श्रोता: सर, जैसे कि माँ हमसे कहती हैं कि तुम्हारे कारण हम अपनी इच्छाएँ पूरी नहीं कर पाए| सर, तो उनकी इच्छा तो यही थी ना कि हम ‘इंजीनियरिंग कॉलेज’ में पढ़ें; तो वो ऐसा क्यों कहती हैं कि हमारे कारण वो अपनी इच्छाएँ नहीं पूरी कर पाए?
वक्ता: बेटा, इच्छाएँ किसी की पूरी नहीं होती हैं| लेकिन हम इतने समझदार भी नहीं होते और इतने ईमानदार भी नहीं होते कि इस सार्वभौम सत्य को देख पाएँ कि इच्छाएँ किसी की पूरी नहीं हुईं| हमे लगता है हमारी इच्छाएँ पूरी हो सकती थी, किसी कारणवश पूरी नहीं हो पायी, कुछ संयोग लग गया, कोई भांजी मार गया, किसी ने अड़ंगा लगा दिया नहीं तो मेरी इच्छाएँ तो पूरी हो ही जाती| “वो तो मुझे राजकुमार मिल ही जाता, पिता जी ने तुम्हारे साथ फंसा दिया|”
हमें फिर कोई चाहिए होता है जिसके सर पर हम अपना सारा कचड़ा डाल दें| किसी ना किसी पर तो आरोप लगाना है ना| ये कैसे मानें कि इच्छाओं का तो स्वभाव ही अपूर्णता है, इच्छा कब किसकी पूरी होती है? इच्छा में फँसना ही पहली बेवकूफी है| इच्छा में फँसना मतलब दुःख को न्योता और फिर जब दुःख होता है तो उस दुःख का ठीकरा हम किसी और के सर फोड़ते हैं|
बात एक व्यक्ति की नहीं है, पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है बेटा| बच्चे पैदा ही क्यों होते हैं? माँ-बाप की कामना से| और फिर माँ-बाप कहते हैं, “तुम्हरे कारण हमारी कामना नहीं पूरी हुई|” तुम्हारी कामना न पूरी हो रही होती तो हम आते कहाँ से? आसमान से टपकते? तुम्हारी कामना का साक्षात प्रमाण तो हम हैं और फिर तुम हमसे कह रहे हो कि तुम्हारे कारण हमारी कामना नही पूरी हुई|
पहले तो तुम हमे जवाब दो? हमे लेने काहे को आए? हमसे पूछा था? कामनाएँ तुम्हारी, अब अस्सी साल तक ढोना हमको है| और ये काम अभिवावक अपने बच्चो के साथ करते हैं, बच्चे अपने बच्चो के साथ करते हैं – श्रंखला चलती रहती है| सब अपनी अधूरी इच्छाएँ, अपनी अगली पीढ़ी पर लाद देते हैं| जैसे कि बच्चे ने ठेका लिया हो तुम्हारी इच्छाएँ पूरी करने का|




