अतीत की कठपुतली नहीं बनना है

Acharya Prashant

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अतीत की कठपुतली नहीं बनना है
ये समझना होता है कि past has a way of becoming the present. जो हमारी शरीर और मन की पूरी संरचना है, इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। अगर पास्ट ही प्रेज़ेंट बन रहा है तो फ्रीडम कहाँ है? अतीत की कठपुतली बनने से मुक्त होने के लिए आपको चैतन्य प्रयास करना पड़ेगा। जो लोग वो चैतन्य प्रयास नहीं कर रहे, उन्हें ये दावा करने का कोई हक़ नहीं है कि वो फ़्री लाइफ़ जी रहे हैं। मुक्ति और क्या है? जो भी कीमत देनी पड़े, दो; पर जो स्वभाव नहीं है, उसको बर्दाश्त मत करो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आचार्य जी, चैप्टर 129, “द पास्ट इज़ द प्रेज़ेंट,” सर इसमें "वन नेवर जस्ट ड्रिफ्ट्स पास्ट द पास्ट। कॉन्शियस एफर्ट्स इज़ नीडेड।" सो सर, कॉन्शियस एफर्ट्स मतलब, इसको थोड़ा मैं डिटेल में जानना चाह रहा था।

आचार्य प्रशांत: जो हमारी पूरी संरचना है न शरीर की, मन की, ये पास्ट से ही बनती है। ये इस तरह से डिज़ाइन्ड नहीं है, कॉन्फ़िगर्ड नहीं है कि ये पास्ट को पास्ट में छोड़ दे। ठीक वैसे जैसे कि आप किसी धूल भरी जगह से निकलो तो आपका शरीर डिज़ाइन्ड नहीं है कि धूल को पीछे छोड़ आए। आप अगर धूल भरी जगह से निकले हो तो शरीर की डिज़ाइन ऐसी है कि वो धूल को अपने साथ आगे ले आएगा, चिपका लेगा धूल को।

इसी तरह आप अगर धुएँ भरी जगह से निकलोगे, तो आपका शरीर इस तरह से संरचित नहीं है कि धुएँ को पीछे छोड़ आए। वो धुएँ को भीतर लेगा, धुएँ को सोख लेगा और वो धुआँ फिर आपका ख़ून बन जाएगा, मांस-मज्जा बन जाएगा, हड्डी बन जाएगा आपकी।

तो, बाय डिफ़ॉल्ट हम ऐसे हैं कि पास्ट को एक्यूमुलेट करेंगे ही करेंगे, और सिर्फ़ एक्यूमुलेट नहीं करेंगे, उसे आइडेंटिफाई करेंगे। वो धुआँ जो आपका शरीर बन गया, उसको आप बोलोगे, मेरा शरीर। और वो है क्या? पास्ट का धुआँ, जिसको अब आप क्या बोल रहे हो? मेरा शरीर।

इसी तरह अतीत के आपके जो अनुभव हैं सब, और जो आपको संस्कार मिल गए, आप पर प्रभाव पड़ गए, कंडीशनिंग हो गई पूरी, उसको आप ये नहीं बोलते कि वो सब अतीत की बात है। उसको आप बोलते हो, माय आइडेंटिटी, माय करंट आइडेंटिटी। तो सबसे पहले तो ये समझना होता है कि पास्ट हैज़ अ वे ऑफ़ बिकमिंग द प्रेज़ेंट। और नॉर्मली, यूज़ुअली व्हाट यू कॉल एज़ द प्रेज़ेंट इज़ नथिंग बट अ फ्लो फ्रॉम द पास्ट। ये डिफॉल्ट सिचुएशन होती है।

ये एक बार समझ में आ गया तो ये भी समझ में आता है कि इसमें गड़बड़ कितनी है और नुकसान कितना है। क्योंकि अगर पास्ट ही प्रेज़ेंट बन रहा है तो फ्रीडम कहाँ है? पास्ट आप बदल सकते हो क्या? पास्ट आप बदल नहीं सकते, और पास्ट बन गया है प्रेज़ेंट, तो मतलब फिर प्रेज़ेंट को भी बदल नहीं सकते। और जो कुछ भी आप काम कर सकते हो कहाँ कर सकते हो?

