
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। घर-परिवार में कोई ऐसा हो जो बिल्कुल नालायक क़िस्म का हो, फिर भी आप उसके पैर जाकर छू जाते हो। तो मेरा सवाल था कि हाँ, ठीक है, मतलब आपको पता है कि वो लायक नहीं है कि आप इज़्ज़त करो या वो चीज़ें करो, और आप अंदर से बिल्कुल अनछुए से रहते भी हो, मतलब आपके अंदर से कोई भाव नहीं है। लेकिन फिर भी आप सोशल नॉर्म्स के चलते या ऐसी चीज़ों के चलते पैर छू जाते हो। ये एक बात हुई। ऐसे ही कहीं और भी मौके होते हैं, वहाँ पर आप सोशल नॉर्म्स के चलते कुछ चीज़ें कर लेते हो।
आचार्य प्रशांत: सोशल नॉर्म्स के चलते माने क्या? सोशल नॉर्म्स के डर में, ये बोलो न खुल के। सोशल नॉर्म के चलते ऐसे जैसे वहाँ कोई चल रहा हो। वहाँ ऊपर कोई चल रहा है, वो सोशल नॉर्म है। सीधे बोलो न कि सोशल नॉर्म के आगे?
प्रश्नकर्ता: डर में, उसके डर में। तो मेरा सवाल ये था इसमें कि उसके कुछ फायदे भी मिल जाते हैं। जब उसको फॉलो करते हैं तो उसके फायदे भी मिल जाते हैं।
आचार्य प्रशांत: एक झटके में ईमानदारी खुल गई सारी।
प्रश्नकर्ता: मैं वैसे ये शब्द इस्तेमाल करने ही वाला था कि उसके कुछ फायदे भी होते हैं। तो मेरा सवाल ख़ास ये था कि क्या ये गलत होगा अगर हम उन फायदों के चलते ये चीज़ें कर लें, जबकि हम अंदर से जानते हैं कि कोई दम है नहीं इस चीज़ में।
आचार्य प्रशांत: जब तक तुम्हें दिखाई दे रहा है कि सचमुच मजबूरी है, छू लो। पर जितनी बार छुओ, उतनी बार ख़ुद से घिनाया भी करो। बाहरी बदलाव तत्काल नहीं आ जाते, ठीक है। पर कम से कम हर ऐसा अवसर ज़रूरी है कि तुम्हें तुम्हारे प्रति घृणा से भर दे, और ये बहुत ज़रूरी होता है। अपनी वर्तमान स्थिति से नफ़रत करना बहुत ज़रूरी होता है।
वो नफ़रत नहीं उठेगी। कई लोग होते हैं, वो नौकरी कर रहे हैं। कहते हैं, “क्या करें? बेहोशी में अब वो कर्ज़ा ले लिया था। कर्ज़ा खा-पी लिया, चुकाना तो पड़ेगा ही।” हाँ, ठीक है। लेकिन रोज़ सुबह जब कार्ड्स स्वाइप करो तो भीतर ज़हर उठना चाहिए। बिल्कुल उठना चाहिए, भले उससे तबीयत ख़राब हो जाए, एसिडिटी हो जाए, सरदर्द हो जाए, जो हो जाए होता रहे। लेकिन मैं बिल्कुल नहीं चाहूँगा कि आप किसी गलत जगह, फालतू जगह जा रहे हो और मुस्कुराते हुए प्रवेश कर रहे हो कि “ये तो कुछ नहीं, माया है। क्या होता है?”
