जाओगे। बच जाओगे न? यदि तुमसे बाहर कहीं कचरे से दुर्गन्ध उठती हो तो तुम उस कचरे को हटा सकते हो और फिर तुम शेष रह जाओगे निर्मल हवा का अनुभव करने के लिए।