प्रश्नकर्ता: प्रेज़ेंट।

आचार्य प्रशांत: तो प्रेज़ेंट को बदल नहीं सकते, काम सब प्रेज़ेंट में हो सकता है। इसका मतलब अब कुछ नहीं कर सकते न। प्रेज़ेंट इज़ द ओन्ली प्लेस व्हेयर यू हैव द चॉइस। और वो चॉइस भी आपने सरेंडर कर दी क्योंकि प्रेज़ेंट अब क्या बना हुआ है, और पास्ट को तो बदल नहीं सकते, तो मतलब प्रेज़ेंट भी नहीं बदल सकते। मतलब कुछ नहीं बचा आपके पास। तो फिर हम क्या हैं? हम ड्रिफ़्ट वुड हैं। हम उड़ती हुई धूल हैं, जिसके हाथ में अपना कुछ नहीं है।

एक टहनी है, वो नदी में बहती हुई चली जा रही है, उसके हाथ में कुछ है क्या? अपना कुछ नहीं है। धूल हवा में उड़ रही है, उसके पास अपना कुछ है क्या? कुछ नहीं है। तो जब ये समझ में आता है, तब आदमी पास्ट को अपने ग़ौर से देखता है—उस पास्ट को जो वर्तमान बनकर बैठ गया है। उसको ग़ौर से देखता है और कहता है, “तुझे झेलना ज़रूरी है क्या? तुझे लिए-लिए फिरना ज़रूरी है क्या?”

और ये करने में लगता है, वो जिसकी आपने बात करी कॉन्शियस एफर्ट। द पास्ट विल नॉट जस्ट शेड अवे ऑन इट्स ओन। ये सोचना नादानी की बात है, दैट द पास्ट रिमेन्स इन द पास्ट, द पास्ट बिकम्स नॉट जस्ट द प्रेज़ेंट बट ऑल्सो द फ्यूचर। क्योंकि फ्यूचर के भी सारे सपने आप कब बना रहे हो?

श्रोता: प्रेज़ेंट में।

आचार्य प्रशांत: फ्यूचर की पूरी योजना, प्लानिंग, ब्लूप्रिंट कब बना रहे हो?

श्रोता: प्रेज़ेंट में।

आचार्य प्रशांत: और प्रेज़ेंट क्या है?

श्रोता: पास्ट।

आचार्य प्रशांत: तो पास्ट है जो फ्यूचर का निर्माण कर रहा है। वो फ्यूचर भी फिर कैसा होगा?

श्रोता: पास्ट जैसा।

आचार्य प्रशांत: और आमतौर पर हमें अपना पास्ट पसंद नहीं होता, और फ्यूचर होगा पास्ट जैसा। इन दोनों बातों को मिला दो तो क्या निकला? फ्यूचर पसंद नहीं आने वाला। किस-किस को ऐसी ज़िंदगी चाहिए जिसमें अभी से पता है कि फ्यूचर पसंद नहीं आने वाला?

ये उठाने वाले थे हाथ फिर। क्रिकेट में अम्पायर कभी-कभी ऐसा करते हैं। बहुत ज़ोर से अपील करो तो उठाते उठाते उठाते, एक तो था उन्होंने ऐसे उठा के नाक में डाल ली थी। नहीं अच्छा किया, ईमानदारी की बात है। यहाँ तक गए पर पूरा नहीं गए, ठीक है। समझ में आ रही है बात ये?

है तो आपको कोई कॉन्शियस एफर्ट नहीं करना पड़ेगा अतीत की कठपुतली बनने के लिए, वो तो आप हो ही। हाँ, उससे मुक्त होने के लिए ज़रूर आपको चैतन्य प्रयास करना पड़ेगा। और जो वो चैतन्य प्रयास नहीं कर रहे, उन्हें ये दावा करने का कोई हक़ नहीं है कि वो फ़्री लाइफ़ जी रहे हैं। फ़्री लाइफ़ जैसा कुछ होता ही नहीं डिफ़ॉल्ट में। हम इस तरह से बनाए नहीं गए हैं, डिज़ाइन नहीं गए हैं कि हम फ्रीडम में जी सकें। फ्रीडम हमारी डिफ़ॉल्ट स्टेट नहीं है।

आपने बहुत बार सुना होगा, मैन इज़ बोर्न फ़्री, बट एवरीव्हेयर ही इज़ इन चेंस। वो बात ग़लत है। वी आर नॉट बोर्न फ़्री एंड वी आर नॉट बोर्न टू बी फ़्री। वी आर बोर्न टू रिमेन शैकल्ड, एंड दैट्स व्हाई फ़्रीडम टेक्स कॉन्शियस एफर्ट। जो लोग वो कॉन्शियस एफर्ट नहीं कर रहे, उनको भले ही अभी अपनी ज़ंजीरें महसूस नहीं हो रहीं, पर वो ये मान लें कि वे हैं ग़ुलाम ही।

