
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, जिज्ञासा के बारे में आज बात हुई कि विषय के प्रति जिज्ञासा, विज्ञान और विषय और विषयता, दोनों के प्रति जिज्ञासा हो — अध्यात्म। तो सर, जैसे वैज्ञानिकों के बारे में सोच के, जब हम पढ़ते हैं विज्ञान को, जब चीज़ें समझते हैं तो मैं अपना कम्पैरिज़न करता हूँ उनके साथ।
तो ये जितना ज़्यादा और समझो, जैसे एक आइंस्टाइन का ही रिलेटिविटी का एक एग्ज़ाम्पल लो — तो ये स्पष्ट हो जाता है कि जितनी जिज्ञासा की इंटेंसिटी उनमें थी, मेरे में तो उनके कम्पैरिज़न में कुछ भी नहीं है। ये आइंस्टाइन के एग्ज़ाम्पल ले रहे हैं। किसी छोटे से जिसने छोटी-सी भी डिस्कवरी की है कोई अगर उनके बारे में भी पढ़ूँ, तो भी कंपैरिजन होता है कि हाँ, मेरी क्यूरियोसिटी कुछ भी नहीं है उनके सामने। जबकि मैंने एक बहुत बड़ा अपना जीवन का हिस्सा विज्ञान को समझने में दिया है।
और सर, एक बार आप भी डिस्कस कर रहे थे कि आइंस्टाइन भी द्वैतवादी ही थे। तो सर, दूसरी तरफ़ ये देखते हैं कि मैं ही अपने ऊपर प्रश्न उठा पा रहा हूँ। लेकिन बहुत सारे अच्छे से अच्छे वैज्ञानिक भी प्रश्न नहीं उठा पाते अपने ऊपर। और जैसे, अपने ऊपर प्रश्न उठाना भी एक तरह से — चाहे हम बाहर से कुछ भी सुन लूँ मैं लेकिन जो भी थोड़ा-सा अपना भ्रम तोड़ा है, वो एक तरह से अपनी ही इंडिपेंडेंट डिस्कवरी ही है एक तरह से। ऐसा लगता है, कि वो बाहर से नहीं मिल सकती। वो एक तरह से हम वैसे ही जा रहे हैं जैसे कोई ब्रेकथ्रू एक वैज्ञानिक कर रहा है — बाहर की तरफ़, अननोन फ़ील्ड में।
तो सर, एक कंपैरिजन ये भी होता है कि जैसे अब आप गीता समझा रहे हो — तो अब अध्यात्म में भी मेरी जो ये क्यूरियोसिटी है, वो आपके कम्पैरिज़न में कुछ भी नहीं है। लेकिन अगर आपसे कम्पैरिज़न करूँ तो विज्ञान के क्षेत्र में सर, आपने भी कोई ब्रेकथ्रू नहीं किया।
तो ये जिज्ञासा — आप एग्ज़ाम्पल भी देते हो सर, लेकिन वो ब्रेकथ्रू में नहीं आएगा। तो ये जिज्ञासा, विषय और विषयता की, दोनों की एक साथ करनी इतनी मुश्किल क्यों पड़ती है? उनको भी, जो मतलब स्पेस और टाइम को भी तब देख पा रहे हैं, जब वो वेरिफ़ायबल भी नहीं है उस टाइम पर।
आचार्य प्रशांत: देखो ये जो दो होते हैं ना, इनमें से एक है जो दूसरे द्वारा प्रक्षेपित है। तो उस दिशा में आप निकलेंगे — बाहर की विज्ञान की, तो वहाँ पर आप जितनी डायवर्सिटीज़ हैं, उनको समझेंगे। बहुत कुछ है, आप वहाँ करते रहेंगे। और एक के बाद एक करके वहाँ परत दर परत राज़ खुलते रहेंगे। वहाँ से वो बिंदु आना, जहाँ से आप पलट करके विषयता की ओर मुड़ें, उसमें बहुत समय लगता है। फिज़िक्स अब वहाँ पहुँच रही है।
