ये समझना होता है कि past has a way of becoming the present. जो हमारी शरीर और मन की पूरी संरचना है, इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। अगर पास्ट ही प्रेज़ेंट बन रहा है तो फ्रीडम कहाँ है? अतीत की कठपुतली बनने से मुक्त होने के लिए आपको चैतन्य प्रयास करना पड़ेगा। जो लोग वो चैतन्य प्रयास नहीं कर रहे, उन्हें ये दावा करने का कोई हक़ नहीं है कि वो फ़्री लाइफ़ जी रहे हैं। मुक्ति और क्या है? जो भी कीमत देनी पड़े, दो; पर जो स्वभाव नहीं है, उसको बर्दाश्त मत करो।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आचार्य जी, चैप्टर 129, “द पास्ट इज़ द प्रेज़ेंट,” सर इसमें "वन नेवर जस्ट ड्रिफ्ट्स पास्ट द पास्ट। कॉन्शियस एफर्ट्स इज़ नीडेड।" सो सर, कॉन्शियस एफर्ट्स मतलब, इसको थोड़ा मैं डिटेल में जानना चाह रहा था।
आचार्य प्रशांत: जो हमारी पूरी संरचना है न शरीर की, मन की, ये पास्ट से ही बनती है। ये इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है, कॉन्फ़िगर्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। ठीक वैसे जैसे कि आप किसी धूल भरी जगह से निकलो तो आपका शरीर डिज़ाइन्ड नहीं है कि धूल को पीछे छोड़ आए। आप अगर धूल भरी जगह से निकले हो तो शरीर की डिज़ाइन ऐसी है कि वो धूल को अपने साथ आगे ले आएगा, चिपका लेगा धूल को।
इसी तरह आप अगर धुएँ भरी जगह से निकलोगे, तो आपका शरीर इस तरह से संरचित नहीं है कि धुएँ को पीछे छोड़ आए। वो धुएँ को भीतर लेगा, धुएँ को सोख लेगा और वो धुआँ फिर आपका ख़ून बन जाएगा, मांस-मज्जा बन जाएगा, हड्डी बन जाएगा आपकी।




