
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम कैलाश है। मैं एक मास्टर स्टूडेंट हूँ कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट में आई.आई.टी. दिल्ली के। मुझे आपका व्यू जानना है रिगार्डिंग हम देख रहे हैं कि फ़िलॉसॉफ़र्स और डीप थिंकर्स आज के सोसाइटी में काफ़ी डिक्लाइन कर गए हैं एज़ कंपेयर टू पहले के समय में।
इसका मेन रीजन क्या है? कि मतलब सोसाइटी के कल्चरल चेंज के वजह से? या फिर आजकल के हमारे मॉडर्न एजुकेशन या फिर डिसिप्लिन शिफ्ट के वजह से? या फिर लैक ऑफ कॉन्शियसनेस और अवेयरनेस की वजह से? ऐसा क्या है?
आचार्य प्रशांत: देखो सारी फिलॉसफी और डीप थॉट, इक्विवेलेंट टू विज़डम, वो उठता है दुख की समस्या से और जितनी भी समस्याएँ होती हैं, उनको ही दुख बोल सकते हो। तो दुख अनुभव होगा तब ना दर्शन आगे बढ़ेगा, कोई समस्या दिखाई देगी तब ना व्यक्ति विचार करेगा।
थॉट क्या होता है? उसकी डेफ़िनिशन ही यही है, प्रॉब्लम सॉल्विंग मेकॅनिज़्म। कोई प्रॉब्लम होती है तो थॉट ट्रिगर होता है, "क्या करना है? क्या करना है?"
अगर हम अपनी ही चालाकी से दुनिया ऐसी बना दें कि दुख छुप जाए तो बताओ, अब दर्शन और विचार की ज़रूरत क्या बचेगी। अगर हम अपने साथ चालाकी खेल लें, दुख मिटा नहीं दिया है दुख को ढाँक दिया है। छुपा हुआ, ढका हुआ दुख है तो दर्शन और विचार की अब ज़रूरत क्या बचेगी।
अगर आप शॉपिंग कर सकते हैं तो आप थिंकिंग क्यों करेंगे? बोलिए कितने लोग हैं यहाँ पर, आपसे कहा जाए अगले तीन घंटे थिंकिंग करने को मिलेंगे, हाउ एक्साइटिंग? कुछ नहीं। अगले तीन घंटे बेहिसाब शॉपिंग! तो जब शॉपिंग माने भोगने के कंज़्यूमरिज़्म के इतने दरवाज़े खुल गए हैं तो कोई बैठ के विचार क्यों करे, जो उपभोक्ता बन सकता है वो विचारक क्यों बने।
और दर्शन माने क्या होता है? फ़िलॉसफ़ी माने, लव ऑफ द ट्रुथ। अगर फॉल्सनेस बहुत प्लेज़रेबल बना दी गई हो, सुखदायक बना दी गई हो, झूठों को बहुत रसीला बना दिया गया हो, तो फिर सच की कोई तलाश क्यों करें। क्यों करें?
हमारा जो काल चल रहा है न, ये आत्म-प्रवंचना का काल है, सेल्फ-डिसेप्शन का। हालत हमारी उतनी ही ख़राब है जितनी बुद्ध के समय में लोगों की ख़राब थी कि वे बोले, "जीवन दुख है। सर्वं दुखम्।" आज भीतर से हम उतनी ही ख़राब हालत में हैं, "जीवन दुख है।" यहीं से पूरा बुद्ध का दर्शन निकला, “हाँ, जीवन दुख है” दिखा उन्हें साफ़-साफ़।
जीवन आज भी दुख है, पर जैसा हमने कहा ढका हुआ दुख है, उस दुख के ऊपर नेटफ्लिक्स आ गया है, सोशल मीडिया आ गया है। बताओ, क्या चाहिए? दुख बढ़ गया है तो वीकेंड की छुट्टी है, गाड़ी है, एक्सप्रेसवे है कहीं चले जाओ थोड़ा मौज मार के आ जाओ।
जीवन दुख है, एकदम ऑफ़िस में पिटी हुई हालत है शाम को जाकर कहीं बार में बैठ गए थोड़ी देर। जीवन दुख है, जवान हो कहीं चले गए कुछ बतिया लिया किसी से, दोस्त-यार के साथ मस्ती कर ली। शादीशुदा हो नहीं हो कहीं सेक्स कर आए, दुख भूल जा रहा है।
ये हमारे सारे जो मनोरंजन के साधन हैं ये वास्तव में दुख को ढँकने के साधन हैं, और जब दुख ढँक दिया जाता है तो वो ढँकने से और गहरा हो जाता है।
जिस चीज़ को ढक दो ना, जैसे कोई सड़ी चीज़ है उसको ढक दो ताकि उसकी सड़ांध दिखाई न दे और बदबू फैले नहीं, तो नीचे जो चीज़ सड़ी हुई थी वो और क्या होगी? और सड़ेगी। ये हालत हमने अपनी कर ली है, हम अपने आप को झूठे सुख में ला चुके हैं। हम हमेशा से ऐसे ही थे वृत्ति से पर पहले हमारे पास इतने आर्थिक और तकनीकी साधन उपलब्ध नहीं थे, कि हम अपने दुख को सफलतापूर्वक ढक पाए। अब हम सफल हो गए हैं आत्म-प्रवंचना में, दुख को छुपाने में स्वयं से ही।