लेकिन उसके बनिस्बत जब आप यहाँ (ख़ुद ओर इंगित करते हुए) से शुरू करते हैं, स्वयं को जानने से, तो ये ज़्यादा आसानी से स्पष्ट हो जाता है कि वो इससे निकला है। ये दो हैं, पर इन दोनों में सिमेट्री नहीं है। ये (ख़ुद ओर इंगित करते हुए) उससे नहीं आता। जिज्ञासा करने वाला इधर है न? माने, जो चेतन है, वो इधर है। वो (बाहर की ओर इंगित करते हुए) इससे आता है।
तो जो इधर है, इसके लिए ज़्यादा आसान हो जाता है उसको जान लेना। आप जैसे अष्टावक्र गीता में जाते हैं — तो बार-बार ऋषि अष्टावक्र संसार की बात करते हैं ना, कि "मैं सागर हूँ जिसमें संसार का जो पोत है, वो अपना ऊपर-नीचे होता रहता है।" कई बार वो कहते हैं, "मैं सागर हूँ और प्रकृति की सारी जो विविधताएँ हैं, वो मेरे बुलबुले हैं।" जो इधर गया है, वो उधर की बात कितनी आसानी से कर लेता है। पर आप किसी वैज्ञानिक को नहीं पाएँगे जो उधर गया है और सेल्फ की बात करने लग गया।
क्योंकि उधर से इधर का रास्ता आसानी से नहीं आता। हालाँकि आएगा। वहाँ पर भी आपको अगर आख़िरी बात तक पहुँचना है, तो आपको ऑब्ज़र्वर की ओर मुड़ना पड़ेगा। उसमें देर लगती है। यहाँ (ख़ुद ओर इंगित करते हुए) पर वो बहुत आसानी से हो जाता है। इसीलिए आत्मज्ञान जब हम कहते हैं, तो आत्मज्ञान में संसार अपने आप शामिल हो जाता है।
हम कहते हैं ना, "दुनिया को जाने बिना ख़ुद को नहीं जाना जा सकता।” जो ख़ुद को जानने लग गया, “यथा पिंड तथा ब्रह्मांड।” ये सब बोलते हैं ना हम? तो ये इसमें एक-एक चीज़ बेमेल है, असिमेट्रिकल है। जो भीतर की ओर जाता है, उसकी बाहर की ओर टुकड़े-टुकड़े-टुकड़े करके जानने की जिज्ञासा नहीं रहती है। वो बाहर को एक मोनोलिथ के रूप में जानना शुरू कर देता है — कि ये सब कुछ यहाँ से उद्भूत हुआ, एक प्रक्षेपण है।
तो आप अष्टावक्र से आकर के कहेंगे कि "लॉज़ बता दो" उस तरीक़े से जैसे फिज़िक्स उनका वर्णन करती है — तो नहीं बता पाएँगे। लेकिन जो कुछ फिज़िकल है, उसके नेचर को वो हुबहू बता देंगे। इससे आख़िरी जो निष्कर्ष निकलेगा, वो ये है कि अगर एक ये (बाहर की ओर इंगित करते हुए) यात्रा है और एक ये (ख़ुद ओर इंगित करते हुए) यात्रा है — आएँगी दोनों अध्यात्म में ही, विज्ञान की आत्मज्ञान की। लेकिन इनमें से अगर एक है जो थोड़ी-सी श्रेष्ठ है दूसरे से, तो वो ये (ख़ुद ओर इंगित करते हुए) वाली है।
इसीलिए बिल्कुल हो सकता है कि बहुत बड़ा वैज्ञानिक हो, लेकिन वो जो बात बोल रहा हो उसमें वादों की बहुत-बहुत कमी हो। लेकिन ये कभी भी नहीं हो पाएगा, ये ग़ौर से पकड़िए — लेकिन ये कभी भी नहीं हो पाएगा, कि कोई आत्मज्ञानी ऐसी बात बोल दे जो अवैज्ञानिक हो।
वैज्ञानिक ऐसी बात बोल सकता है जो अबोध की हो, लेकिन बुद्ध ऐसी बात नहीं बोलेंगे जो अवैज्ञानिक हो।
