ऐसे हालात में हमारे मुखौटे उतर जाते हैं || आचार्य प्रशांत, कोरोनावायरस पर (2020)

प्रश्रनकर्ता: कल ही एक बड़ी दुखद खबर मैंने पढ़ी, और सोचा था कि आपसे ज़रूर इस विषय में प्रश्न करूँगा।
हम हैं जो क्वारंटाइन (संगरोध) हैं, और सरकार की पूरी ज़िम्मेदारी है कि हमें बचाये इस बिमारी से, और समाज में एक वर्ग है डॉक्टरों का। वो, वो डॉक्टर हैं जो दिन-रात मेहनत करके, इटली में तो पचासी-छियासी वर्ष के रिटायर डॉक्टर भी वापस आ रहे हैं। उनका साक्षात्कार हुआ, उनसे पूछा गया कि आपको डर नहीं लगा, तो उन्होंने कहा कि जब शपथ ली थी, डॉक्टर बना था, तो तभी इस डर को तो पीछे छोड़ दिया था कि हॉस्पिटल में संक्रमण से बीमार हो जाऊॅंगा।
भारत में एक खबर आयी। मैंने इसकी पुष्टि भी करी कि मकान मालिक इत्यादि जो हैं, वो जिनके यहाँ किराये पर चिकित्सक वगैरह रह रहे हैं, नर्सेज रह रहे हैं, उन्हें बेदखल कर रहे हैं इस डर से कि कहीं वो संक्रमण लेकर न आ रहे हों। इसको आप कैसे देखते हैं?
आचार्य प्रशांत: नहीं, जैसे हम हैं, वही काम कर रहे हैं हम। हम ऐसे ही हैं। हम धार्मिक शिक्षा के अभाव में एक विवेकशील सामाजिकता के अभाव में बड़े संकीर्ण और क्षुद्र स्वार्थों से प्रेरित लोग हैं। अब वही चीज़ जब इतने नाटकीय रूप से होती है कि एक डॉक्टर है जो इतने लोगों की जान बचा रहा है, और फिर वो वापस आता है तो पाता है कि उसके मकान मालिक ने उससे कहा, ‘निकल जाओ मेरे घर से, क्योंकि मुझे डर लग रहा है कि तुमसे मुझे संक्रमण लग जाएगा।’ तो फिर ये बात हमको बड़ी हैरत-अंगेज़ लगती है, दुखद लगती है, बल्कि भयावह लगती है। लेकिन ये जो मकान मालिक है वो अचानक ही तो इस तरह का व्यवहार नहीं करने लग गया न, वो व्यक्ति ही ऐसा है। याद रखिएगा, वो व्यक्ति ही ऐसा है। और वो व्यक्ति ऐसा बहुत समय से है। और वो जो ये व्यक्ति है मकान मालिक, ये समाज में एक सम्मानित व्यक्ति है भाई।
तो यही बात नहीं है कि ये मकान मालिक कैसा आदमी है। ये भी तो बात है न कि इस तरह के लोगों को सैकड़ों-हज़ारों लोग आज तक सम्मान कैसे दे रहे थे। वो लोग कैसे हैं। तो बात सिर्फ़ मकान मालिक की नहीं है, बात उस पूरे समाज की है जिसमें ऐसे मकान मालिक बैठे हुए हैं। हम सभी ऐसे ही लोग हैं। बस, हमारा ये जो कुरूप चेहरा है, हमारा ये जो विभत्स और हिंसक व्यक्तित्व है, ये छुपा-छुपा रहता है हमारे मुखौटों के पीछे। जब आपातकाल आता है तो मुखौटे उतर जाते हैं, और उसके पीछे का हमारा जो विकृत चेहरा है, और नुकीले दाॅंत हैं, और पैने पंजे हैं वो फिर सब सामने आ जाते हैं।



