प्रश्नकर्ता आचार्य जी, ध्यान साधना करता हूँ, कुछ समय के बाद ध्यान टूट जाता है। क्या करूँ कि ध्यान बना रहे?
आचार्य प्रशांत: यह क्रम कौनसा है पहले तो यह बताओ, जिसमें दो घंटे साधना है और बाईस घंटे संसार है। क्रम बना हो तो न टूटेगा। तुमने कौनसी नदी की धारा देखी है जहाँ दो कदम पानी होता है और बाईस कदम सूखा? तुमने कौनसी डोर देखी है जो दो अंगुल साबुत होती है और बाईस अंगुल टूटी होती है? इसको तुम क्रम बोलोगे? इसको तुम श्रंखला बोलोगे क्या? बेटा, यह टूट ही इसीलिए रहा है क्योंकि यह कभी बंधा ही नहीं सिलसिला। बंध गया होता तो न टूटता।
यह दिन की दो घंटे वाली साधना से सावधान रहना। यह टूटेगी ही टूटेगी और टूटेगी इसीलिए क्योंकि यह कभी बंधी ही नहीं। जिस दिन तुम साधना कर भी रहे हो उस दिन भी तुमने कितनी करी? दो घंटा; बाईस घंटे बाहर के काम। कितने मज़े में बोला, "बाईस घंटे तो बाहर के काम करेंगे न!"
एक तरफ़ है दो, दूसरी तरफ़ है दो-दो (बाईस) — और यह है साधना। साधना तो है, पर यह संसार की साधना है क्योंकि बाईस घंटे तो उधर दिए हैं। मैं दो घंटे तुमको दूँ और बाईस घंटे इनको दूँ, तो मुझे प्रेम किससे है? जल्दी बताओ!
प्र: इनसे है।
आचार्य: और ग्यारह गुना प्रेम है इनसे। और फिर मैं कह रहा हूँ कि मैं साधना तुम्हारी कर रहा हूँ तो मैं झूठ बोल रहा हूँ न! झूठ बोला कि नहीं बोला?