आइंस्टाइन ने पता नहीं कितनी बातें ऐसी बोली हैं — जिनमें बोध तो छोड़िए, विज्ञान भी नहीं है। जब यूनिवर्स का प्रोबैबिलिस्टिक मॉडल सामने आने लगा, तो आइंस्टाइन की बड़ी प्रसिद्ध उक्ति है — “गॉड डज़ नॉट प्ले डाइस विद द यूनिवर्स।” पहली बात तो, हाँ यूनिवर्स प्रोबैबिलिस्टिक ही है। तो डाइस वाली बात ग़लत हो गई।
दूसरे, इतना कुछ करने के बाद भी उनके भीतर एक यहूदी होने के नाते, एक क्रिएटर गॉड की अवधारणा अच्छे से बैठी हुई थी। रूसी वैज्ञानिक थे, वो बिग बैंग नहीं मानना चाहते थे। क्योंकि उनका ये था कि अगर बिग बैंग मान लिया, तो बिग बैंग का मतलब होगा कि एक बिंदु आ गया ना जहाँ से सब शुरू हुआ है। तो फिर माने गॉड को भी मानना पड़ेगा। अगर कहीं से सब शुरू हुआ है तो उससे पहले गॉड रहा होगा, उनका तर्क। उन्होंने कहा, "हम बिग बैंग ही नहीं मानेंगे।"
उन्होंने कहा कि "ये जो यूनिवर्स है — ये एक ऑस्सीलेटिंग यूनिवर्स है, जिसमें एक बिग एक्सपैंशन होता है, फिर एक बिग क्रंच होता है।" लेकिन जो क्रंच होता है, वो असिमेट्रिकल होता है — तो वो कभी भी जाकर के एक डेंस पॉइंट में कल्मिनेट नहीं होता।
वो ऐसे आता है — ऐसे-ऐसे-ऐसे (दोनों हाथों को एक दूसरे के नज़दीक लाते हुए) , और फिर वो यूनिवर्स ऐसे ( हाथों का नज़दीक आना और दूर जाना) पल्सेट करता रहता है। और ऐसे ही वो इटरनली पल्सेट कर रहा है। तो यानि किसी ने बनाया नहीं। इटरनल है, और ऐसे-ऐसे कर रहा है।
अब ये रूसी वैज्ञानिक क्यों कर रहे हैं? ये इसलिए कर रहे हैं ताकि जो मार्क्सिज़्म लेनिनिज़्म है, उसको कायम रखा जा सके। तो वैज्ञानिक अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त हो गया हो, ये बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है। इसी तरीक़े से मनुष्य अलग-अलग होते हैं। जैसे-जैसे जेनेटिक्स ये बात सामने लाने लगी, रूसियों ने फिर इसको मानने से इंकार कर दिया। क्योंकि पूरा मार्क्सवाद इस बात पर आधारित है कि हम सब बिल्कुल एक समान हैं। साम्यवाद का मतलब ही यही है ना — साम्य — सब में समता है।
अब जेनेटिक्स तो ये सामने आने लग गई कि समता नहीं है। लोगों में अलग-अलग तरीक़े की क्षमताएँ, गुण, योग्यताएँ होती हैं। उन्होंने बहुत समय तक जेनेटिक्स के फ़ील्ड को ही अवरुद्ध करने की भी कोशिश करी।
तो वैज्ञानिक के भीतर बोध ना हो, ये बिल्कुल संभव है। वैज्ञानिक के भीतर कई तरह की माया बैठी हो, पूर्वाग्रह बैठे हों, ये संभव है। लेकिन ज्ञानी के भीतर अवैज्ञानिक दृष्टि हो, ये संभव नहीं है। वैज्ञानिक तो वो सब भी होते हैं — रॉकेट छोड़ने से पहले नारियल फोड़ना, ये सब वैज्ञानिकों का ही तो काम है।