मैं जॉब करता था और मेरे पास भी वजह थी जॉब करने की। मैंने भी कुछ कर्ज़े ले रखे थे, जिनको चुकाना था। एजुकेशन लोन ही था सबसे पहले तो। उस समय पर मैंने एक पंक्ति लिखी थी। अब लिखी थी तो याद तो नहीं होगी, दे दे मोबाइल, खोज के देना ज़रा सा, मैं बताता हूँ, रुको। और बड़े दिल से उठी थी बात, क्योंकि दिल से उठी थी इसीलिए मैंने अपने लिए जो समय-सीमा तय करी थी, मैं उससे पहले ही अपना कर्ज़ा चुका करके कॉर्पोरेट से बाहर हो लिया। अच्छा लगता है याद करके। बाईस साल का था, पर इतना पता था कि मैं यहाँ हूँ मुझे यहाँ होना नहीं चाहिए। और इसी कारण जल्दी से जल्दी निकल पाया।
उसका शीर्षक है, “पूर्व संध्या पर”। किस चीज़ की पूर्व संध्या पर, मुझे भी नहीं पता था। मुझे ये पता था, कुछ होने जा रहा है। जो होने जा रहा है। मैं ये भी कह सकता था, ऑन द ईव ऑफ़ एन एक्सप्लोज़न। पर वो विस्फोट क्या था, मैं जानता नहीं था। तो मैंने उसको डॉट-डॉट-डॉट लिखकर छोड़ दिया था। पूर्व संध्या, माने ऑन द ईव ऑफ़, उससे एक दिन पहले। मैं वहाँ पर जो मेरी भौतिक विवशताएँ थीं, उनको ही काटने के लिए गया था। सीधे-सीधे लोन था, और उसके लिए ही एक-एक रुपया जोड़ रहा था कि इसको जल्दी से जल्दी ख़त्म करो।
लिखा था:
“मैं बड़ी लगन से जतन कर रहा हूँ, ख़ूब छुप-छुप के, इसलिए अब कविता काफ़ी कम लिखता हूँ।”
आगे सुनो क्या है? संदर्भ समझते हो, इसलिए बात पूरी खुलेगी।
“मैं पैनेकर रहा हूँ चुपके से अपने हथियार, तुम्हारे ही बीच रहकर।”
किससे बात कर रहा हूँ? उस माहौल से।
“मैं पैने कर रहा हूँ चुपके से अपने हथियार, तुम्हारे ही बीच रहकर रंग-बिरंगा वेश पहनकर हूँ, तुम में से एक (अभी)”
तुम्हारे ही जैसे कपड़े पहनकर, तुम में से हूँ एक अभी। बस अभी। और ये जो रंग-बिरंगे कपड़े पहने हैं, इनके लिए:
“सतर्क हूँ मैं ख़ुद को भी नहीं जानने देता रंगों के पीछे क्या है।”
ये जो मैंने अभी रंग-बिरंगा भेष बना रखा है, तुम्हीं जैसा बना बैठा हूँ। मैं ख़ुद को भी अभी जानने नहीं दे रहा हूँ कि इन रंगों के पीछे असली चीज़ क्या है। क्योंकि जो असली चीज़ है, वो बड़ी ज़बरदस्त है। उसको जानना माने फिर कोई और कहानी शुरू हो जाएगी। इसीलिए अभी मुझे पता है कुछ है भीतर जो फटेगा, पर अभी मैं उसको जानना भी नहीं चाहता।
आगे सुनो:
“बैल की तरह आ भिड़ने की साध तो बहुत है।”
हुलक तो रोज़ उठती है कि ये सब छोड़ के सतर्कता अभी ही जाकर सीधे-सीधे भिड़ ही जाऊँ।
“बैल की तरह आ भिड़ने की साध तो बहुत है पर अब छिपाऊँ क्या थोड़ा-सा….डरता हूँ।”
आगे है:
“यहीं पर जियूँगा, यहीं पर हँसूँगा, अपने हथियार खुरचूँगा। जब भी साँस लूँगा या बत्तीसी दिखाऊँगा।”
तुम्हारे बीच रह के साँस भी ले रहा हूँ, हँस भी रहा हूँ तुम्हारे साथ। लेकिन जितनी बार हँस रहा हूँ तुम्हारे साथ, समझ लो उतनी बार मैं अपने हथियार पैने कर रहा हूँ।
