बाबा जी गाड़ी चलाते हैं इक्कीसवीं शताब्दी की, महँगी घड़ियाँ पहनते हैं, फ्लाइट से सफ़र करते हैं। टीवी, सोशल मीडिया — सब मॉडर्न टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कपड़े पहनते हैं पाँचवीं शताब्दी के। ये पाखंड नहीं, खुली धोखाधड़ी है, जो आम भक्तों को समझ नहीं आती, क्योंकि उनके भीतर यह छवि बैठा दी गई है कि ऐसे कपड़े पहनने वाला आदमी धार्मिक होता है। जबकि सच्चा ज्ञानी काल-सापेक्ष कपड़े पहनता है और सामान्य आदमी की तरह सामने आता है। उसके पास उसकी बात होती है — कोई ख़ास प्रतीक या विशेष वस्त्र नहीं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। बहुत लोग मुझसे ऐसे पूछते रहते हैं — रिश्तेदार हो गए, या फ्रेंड्स हो गए, या जो आपको नहीं चाहते, वैसे लोग हो गए — पूछा करते हैं कि, "आप इतने मॉडर्न कपड़े क्यों पहनते हैं? आपके आचार्य जी को ऐसी सब ज़रूरत क्यों है?" ऐसा मुझसे पूछा जाता है।
हालाँकि मैं अपने ओर से ट्राई करती हूँ समझाने का उनको कि "लोगों को तो प्रेज़ेंटेशन ही चाहिए न, तो वही वो कर रहे हैं। आप पुराने वीडियोज़ देखिए, उसमें आचार्य जी का ऐसा नहीं है। वो बहुत सिंपल कपड़े पहनते हैं।" पर उस टाइम का रीच और अभी का रीच — बहुत डिफरेंस आ गया है लोगों में पर वो नहीं समझते हैं।
तो आप मुझे समझाएँ कि मैं क्या बोल सकती हूँ?
आचार्य प्रशांत:




