आत्मा माने क्या? शुद्ध धर्म कैसा? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि भगवान महावीर आत्मा को मानते हैं और भगवान बुद्ध आत्मा को अस्वीकार करते हैं। एक आत्मा को सत्य बोलते हैं और एक असत्य बताते हैं तो इन दोनों के बीच में अंतर क्या है?
आचार्य: जब कोई बात हमको बताई जाती है तो बताने में शब्द लगते हैं, और जो बताया गया है वह एक सिद्धांत बन जाता है। 'आत्मा' शब्द का दुरुपयोग आज ही नहीं हो रहा है, वह उसी दिन से शुरु हो गया था जिस दिन कहा गया था- 'आत्मा'।
जैसे आज आप 'हृदय' शब्द का दुरुपयोग करते हो, 'ब्रह्म' का दुरुपयोग करते हो वैसे ही 'आत्मा' शब्द का दुरुपयोग उपनिषदों के तत्काल बाद शुरू हो गया था। लोगों ने अपने ही किसी विचार को 'आत्मा' कहना शुरू कर दिया, किसी ने मन को ही आत्मा कहना शुरू कर दिया। और झूठ याद रखिए हमेशा ज़्यादा तेजी से फैलता है क्योंकि ज़्यादा सुविधाजनक होता है। झूठ हमें उखाड़ नहीं फेंकना चाहता क्योंकि हम झूठ ही हैं, तो झूठ के साथ हमें ज़्यादा आराम से तालमेल बैठाने की सुविधा हो जाती है।
'आत्मा' जो वास्तव में है, वह बहुत असुविधाजनक है, कष्ट देती है, तोड़ देती है। और 'आत्मा' शब्द का जो विकृत अर्थ प्रचलित है, वह बहुत आरामदेह है। उसमें सुकून मिल जाता है और वह बिकता भी ज़्यादा आसानी से है। तो उसको बेचकर के, उसकी बात करके फ़ायदे भी खूब हो जाते हैं।
आदमी का मन जैसा आज है, वैसा ही पाँच हज़ार साल पहले भी था। तो जैसे आज 'आत्मा' को विकृत किया गया वैसे ही तब भी किया गया। वह सबकुछ जो आत्मा नहीं है, उसे कह दिया गया आत्मा-आत्मा-आत्मा। लोगों ने, विशेषकर जो पुरोहित वर्ग था, ब्राह्मण वर्ग था उसने अपने नियस्थ स्वार्थों की ख़ातिर तमाम तरह के अनर्गल अर्थ, अनर्थ खड़े कर दिए। वैदिक धर्म महात्मा बुद्ध के समय तक आते-आते—और बहुत अभी समय बीता नहीं था। जो बिलकुल प्राचीनतम उपनिषद् हैं, उनमें और महात्मा बुद्ध में मुश्किल से तीन-चार सौ साल का अंतर है। कई उपनिषद् तो बुद्ध के काल के बाद लिखे गए हैं। और बुद्ध और भगवान महावीर समकालीन थे, लगभग एकसाथ के ही थे, तीस-चालीस साल का उनमें अंतर था। महावीर, बुद्ध से लगभग तीस-चालीस वर्ष उम्र में बड़े थे। लेकिन उन तीन-चार सौ साल में ही—उपनिषदों का बिलकुल समझ लीजिए जैसे गुड़-गोबर कर दिया गया। क्या सिखा रहे थे वेद, उपनिषदों के माध्यम से और क्या व्यवहार में लाया जाने लगा। बलि दी जा रही है, कर्मकांड चल रहे हैं, जात-पात आगे बढ़ने लग गई, हिंसा फैल रही है, अनाचार हो रहा है। और यह सबकुछ क्या कहकर हो रहा है कि यह तो साहब वेदों में लिखा है।