“या तो तुम मुझे बेनक़ाब कर दो या फिर अपने चोले में छिपे निरंतर पैने होते खंजरों से मैं ख़ुद ही मारा जाऊँगा।”
ये जो रंग-बिरंगा भेष पहन रखा है, इसके पीछे मैं अपने हथियार, अपने खंजर तैयार कर रहा हूँ, तुम्हारे ही ख़िलाफ़। और चूँकि अभी मैं डर रहा हूँ थोड़ा, तो मैं तुमसे कह रहा हूँ, तुम ही मुझे बेनक़ाब कर दो, मेरा ये भेष उतार दो। नहीं तो होगा क्या कि ये जो भीतर मैं अपने खंजर तैयार कर रहा हूँ; नहीं तो अपने चोले में छुपे, निरंतर पहने होते खंजरों से मैं खुद ही मारा जाऊँगा।
मैं ये कर नहीं पा रहा कि मैं तुरंत ख़ुद ही सब कुछ छोड़-छाड़ करके सामने आ जाऊँ और बैल की तरह भिड़ जाऊँ। तो अंत में मैं आग्रह कर रहा हूँ अपने माहौल से कि एक काम करो न, तुम ही मुझे बेनक़ाब कर दो। तुम ही मुझे बेनक़ाब कर दो।
सामंजस्य, एडजस्टमेंट नहीं कर लेना चाहिए। जहाँ किसी तरीके से झुकना भी पड़े, दबना भी पड़े, डरना भी पड़े, वहाँ कम से कम अपने लिए नापसंद तो उठे। इतना तो हो कम से कम।
मेरे भी थे ऑफिस में लोग, जिनको न चाहते हुए भी ‘सर’ बोलना पड़ता था। बहुत लंबे समय तक नहीं बोला, पर जितने समय तक बोला, उतने समय तक बोलना भी ऐसा था कि सिर भनना जाए। बोलता था, सर बोला है। पर जितनी बार सर बोला है, उतनी बार इधर (दिमाग) कुछ डोला है।
प्रश्नकर्ता: तो आपने बोला था कि कॉर्पोरेट जॉब में आपको रोज़ ऐसे घिन आता था। आई ऐम इन द सेम पोज़िशन और रोज़ सोचती हूँ कि रिज़ाइन कर लूँ। पर कुछ और परसेप्शन्स भी हैं, कि जैसे अब तक जो-जो कॉलेज में इंडिपेंडेंस नहीं था, वो कॉर्पोरेट जॉब से मिला है। और कुछ चीज़ें अच्छी भी मिली हैं, फ्रीडम मिला है, एम्पावरमेंट मिला है। मतलब रेंट अफोर्ड कर पा रही हूँ, खाना, न्यूट्रिशन अफोर्ड कर पा रही हूँ। तो एक कन्फ़्यूज़न है कि रोज़ सोचती हूँ कि छोड़ दूँ, पर फिर…।
आचार्य प्रशांत: फिर मैंने ये नहीं किया कि मैंने भावुकता में आकर छलाँग लगा दी थी। कैसी बातें हो रही हैं? रेंट, न्यूट्रिशन, खाना, ये क्या बातें हो रही हैं ये। अरे भाई, एक जगह छोड़ोगे तो साथ में दूसरी जगह प्रबंध भी तो करोगे।
प्रश्नकर्ता: हाँ, पर वो इमीडिएटली नहीं हो पाएगा न।
आचार्य प्रशांत: तो कौन कह रहा है कि अभी अगले सेकंड में करना है? इमीडिएटली किसने बोला? पर तुम वहाँ पाँच साल में भी कुछ नहीं करो तो? जब मैं कहता हूँ कि बहुत देर मत कर देना, तो उस बात को दूसरी अति, दूसरे एक्सट्रीम पर ले जाकर नेगेट कर देते हो। कहते हो, इतनी जल्दी कैसे छोड़ दें? अरे, इतनी जल्दी नहीं होता। मुझे तीन साल लगे थे। तो चलो, तुम्हें पाँच साल लग जाएँ, पर कोई कहे, मेरे पच्चीस साल हो गए हैं, अभी बस तीस-चालीस साल और लगेंगे। तो?