संत कबीर का बहुत सुंदर, "झूठे सुख को सुख कहे" ये तब भी हो रहा था। आज से पाँच-सात सौ साल पहले भी यही हो रहा था, "झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।" मोद माने मौज, प्रसन्नता, आमोद। "झूठे सुख को सुख कहे," हमारे लिए कहा था उन्होंने कि ये दुनिया वाले ऐसे हैं कि झूठे सुख को ही सुख मान रहे हैं, माने दुख है पर मान रहे हैं कि यही सुख है।
चेहरा बदल दिया है नक़ाब लगा दिया है दुख के ऊपर सुख का, जैसे दुख है और यहाँ (माथे की ओर इंगित करते हुए) पर उसने क्या खोद लिया है? — सुख। "जगत चबैना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद।”
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद। जगत चबैना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद।।
हो तुम मौत की गोद में, मौत माने यही नहीं कि जो आप मर के गिर जाते हो ज़मीन पर, मौत माने उम्मीदों का टूटना। जो आप आशाएँ लेकर के बैठे थे उनका मरना, यही सब मौत है। तमाम तरीक़े की हार, तमाम तरह की घुटन और टूटन यही सब मौत है। तो दिन-रात तुम मौत की गोद में हो, मौत तुम्हें चबा रही है, “जगत चबैना काल का।” और तुम में से कुछ-कुछ लोग हो जो काल के मुँह में हो, कुछ पॉपकॉर्न की तरह गोद में पड़े हुए हो। जब पॉपकॉर्न खाते हो ना, कुछ मुँह में जाता है कुछ गोद में गिर जाता है, तो ये तुम्हारी हालत है।
लेकिन मौज पूरी मना रहे हो।
क्या हालत है?
कि यमराज तुम्हें लेके बैठे हैं एक बड़ा वाला टब है पॉपकॉर्न का, जैसे ये ऑडिटोरियम है इसको एक टब मानो, और अब कल्पना करो कि यह जो पूरा है वो यमराज की गोद में है वो उठा रहे हैं, कुछ सीधे उनके मुँह में जा रहे हैं, कुछ टपक जा रहे हैं नीचे, उनको भी बाद में मुँह में डाल लिया जाएगा। बोल रहे हैं, और ये सब क्या कर रहे हैं? पार्टी। ये कह रहे हैं, "इट्स अ टाइम टू डिस्को।"
सोचो पॉपकॉर्न डिस्को कर रहे हैं सब, वो जो तुम्हारे टब में पॉपकॉर्न होते हैं ऐसे जा रहे हैं वो डिस्को करते हुए जा रहे हैं अंदर। ये हमारी हालत है।
काश कि हम जितना सफल हुए हैं दुख को छुपाने में, उतने ही सफल हो पाते दुख को मिटाने में। छुपाने से दुख मिटता नहीं है, दुख और बढ़ गया है। भीतर ही भीतर मानसिक रूप से हम और ज़्यादा पागल हो गए हैं। दुनिया आज जितनी विक्षिप्त है उतनी कभी नहीं थी, न्यूरोसिस के गिरफ्त में जितने हम आज हैं उतने कभी भी नहीं थे। हमारे जो स्ट्रेस और एंग्ज़ायटी लेवल्स हैं जितने आज हैं, उतने तो सेकंड वर्ल्ड वॉर के सोल्जर्स में नहीं होते थे।
हम इस वक़्त इतने ज़्यादा तनाव में हैं जो आम आदमी है, वो इतने तनाव में जी रहा है। क्यों? क्योंकि हमने अपने दुख को छुपा दिया है, अंडरग्राउंड कर दिया है। और जब दुख अंडरग्राउंड कर दिया है, तो दुख को मिटाने वाली चीज़ अब पैदा ही नहीं हो रही।
दुख को मिटाने वाली चीज़ वो होती है जिसका तुमने सवाल पूछा — दर्शन और विचार।
दर्शन और विचार होते हैं जो दुख को सचमुच मिटाते हैं, पर वो दुख को तब मिटाएँगे ना जब दुख प्रत्यक्ष तो आए। दुख प्रत्यक्ष हम अब आने नहीं देते। हमें चोट लगी, धोखा हुआ, पता नहीं क्या अरमान बाँध के बैठे थे सब बिखर गया। “टीवी ऑन कर दो।” टीवी ऑन कर दो मौज आ गई, सो जाओ। कोई भी किसी भी तरह का नशा कर लो, वीकेंड, इतनी सारी थ्रिल्स, एडवेंचर्स होते हैं कुछ भी कर डालो।
कुछ और नहीं तो किसी दोस्त को फोन लगाकर गॉसिप कर लो, ये भी नशा है। नशा माने वो जो तुम्हें सच्चाई से दूर ले जाए, जो यथार्थ से दूर कल्पना में ले जाए उसे नशा बोलते हैं। तुम्हारी असली समस्या कुछ और है, उससे मुँह चुराकर के दोस्त को फोन लगाकर बात कर रहे हो। अब कहाँ से विचार आएगा? कहाँ से दर्शन आएगा?
