देखिए, जो प्रकृति का पूरा खेल चल रहा है न, उसका उद्देश्य मुक्ति नहीं है, उसका उद्देश्य तो यही है कि खेल ही चलता रहे। खेल बस चलता रहे, चलता रहे। हाँ, मुक्ति हो सकती है, पर वो अपवाद स्वरूप होती है। थोड़ा ज़मीनी बात करता हूँ। जैसा आप अपने आप को माहौल देने लग जाते हो, इवोलूशनरी थ्योरी कहती है की आपका शरीर भी उसी तरह का होना शुरू हो जाता है। ये विकासवाद है इवॉल्यूशन का सिद्धांत। आप जैसा अपने आपको माहौल देने लग जाते हो न, आपका शरीर भी उसके अनुकूल होना शुरू हो जाता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा नाम डॉक्टर ज्योत्सना मिश्रा है। मैं गवर्मेंट हॉस्पिटल में ऐज़ अ डॉक्टर पोस्टेड हूँ। आचार्य जी, मैंने हाल ही में एक सेमिनार अटेंड किया था जिसमें कुछ गवरमेंट टीचर्स भी आए थे। वहाँ पर यह डिस्कशन हुआ कि छोटी बच्चियों में यानि आठ से नौ साल की बच्चियों में प्यूबरटी बहुत तेजी से आ रही है।
इसकी वजह से इनके मंथली पीरियड स्टार्ट हो जाते है। और ये बच्चियाँ इतनी छोटी होती है आचार्य जी कि ये अपने कपड़े तो ढंग से पहन नहीं पाती तो ये हर महीने पैड कैसे बदलेंगीं। और कई बच्चियाँ तो इसकी वजह से स्कूल भी मिस करती है। खासकर ग्रामीण इलाकों में तो लड़कियाँ स्कूल से ड्रॉप भी ले लेती है। क्योंकि हर स्कूल में लेडी टीचर्स भी अवेलेबल नहीं होती।
हाल ही में टीवी पर भी ऐड दिखाया गया था जिसमें कक्षा तीन की बच्चियों को डांस करते हुए दिखाया गया था कि पीरिड्स आए है तो हेल्दी है। इसमें कई वजहों पर डिस्कशन हुआ था जिसपे कुछ वजह ये आई थी कि बच्चियों में बढ़ता स्क्रीन टाइम, छोटी बच्चियों में बढ़ते देह भावना की और बच्चियों में जो हम मेकअप प्रोडक्ट्स यूज करते हैं, उसमें जो केमिकल्स होते हैं, उसकी वजह से भी प्यूबर्टी आती है। तो मैं कहना चाहती हूँ आचार्य जी की हम कितना खतरनाक खेल खेल रहे हैं अपनी बच्चियों के साथ। आप इससे कुछ रोशनी डालें।