रेंट, खाना-पीना, साधारण खर्चे, बिल्कुल इनका ख़्याल करो, क्योंकि ये खर्चे तो करोगे ही। और एकदम ठीक कह रहे हो, ये खर्चे अगर खुद नहीं उठाओगे, तो कहीं और से पैसे माँगने पड़ेंगे। और पैसे कहीं और से माँगोगे, तो आज़ादी छीनेगी। मैं समझ रहा हूँ क्या बोल रहे हो। बिल्कुल एक स्थिति होती है, उसको सीढ़ी के एक पायदान की तरह इस्तेमाल करते हैं, और उसका इस्तेमाल करके उससे ऊपर बढ़ जाते हैं। आप यहाँ पर हो, अच्छी बात है। अब इससे आगे बढ़ो।
प्रश्नकर्ता: मतलब मैं कुछ लोगों से बात किया, तो व्हाट दे टोल्ड कि बी ग्रेटफ़ुल दैट एट लीस्ट यू हैव अ जॉब।
आचार्य प्रशांत: यस, बी ग्रेटफ़ुल। बट देयर इज़ ऑलवेज़ समथिंग बेटर पॉसिबल। कौन कह रहा है कि ग्रेटफुल मत रहो?
प्रश्नकर्ता: मतलब लोग बोलते हैं कि जॉब मार्केट भी ख़राब है और यू ऑलरेडी हैव अ जॉब, सो हाउ कैन यू ईवन थिंक ऑफ़…
आचार्य प्रशांत: इसका न कोई जवाब होता नहीं है, ये तो चीज़ें करने की होती हैं। जिसे करना है, वो कर डालेगा। आपको मार्केट भर की जॉब थोड़ी चाहिए, आपको एक जॉब चाहिए। ठीक है? जॉब मार्केट ख़राब है। फलाने इंस्टिट्यूट में सिर्फ़ सौ ही तो सीटें हैं। मुझे सौ भी नहीं चाहिए, मुझे तो एक चाहिए। मैं निकाल लूँगा।
नहीं, मार्केट में कुछ भी नहीं है, एक भी जॉब नहीं बची। तो कोई बात नहीं, मैं एक अलग सेक्टर ही क्रिएट कर दूँगा। नहीं, कोई कंपनी जॉब नहीं दे रही। कोई बात नहीं, मैं अपनी कंपनी क्रिएट कर दूँगा। वो तो करके दिखाने की बात होती है, ये तो इस पर होता है कि आपके भीतर आग कितनी है। इसमें कोई मतलब बाहर से आपको प्रिंसिपल बता करके कि ऐसे कर लो, ऐसे कर लो, ऐसे कर लो, तो तुम सच की सुरमा भी बनी रहोगी और सिक्योरिटी भी बनी रहेगी। ऐसे नहीं होता है, ऐसे नहीं होता है न।
अपने जहाँ-जहाँ भी कंफ़र्ट्स हैं और जिसको फ्री टाइम वग़ैरह बोलते हो न, उसको एकदम कम कर दो और उसका इस्तेमाल करो अपनी आज़ादी तलाशने में। कैसे नहीं मिलेगी?
