हो तुम मौत की गोद में, मौत माने यही नहीं कि जो आप मर के गिर जाते हो ज़मीन पर, मौत माने उम्मीदों का टूटना। जो आप आशाएँ लेकर के बैठे थे उनका मरना, यही सब मौत है। तमाम तरीक़े की हार, तमाम तरह की घुटन और टूटन यही सब मौत है। तो दिन-रात तुम मौत की गोद में हो, मौत तुम्हें चबा रही है, “जगत चबैना काल का।” और तुम में से कुछ-कुछ लोग हो जो काल के मुँह में हो, कुछ पॉपकॉर्न की तरह गोद में पड़े हुए हो। जब पॉपकॉर्न खाते हो ना, कुछ मुँह में जाता है कुछ गोद में गिर जाता है, तो ये तुम्हारी हालत है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम कैलाश है। मैं एक मास्टर स्टूडेंट हूँ कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट में आई.आई.टी. दिल्ली के। मुझे आपका व्यू जानना है रिगार्डिंग हम देख रहे हैं कि फ़िलॉसॉफ़र्स और डीप थिंकर्स आज के सोसाइटी में काफ़ी डिक्लाइन कर गए हैं एज़ कंपेयर टू पहले के समय में।
इसका मेन रीजन क्या है? कि मतलब सोसाइटी के कल्चरल चेंज के वजह से? या फिर आजकल के हमारे मॉडर्न एजुकेशन या फिर डिसिप्लिन शिफ्ट के वजह से? या फिर लैक ऑफ कॉन्शियसनेस और अवेयरनेस की वजह से? ऐसा क्या है?
आचार्य प्रशांत: देखो सारी फिलॉसफी और डीप थॉट, इक्विवेलेंट टू विज़डम,