सिर्फ़ इसलिए कि आपको आपकी ज़ंजीरें महसूस नहीं होतीं या आप अभ्यस्त हो गए हैं, आदत पड़ गई है—इसका मतलब ये नहीं होता कि ज़ंजीरें हैं नहीं।

इसका मतलब होता है कि ग़ुलामी इतनी गहरी हो गई है कि ज़ंजीरों को हमने अपनी रोज़मर्रा की दुनिया में, आदतों में शामिल कर लिया है। ये भी हो सकता है कि ज़ंजीरों को हमने हो सकता है धार्मिक कुछ माला वग़ैरह बना लिया हो। सोच रहे हो कि ये तो, ये भी हो सकता है हमने उन्हें प्रेम का उपहार बना लिया हो, देखो कंगन है, गहना है। वो हैं ज़ंजीरें और उस पर आपने गोल्डन पेंट कर लिया है, देखो ये तो प्यार की निशानी है, मुझे मिला था।

हम ये याद रख सकते हैं। अगर आपने सोचा, समझा, जागरूक प्रयास नहीं करा है तो डिफ़ॉल्ट स्टेट तो बॉन्डेज़ की ही है। इनवायलेबल लॉ। आप इसमें ये नहीं कह सकते कि नहीं, मैं लकी हूँ, मैं तो बचपन से ही फ़्री हूँ या मेरी सिचुएशन्स ऐसी थीं कि मुझे बॉन्डेज़ वग़ैरह मिली नहीं। कुछ ऐसा कुछ भी नहीं है। नोबडी कैन बी एन एक्सेप्शन।

जैसे हर बच्चा बंधक पैदा होता है और फिर सोशल कंडिशनिंग के द्वारा और ज़्यादा वो ग़ुलाम बनता जाता है, बेड़ियाँ पहनता जाता है। वो सबके साथ होता है। वो सिर्फ़ कुछ अभागे लोगों के साथ नहीं होता। वो हमारी पूरी प्रजाति, पूरी मानवता की नियति है कि ग़ुलाम पैदा होते हैं और जैसे जीवन मिलता है, उसी ग़ुलामी को और गहराने के लिए।

लेकिन ये अनिवार्य नहीं है, ऐसा होता है, ये डिफ़ॉल्ट है, लेकिन अनिवार्य नहीं है। नॉर्म है, लेकिन कंपल्सरी, मैंडेटरी नहीं है। इसमें कोई अपवाद नहीं होता, लेकिन ये इनवायलेबल नहीं है। हाँ, बेड़ियाँ सबको मिलेंगी, लेकिन ये कोई अनिवार्यता नहीं है कि बेड़ियाँ धारण भी करे रहनी हैं, तोड़ी जा सकती हैं।

तो फिर मनुष्य जन्म का ही शायद उद्देश्य यही है कि वो बेड़ियाँ, जो ले पैदा होते हो, और वो बेड़ियाँ जो आगे और ज़्यादा कड़ी, मज़बूत होती जाती हैं, आपकी कलाई को और अपनी गिरफ्त में लेती जाती हैं, उन बेड़ियों को पहचानो और काट दो। भले ही वो बेड़ी कलाई बन चुकी हो अब, तो कलाई को ही काट दो।

मुक्ति और क्या है कि जो भी कीमत देनी पड़े, दो — पर जो स्वभाव नहीं है, उसको बर्दाश्त मत करो। ग़ुलामी प्रकृति हो सकती है, पर मुक्ति स्वभाव है।

और वो कॉन्शियस एफर्ट जो लोग नहीं कर रहे, जो कहते हैं कि नहीं, फिर मैं उनकी बात कर रहा हूँ, क्योंकि हम में से बहुत लोग थोड़ा प्रिविलेज्ड बैकग्राउंड से आते हैं। तो हमें ये लगता है कि नहीं, हमारा तो सब ठीक ही चल रहा है, अच्छे घर में पैदा हुए थे, ऐसा है वैसा है, अच्छी एजुकेशन मिल गई, अच्छा जॉब चल रहा है, पैसा भी है ख़ूब हमारे पास। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। Homo sapiens ही हो न आप, स्पीशीज़ थोड़ी बदल लोगे। क्लास बदल सकते हो, स्पीशीज़ थोड़ी बदल सकते हो। आ रही है बात समझ में?

