उनकी ज़िद है हमें बचाना, हम चाहें बर्बाद हो जाना || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशांत: यह विचित्र रवैया रहा है हमारा, ज्ञानियों, सन्तों के प्रति। हमने उनके सामने सिर भी झुकाया है। स्वेच्छा से ही उनकी बातों को ख़ूब गाया है। लेकिन उन्ही बातों में उन्होंने हमें जो सिखाया है, हमने उसका ख़ूब उल्लंघन भी करा है।
असल में एक समस्या आती है, एकदम मूलभूत। समस्या यह आती है कि हम सन्तों को बोल देते हैं कि ये अच्छे लोग हैं। है न। ये अच्छे लोग हैं। और अच्छे आदमी की हमारी परिभाषा क्या है? हमारे आम जीवन में हम अच्छा आदमी किसको बोलते हैं, हमारे लिए अच्छा कौन होता है, जो हमें चोट न पहुँचाए। जो हमें चोट न पहुँचाए। जो हमें दर्द न दे, उसको हम कहते हैं, अच्छा आदमी है। है न!
आपकी किसी से बहस हो रही हो तभी वहाँ कोई आये और आपका बहस में समर्थन कर दे। आप बहस में ज़रा हल्के पड़ रहे थे और किसी ने आकर आपका साथ दे दिया। आपकी दृष्टि में वो तत्काल कैसा आदमी हो जाएगा, अच्छा आदमी न। जो आपके मत का, रुख का, आपकी बात का समर्थन करे, वो अच्छा आदमी है। है न।
और सन्तों को तो हम बोलते ही हैं, ‘भले मानस थे, अच्छे लोग थे।‘ और अच्छे से आशय ही यही है कि जो तक़लीफ़ नहीं देगा, जो हमारे विरुद्ध नहीं खड़ा होगा, वो अच्छा है। तो अच्छेपन की इस परिभाषा से बड़ी गड़बड़ हो जाती है। यहाँ जो एक-एक बात है, एक-एक शब्द है, वो हमें तोड़ने के लिए ही है।
लेकिन सन्तों की मिठास ऐसी रहती है, उनकी स्निग्धता ऐसी होती है, उनकी कोमलता ऐसी होती है कि उनको देखकर लगता ही नहीं कि ये आदमी तोड़ने का काम करने के लिए आया है।
वो बड़ा भला मानस लगता है। कितना अच्छा आदमी है! मधुर स्वर है, शीतल वाणी है, जगत के कल्याण के लिए ही जैसे अवतरित हुआ है। सबको आशीर्वाद दे रहा है, सबकी ख़ैर माँग रहा है, निस्वार्थ काम करता है, बुरा किसी का चाहता नहीं। अच्छा आदमी है।