हमारे पास कन्ज़म्प्शन के लिए ऑब्जेक्ट्स बहुत बढ़ गए हैं, टेक्नोलॉजी हमें वहाँ ले आई है। सिर्फ़ 50 साल पीछे भी चले जाओ तो कन्ज़म्प्शन के इतने ऑब्जेक्ट्स अवेलेबल नहीं थे। पहले एक शॉप होती थी वहाँ आप शर्ट ख़रीदने जाते थे, उसके पास कुछ एक सीमित सामग्री होती थी, माल होता था, रेंज होती थी वो दिखा देता था। फिर कई शॉप्स बनीं, अब मॉल है और कई मॉल्स हैं और फिर उससे आगे आज क्या आ गया? — ऑनलाइन। अब तो दुनिया भर में कहीं भी जितने भी तरीक़े की कोई भी शर्ट होंगी, सब अवेलेबल हैं।
इतने ऑब्जेक्ट्स हैं दिल बहलाने को, इतने ऑब्जेक्ट्स हैं कि आदमी बहुत सफलता से अपने दुख को छुपा सकता है। तीन घंटे तक तुम ऐसे स्क्रॉल करते-करते सिर्फ़ एक शर्ट खोज सकते हो। बोलो, कोई समस्या?
ज़िंदगी में कोई तुम्हारे था वो तुम्हें छोड़ के चला गया, तो तुम इंस्टाग्राम स्क्रॉल कर सकते हो। और उसको पता चल गया कि तुम वहाँ लड़की खोज रहे हो तो लड़की-लड़की दिखाएगा, वही टिंडर वग़ैरह होता है। ज़िंदगी में भले ही तुम्हें कोई घास न डालता हो पर यहाँ जो तुम चाहोगे बढ़िया से बढ़िया चमकदार चेहरा तुम्हारे सामने है, तो तुम्हें ये महसूस ही नहीं होगा कि तुम बिल्कुल नाक़ाबिल आदमी हो।
कुछ नहीं हैं एकदम, "मेरा भी ठीक है, मेरा भी ठीक है।" भले ही तुम टाट के झोपड़े में बैठे हो पर यहाँ तुम देख रहे हो आलीशान सब कुछ। “वाह! वाह!” तो उसमें मुँह डाले रहते हो।
प्रश्नकर्ता: सपोज, एज यू टोल्ड कि इल्युज़न, इसी इल्युज़न और एस्केपिज़्म की वजह से हमारी सोसाइटी अभी है। सर, ये तो मतलब ग्रेजुअली और इंक्रीज़ करता जाएगा आगे के समय, और अगर फ़िलॉसॉफ़र्स ऐसे ही डिक्लाइन करते जाएँगे इन फ्यूचर अगर आप जैसे कोई मिले भी नहीं तो सोसाइटी तो पूरी डायरेक्शनलेस हो जाएगी। वो तो और कैटस्ट्रॉफ़िक कंडीशन हो जाएगा।
आचार्य प्रशांत: हाँ तो मैं मिल गया हूँ, तो मेरे साथ क्या कर रहे हो?
प्रश्नकर्ता: सर, एटलीस्ट वी आर इन अ बेटर स्टेट राइट नाउ।
आचार्य प्रशांत: मैंने सामने खाने की प्लेट रखी है और कह रहे हैं, इन फ्यूचर अगर खाना नहीं मिला तो? अभी भूख लगी है तो खा लो ना पहले, फ्यूचर की देखेंगे। फ्यूचर का फिलॉसफ़र चाहिए और सामने कोई खड़ा हो के कुछ समझाना चाह रहा है तो तुमने उसकी कितनी क़दर कर ली है?
उसकी क़दर कर लो तो क्या पता फ्यूचर के फिलॉसफ़र तुम ही बन जाओ।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू सर।