अपना अहंकार मिटाने के लिए सभी के सामने झुक जाया करें? || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ता: क्या सभी के सामने झुक जाने से हमारा अहंकार कटता है?
आचार्य प्रशांत: क्यों झुकोगे सभी के सामने? और सभी के सामने तो तुम झुकते भी नहीं। जब कह रहे हो, 'सभी के सामने’, तो दस, बीस, चालीस, दो-सौ, पाँच-सौ लोगों की बात कर रहे होगे। सभी माने इस दुनिया के आठ-सौ करोड़ लोग तो नहीं।
ये जो लोग बहुत झुकाऊ वृत्ति के होते हैं कि जहाँ देखा वहीं झुक गये, ये झुकते भी क्यों हैं? क्यों झुकते हैं? या तो डर होता है या लालच होता है। या तो डर होता है कि झुकेंगे नहीं तो पिटेंगे या लालच होता है कि झुकेंगे तो कुछ पा जाएँगे, या पुरानी आदत होती है झुकने की। इसी का नाम तो अहम् है।
अहम् का सम्बन्ध घमण्ड इत्यादि से बहुत ज़्यादा नहीं है। अहम् का सम्बन्ध भीतर जो ‘मैं’ बैठा हुआ है, उससे है। वो लचीला हो तो भी अहम् है, वो अकड़ू हो तो भी अहम् है, वो निर्भयता दिखाये, गरजे, तो भी अहम् है; वो चू-चू करे और सिकुड़ जाए तो भी अहम् है। ये कहना कि नहीं, जो सिर्फ़ घमण्डी है, गर्वीला, वही अहंकारी है — ये बहुत बचपने की बात है।
कड़वा कोई बोलता हो तो कह देते हो अहंकारी है। उतनी ही सम्भावना है, बल्कि कभी-कभी ज़्यादा सम्भावना है कि जो मीठा बोलता हो वो महा-अहंकारी हो। पर चूँकि हमने अहंकार को लेकर भी एक अविकसित धारणा बना रखी है, तो इसीलिए मीठा बोलने वाले को हम सोच लेते हैं कि ये तो निरहंकारी है।
कोई कह दे, ‘मैं बहुत बड़ा हूँ’ तो तत्काल कह दोगे, ‘देखो, इसका अहंकार बोल रहा है’। और कोई बोले, ‘नहीं, नहीं, मैं तो कण बराबर हूँ, पैरों की धूल हूँ‘ तो कहोगे, ‘ये आदमी अहंकार से मुक्त लगता है।‘ नहीं, इसमें भी बराबर का अहंकार है, बल्कि इसका ज़्यादा ख़तरनाक अहंकार है।