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य।

प्रश्नकर्ता: अगर अच्छा फील हो रहा है तो इसमें क्या बुरा है?

आचार्य प्रशांत: अब वो वैसे ही है कि जैसे डिज़ीज़ इतनी लेट डिटेक्ट हुई। है न? अभी केरल में एक अमीबा फैला हुआ है, ब्रेन ईटिंग एमोएबिया। मैं उसके बारे में पढ़ रहा था, तो डॉक्टरस बोल रहे हैं कि अर्ली डिटेक्शन इज़ द ओनली सॉल्यूशन। अर्ली डायग्नोसिस हो गया तो बच जाओगे, नहीं तो खुश रहे आओ कि मैं तो बीमार ही नहीं हूँ।

प्रश्नकर्ता: किससे बचेंगे आचार्य जी?

आचार्य प्रशांत: देखिए, ज़रूरी नहीं होता कि हम में इतनी सेल्फ-अवेयरनेस हो कि हम ख़ुद स्वीकार कर पाएँ। स्वीकार भी क्या करें, देख भी पाएँ। देखेंगे तब स्वीकार करेंगे कि भीतर मामला गड़बड़ चल रहा है। पर वो जो भीतर गड़बड़ चल रहा होता है, वो अपने आप को बहुत रूपों में अभिव्यक्त करता है। बस उन रूपों को हम अच्छे-अच्छे, सुंदर-सुंदर, स्वीकार्य नाम दे देते हैं, तो हमें लगता है अच्छा चल रहा है सब।

उदाहरण के लिए इन्सिक्योरिटी, एम्बिशन का नाम ले लेती है। अब बहुत बड़ी बेड़ी है इन्सिक्योरिटी के रूप में। आदमी डरा हुआ है, लेकिन हम उसको स्वीकार नहीं करते कि डर है भीतर और बंधन है भीतर। हम कहते हैं पट्ठा एम्बिशियस है, बहुत आगे निकलेगा, ज़िंदगी में कुछ करके दिखाएगा। और फिर हम कहते हैं मुझे कोई बीमारी नहीं है, मैं तो गो-गेटर हूँ, मैं तो एम्बिशियस हूँ। भाई, ये जो एम्बिशन है, ये इन्सिक्योरिटी है और बहुत बड़ी बीमारी है।

इसी तरीक़े से भीतर दूसरे पर चढ़ बैठने का भाव ख़ूब है, दबोच लूँ, शोषण कर लूँ। हम नहीं कहेंगे कि मैं एक्स्प्लॉइटेटिव हूँ, हम कहेंगे मैं लवर हूँ और सिर्फ़ पज़ेसिव हूँ थोड़ा सा। मानेंगे ही नहीं कि कोई बीमारी चल रही है। कहेंगे आई ऐम मैडली इन लव। मैं बीमार कैसे हो सकता हूँ, प्रेम तो स्वास्थ्य की निशानी होती है न। आपका जो प्रेम है, वो पज़ेसिवनेस और ओनरशिप के अलावा और कुछ है क्या? बताइएगा। और अगर नहीं है तो आप उसको प्रेम का नाम क्यों दे रहे हो?

पर ये जो नामकरण है, इसके पीछे बड़ी-बड़ी बीमारियाँ छुप जाती हैं। आप कोई भी मुझे बीमारी बताइए, मैं आपको बताता हूँ कि उसका अलंकृत नाम, डेकोरेटेड नाम क्या दिया जा सकता है। कोई भी बीमारी बताइए। चलिए, करते हैं, खेलते हैं।

श्रोता: ग्रीड।

आचार्य प्रशांत: प्रोग्रेसिव।

श्रोता: डिप्रेशन।

आचार्य प्रशांत: दीप थिंकर, फिलॉसॉफिकल बेंट ऑफ माइंड।

श्रोता: फ़ियर।

आचार्य प्रशांत: फ़ियर के तो सारे ही नाम हैं। अभी बोला तो इन्सिक्योरिटी, एम्बिशन। आप जितनी भी अच्छी-अच्छी चीज़ें, आप अच्छा, दो-चार अच्छी चीज़ों के नाम बताओ, जिनको आप बोलते हो कि दीज़ आर अप्रीशिएबल ट्रेट्स इन अ पर्सन, उनके नाम बताओ और मैं बताऊँगा कि वो सब की सब फ़ियर हो सकती हैं।