यही तो कह रहे हो न कि अभी अपने खाने-पीने के लिए, रेंट देने के लिए, खर्चों के लिए और न्यूट्रिशन बोला इन चीज़ों के लिए, जिससे भी पे-मास्टर से पैसा ले रहे हो, लेना पड़ेगा, तो ठीक है। उसने तो घंटे बाँध रखे होंगे न कि दिन के इतने घंटे हमारे यहाँ काम करोगी, करो उतने घंटे काम। उसने दिन भी रखे होंगे कि पाँच या छह दिन हमारे यहाँ काम करोगी, तो करो पाँच-छः दिन काम। उसके बाद भी तो समय है ना।
तो जो बाद का समय है, उसमें चिल क्यों मारना है? उसके बाद जो समय है, उसमें रिलैक्स क्यों करना है? उसमें जाकर फिर अपने लिए एक नई दुनिया तलाशो या नई दुनिया बनाना शुरू करो। जाओ, निकलो बाहर। और अपने खर्चे कम करके रखो ताकि अपने पे-मास्टर को उतने घंटे न देने पड़ें, जितने अभी देने पड़ते हैं। ये तो ख़ुद ही करना पड़ता है। इसका कोई इलाज नहीं है कि ये कैसे करें, क्या करें, क्यों न करें।
मुझे धुन चढ़ती थी, मुझे अपना लोन जल्दी-जल्दी उतारना था। वो पाँच साल वाला था, और भी कुछ खर्चे थे, लोन के अलावा भी। एजुकेशन लोन पाँच साल का था। वही, इसके अलावा और भी चीज़ें थीं, जो मैंने अपने दोस्तों से पैसे ले रखे थे। क्योंकि ये पक्का था कि घर से नहीं लूँगा। बहुत अच्छे रिश्ते थे घर से। कोई समस्या नहीं। पर ये अपने आदर्श कह लो, सिद्धांत कह लो, बात थी कि नहीं तो नहीं।
पाँच साल का था, उसकी ईएमआई बँधी हुई थी। मैंने कहा, इसको और जल्दी क्यों ना कर दें? मैंने जाकर ईएमआई बढ़वा दी, और बढ़ा दो। और उस वक़्त मैं एक अच्छी-खासी एमएनसी में काम कर रहा था, आईआईएम अहमदाबाद से निकलने के बाद। मैंने ईएमआई इतनी बढ़वा दी, इतनी बढ़वा दी कि एक महीना था उसके आख़िरी के दो-चार दिन थे, उसमें मैं जाकर ढाबे से तंदूरी रोटियाँ लेकर आता था और घर में अचार रखा हुआ था, उसके साथ खाता था।
घर मतलब अलग रहता था मैं, गुड़गाँव में अलग रहता था। वहाँ अचार रखा था, उसके साथ खाता था। फिर रोटियाँ पैक करा के ले जाता था। एक पेट्रोल पंप वाले से दोस्ती थी, तो वो ₹10 का पेट्रोल डाल देता था। बाक़ी सब आँखें दिखा देते, ₹10 का पेट्रोल डालने आया है।
ये तो अपने ऊपर, अब मैं इसको एक गाइडिंग प्रिंसिपल की तरह आपको थोड़ी बता सकता हूँ। आपको बता दूँ, आप कह दो, “मुझे एनीमिया हो गया।” मैं फिर उसके लिए थोड़ी ज़िम्मेदार हूँगा। और बिल्कुल एनीमिया हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता? आप अचार के साथ रोटी खाओगे तो एनीमिया हो भी सकता है। अब ये तो ख़तरा ख़ुद को उठाना है अपनी ज़िम्मेदारी पर, कि कितनी दूर तक जाना है कितनी दूर तक नहीं जाना है।
मैंने दो काम करने शुरू कर दिए थे। मैं आता था, मैं उसके बाद शाम को आता था और निकल जाता था अपने दूसरे काम पर। वो एक स्टार्ट-अप थी, वहाँ से मैं रात में लौट के आता था एक-दो बज रहे होते थे, मैं जूते पहने-वहने सो जाता था और उठ के फिर सुबह वैसे ही बाइक पर बैठकर चला जाता था। ये तो अपनी आग पर है, कि आज़ादी कितनी जल्दी चाहिए। नहीं तो मैं भी कह सकता था, बैंक तो खुश हो जाता। मैं कहता, कि मैं पाँच साल में नहीं दस साल में चुकाऊँगा, बैंक को तो और इंटरेस्ट मिलता। वो और खुश हो जाता। बल्कि उनको जब कहा कि जल्दी करूँगा तो उन्होंने मुझ पर प्री-पेमेंट पेनल्टी और लगा दी। नहीं, दे दूँगा। निकलने दो बाहर।
ये दोनों चीज़ें एक साथ नहीं चलती हैं। सच और सुविधा नहीं, नहीं चलते एक साथ। लेकिन हाँ, चुँकिउ आपको भ्रम न हो इसलिए बोला था, उन सुविधाओं के हटने से ऐसा नहीं है कि कोई दुख आ जाता है, मौज और रहती है। आप यहाँ सामने खड़े हो, सवाल पूछ रहे हो। इसलिए मुझे वो सब याद आ गया, वरना मुझे उन सब बातों का कोई दुख थोड़ी है।मैं बैठकर अफ़सोस थोड़ी मनाता हूँ, कि अरे, “तीन दिन तक मैंने तंदूरी रोटी और अचार खाया था बस।” मुझे कोई इसमें अफ़सोस थोड़ी है। क्या अफ़सोस होगा? पर आप जहाँ से सुन रहे हो, आपको हो जाएगा, “रोटी और अचार ख़तरनाक!”
