आचार्य प्रशांत: भक्ति’ शब्द के मूल में ही विभाजन है। वहाँ पर दो का होना पक्का है। एक 'मैं' और मेरे द्वारा रचा गया पूरा संसार, और दूसरे 'तुम'। जो पहला है इसके केंद्र पर 'मैं' बैठा हूँ, और इसका पूरा संसार मेरा है। संसार में जो भी कुछ मैं पाता हूँ, करता हूँ, जहाँ भी जाता हूँ, वो सब मुझे केंद्र में रखकर के होता है।
और ऐसा है भी। आप अपनी दुनिया को देखें, तो आप कहीं जा रहे हैं यह आपका निर्णय है। आप कहीं दूर जा रहे हों, लेकिन जा तो आप ही रहे हैं। आप किसी दूसरे से मिल रहे होंगे, लेकिन मिलने वाले आप ही हैं। उससे मिलने से आपका केंद्र नहीं मिट गया, न परिवर्तित हो गया।
हाँ, कुछ पढ़ रहे होंगे, पढ़ने वाले आप ही हैं। पढ़ करके आपने अपना ही ज्ञान वर्धन कर लिया। भक्ति का अर्थ है इस संसार को देख लेना और समझ जाना कि यह जो दुनिया है जिसके केंद्र पर मैं बैठा हुआ हूँ, इसमें मुझे चैन मिल नहीं रहा है और चैन चूँकि मिल रहा नहीं है, इससे यह सिद्ध हो जाता है कि चैन जैसा कुछ है ज़रूर। न होता तो उसका अभाव मुझे इतना अखरता क्यों? किसी की कमी अगर इतना सताती हो तो इतना तो पक्का है कि कुछ होगा ज़रूर। जो न हो, उसकी कमी हो ही नहीं सकती।
वो कौन है? वो क्या है? कह नहीं सकते, क्योंकि अगर होता तो दुनिया में मिल जाता, मेरी दुनिया में। मैं उसे खोज निकालता। मेरी ही दुनिया है, चला जाता, खोज निकालता। तो मैं तो जो कुछ कर सकता था मैंने कर लिया अपनी पूरी दुनिया में, वो कहीं मिला नहीं। मुझसे उठते हुए सारे प्रयत्न विफल ही गए।
तब एक दूसरा है जिसके होने को एक आंतरिक प्रमाणिकता मिल जाती है। उस दूसरे को यार कहते हैं, ख़ुदा कहते हैं, गुरु कहते हैं, मुर्शीद कहते हैं, तू कहते हैं, प्रेमी कहते हैं। वो जो दूसरा है, वो उस सबका प्रतीक है जो मेरी दुनिया में नहीं हो सकता। यह भक्ति का आधार है। मैं और मेरी दुनिया अधूरे हैं, कुछ है ख़ास जो इसमें कभी मिलता नहीं, और यह आवश्यक नहीं कि वो न मिले। वो मिलेगा ज़रूर, वो तेरे पास मिलेगा।