श्रोता: कॉन्फ़िडेंस।

आचार्य प्रशांत: कॉन्फ़िडेंस इज़ फ़ियर। कॉन्फ़िडेंस फ़ियर हो सकता है कि नहीं? आपको अभी मुझसे बात करनी है तो आपको कॉन्फ़िडेंस की शायद ज़रूरत नहीं पड़ रही होगी या पड़ रही है? कुछ नहीं। ऐसे ही बैठे हो आराम से, आप सर हिला रहे हो, कुछ भी आराम से चल रहा है। और आप जब जॉब इंटरव्यू देने जाते हो तो आपको कॉन्फ़िडेंस की ज़रूरत पड़ती है। क्योंकि अभी आप डरे हुए नहीं हो, क्योंकि कुछ भी स्टेक पर नहीं है। पर इंटरव्यू में कुछ स्टेक पर होता है, तो आप कहते हो आई वांट टू फील कॉन्फ़िडेंट। कॉन्फ़िडेंस इज़ फ़ियर। कॉन्फ़िडेंस फ़ियर ही तो है और क्या है।

तो फ़ियर तो जितनी भी हम पॉज़िटिव ट्रेट्स मानते हैं, उन सब से संबंधित होता है। लेकिन दिक़्क़त बस यही है कि उनको हम उनके असली नाम से नहीं पुकारते। असली नाम क्या होता है सीधे-सीधे, ईमानदारी से? फ़ियर। उनको हम कभी कह देंगे सच अ कॉन्फ़िडन्ट पर्सन, सच अन आउटक़ोइंग पर्सन, सच अ डॉमिनन्ट पब्लिक स्पीकर, वेरी इम्प्रेसिव। व्हाट इज़ द नीड टू बी इम्प्रेसिव? व्हाट इज़ द नीड टू कास्ट अ शैडो ऑन अदर्स?

तो बीमार तो हम होते हैं, पर जब बीमारी को तुम अच्छे-अच्छे नाम दे दोगे तो और क्या होगा? ये वैसी सी बात है कि तीन-चार दिन का सड़ा हुआ खाना है, ठीक है? उसको लेकर के और उसमें बढ़िया मसाले का तड़का मार करके, ताकि उसकी बदबू छुप जाए, और उसके ऊपर कुछ गार्निशिंग–वार्निशिंग ख़ूब कर दीजिए और उसको कुछ बढ़िया सा नाम दे दीजिए। क्या? कुछ भी ऐसे ही, कचरा दो प्याज़ा। और कहिए, यहाँ पर सड़ा हुआ क्या है? कुछ भी नहीं। ये तो एक नई रेसिपी है, हम इसमें बड़े पारंगत हो जाते हैं।

ज़िंदगी में जो चीज़ सीधी है, उसको सीधे नहीं बोलेंगे। उसको घुमा-फिरा कर कुछ और बोल देंगे, कुछ भी और बोल देंगे। कोई वायलेंट है तो उसको बोलेंगे नहीं, ये न थोड़ा ऐम्पैथी की ओर से हैंडीकैप्ड है। है तो ये डिफ़ॉल्ट हालत ही देखिए आपकी, मेरी, हम सबकी। क्या करें, प्रकृति ने हमें पैदा ही ऐसा करा है। उस चीज़ को जल्दी एक्नॉलेज करें, ज़्यादा अच्छा है बस।

प्रश्नकर्ता: सर, इसको एक्नॉलेज करने के लिए अवेयरनेस की शायद सबसे पहले ज़रूरत है।

आचार्य प्रशांत: इसको एक्नॉलेज करने के लिए एक ईमान चाहिए, जिसको झूठ पसंद न आए।

प्रश्नकर्ता: और उस ईमान को ढूँढने के लिए शायद थोड़ा फ़्री टाइम।

आचार्य प्रशांत: संगत चाहिए।

प्रश्नकर्ता: संगत सही है या ग़लत, उसको कैसे पहचानेंगे?

आचार्य प्रशांत: अगर भीतर कुछ आपके गड़बड़ बढ़ रहा है, तो संगत ग़लत है। संगत सही है या ग़लत सिर्फ़ उसको पहचाना जा सकता है आपके ऊपर पड़ते प्रभाव से। और कैसे? आप ही कसौटी हैं, यू आर द मेज़र। जो चीज़ आपको और ज़्यादा अँधेरे में और बेईमानी की ओर धकेलती हो, वो आपके लिए अच्छी नहीं है, वो संगति अच्छी नहीं है, चाहे वो किताब की संगत हो, चाहे वो इंसान की, चाहे किसी जगह की, चाहे वर्कप्लेस की, कोई भी संगति।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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