दादा-दादी की गज़ब समझदारी || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: मेरा एक बेटा है सोलह साल का, उसको जब हम लोग अध्यात्म की कुछ किताबें देना चाहते हैं — जो हम लोग उस समय नहीं कर पाए, कम-से-कम वो उस समय से शुरू करे — तो हमारे माता-पिता कहते हैं कि अभी तो उम्र इसकी बहुत बाक़ी है, इसे क्यों इस चीज़ में धकेल रहे हो? और हम लोगों के लिए भी यही हो जाता है। उसके समर्थन में यह तर्क देते हैं कि पहले राजा-महाराजा लोग जवानी में राजपाट भोगते थे, उसके बाद वानप्रस्थ को जाते थे।
आचार्य प्रशांत: आप एक काम करिए, जितनी किताबें बाहर हैं वो सारी ले जाइए और अपने पेरेंट्स (माता-पिता) को दीजिए। बोलिए कि 'मेरे बच्चे की तो अभी उम्र नहीं है, आप ही के मुताबिक आपकी तो है। आप ही बता रहे हैं न कि आपका तो लग गया न वानप्रस्थ, आप तो पढ़ो कम-से-कम।' आप पढ़े होते तो आज इस प्रकार की बातें नहीं कर रहे होते। जिन्होंने नहीं पढ़ी होती है गीता, वही कहते हैं कि गीता बुढ़ापे के लिए है।
अर्जुन कितने बूढ़े थे जब उन्हें गीता बतायी गयी, वानप्रस्थ में जा रहे थे? बल्कि वो सही में जाने वाले थे, उनको रोका गया है गीता के माध्यम से। उपनिषदों में जो शिष्य होते हैं वो सब नब्बे-नब्बे साल के होते हैं, मरने को तैयार? और जब बिलकुल बेहोश हैं और आह्ह कर रहे हैं तो उनको आ कर बोला गया 'पूर्णमिद: पूर्णमिदम', अब मर?
अभी झूठे ज्ञान की बात हो रही थी ना, ये है (झूठा ज्ञान) कि 'जब पूरी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाए, एकदम ज़िन्दगी ख़त्म कर लो। मौका मिला था जीने का, जन्म को सार्थक करने का, जब वो मौका बिलकुल गँवा दो और नब्बे के हो जाओ, आँख को दिखाई न दे, हाथ ऐसे-ऐसे काँप रहे हैं। कोई बोले दूसरा अध्याय खोलो, खुल रहा है आठवाँ, तब गीता छूना। जब पता ही न चले कि गीता है कि फीता है कि क्या है, तब कहो कि हाँ हाँ। फिर आधा श्लोक पढ़ो, सो जाओ बीच में, बेहोश हो जाओ।'
कोई दोष भी नहीं देगा। कहेगा एक पाँव इनका कब्र में है इनको क्या बोले कि क्या है क्या नहीं है। फिर तो तुम जो भी बोलो वही ठीक है, 'हाँ, बाबाजी ठीक है। बहुत बढ़िया बताया आपने। कृष्ण कह रहे हैं समोसा जलेबी खाओ, प्रभु के गुण गाओ और स्वर्गलोक जाओ। यही, आप बिलकुल ठीक कह रहे हो, यही तो लिखा है गीता में।'



