ऐसा इंसान सबको दुख ही देगा, सावधान! || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)

प्रश्नकर्त्ता: सर, ज़िन्दगी में मेरे दुश्मन बहुत रहे हैं। उन्होंने मेरा नुक़सान भी बहुत किया है लेकिन मुझे उनसे कभी बहुत ज़्यादा बुरा नहीं लगा। मुझे ज़िन्दगी में सबसे ज़्यादा जिनसे तकलीफ़ मिली है, जिनसे मुझे सबसे ज़्यादा बुरा लगा है, वो मेरे अपने रहे हैं; कुछ मेरे दोस्त और कुछ वो लोग जिनसे मेरा बहुत दिल का रिश्ता रहा है। मुझे सबसे ज़्यादा तकनीफ़ तो अपनों से ही हुई है, दुश्मन तो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाया आज तक।
मैं आपसे यह जानना चाहता था कि हम कहते हैं कि दूसरों को तकलीफ़ या नुक़सान या चोट नहीं देनी चाहिए। तो हम कहते हैं कि हिंसा नहीं करनी चाहिए। लेकिन हम दूसरों को तो क्या नुक़सान देते हैं, जब सबसे ज़्यादा नुक़सान तो हम अपने को ही देते हैं। तो मुझे आप थोड़ा बताएँगें कि यह हिंसा क्या होती है?
मतलब कि किसी को मार देना या किसी का सामान लूट लेना यही सब हिंसा होती है या हिंसा कुछ और भी हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: ‘हिंसा है क्या?’ पहले समझेंगे। देखो, जब हम मन से सम्बन्धित किसी सूक्ष्म बात को समझते नहीं है तो हम उसके स्थूल प्रतीकों पर मजबूरन आश्रित हो जाते हैं। हिंसा मन की एक अवस्था होती है; पर वो मन की कैसी अवस्था होती है? किस कारण से होती है? कहाँ से उठती है? यह हम नहीं जानते, क्योंकि हम मन को नहीं जानते। मन को जानने को क्या बोलते हैं? आत्मज्ञान। आत्मज्ञान है नहीं तो अहिंसा भी क्या है और हिंसा भी क्या है, हम दोनों को ही जानते नहीं हैं। आत्मज्ञान मतलब जो भीतर तुम्हारे सूक्ष्म घटनाएँ घटती रहती हैं, उनका अवलोकन करना; माने उनको देखना और उनके स्रोत तक पहुँचने की कोशिश करना। ठीक है? यह होता है आत्मज्ञान।
तो यह हिंसा-अहिंसा हैं तो अंदरूनी ही चीज़ें; मन की हैं, इनका पता वास्तव में हमें आत्मज्ञान से ही चल सकता है। आत्मज्ञान हमको है नहीं तो हिंसा की परिभाषा के लिए हमको मजबूरन आश्रित हो जाना पड़ता है स्थूल गतिविधियों पर।