और फिर कोई ज़रूरी भी नहीं है कि सुविधा छीने ही। मैं भी जो उदाहरण दे रहा हूँ, वो एक अति का दे रहा हूँ, एक्सट्रीम का दे रहा हूँ। उस एक्सट्रीम तक सबको जाना पड़े, ये भी ज़रूरी नहीं है। कोई नियम थोड़ी बना हुआ है कि सही काम करोगे और जीवन में आज़ाद जीना चाहोगे तो सब सुविधाएँ छिन जाएँगी। ये भी कोई ज़रूरी नहीं है। हो भी सकता है कि छीने, हो सकता है न भी छीने, कम छीने। हो भी सकता है बढ़ भी जाएँ, कौन जाने। बात निष्कामता की है, कि छीनेगी कि मिलेगी, बढ़ेगी कि बचेगी, हमें उसकी परवाह नहीं है।
ऐसे समझोगे, अगर झूठ और दबाव और बंधन इनके सामने मजबूर होना पड़ रहा है न तो इसका मतलब कहीं-न-कहीं अपने हाथ बाँध रखे हैं। मत बाँधो।
सबसे गलत चीज़ होगी एक बिकी हुई ज़िंदगी जीना। उससे बचने के लिए जो भी करना पड़े, करो।
जो भी अपने ऊपर शर्तें लगा रखी हैं, वो सारी शर्तें हटा दो। अगर ये शर्त लगा रखी है, कि नहीं-नहीं, मैं तो वही काम करूँगी जो समाज में इज़्ज़त के माने जाते हैं। समाज जिस भी नज़र से देखता हो, ईमानदारी की रोटी खा रहे हैं तो कर रहे हैं वो काम। आपको नहीं लगता वाइट कॉलर जॉब तो न लगे, अज़ादत् तो हैं न। तो वो जो मदर कन्स्ट्रेंट है उससे बचने के लिए और जितने भी अपने ऊपर कन्स्ट्रेंट्स लगा रखे हों सारे हटा दो। सारे हटाए दो।
ये मैं नहीं कम्युनिकेट कर पा रहा हूँ? नहीं समझ रहे हो?
अगर कोई आप पर दबाव बना लेता है, आपको प्रेशराइज़ कर लेता है, तो वो इसलिए कर लेता है क्योंकि आपने अपने लिए और सीमाएँ तैयार कर रखी होती हैं। वह उन सीमाओं का सहारा लेकर, वो उन्हीं सीमाओं को इस्तेमाल करके आपको प्रेशराइज़ कर लेता है। समझ रहे हो?
इसके (मग) भीतर कुछ है। ठीक है? और मैं उसके साथ बड़ी गरिमाहीन तरीके की बदतमीज़ी करना चाहता हूँ। इसके भीतर कोई है। अब अपना नाम बताओ?
प्रश्नकर्ता: वसुधा।
आचार्य प्रशांत: इसके भीतर वसुधा है। बहुत सही है। वसुधा माने धरती, पूरी पृथ्वी ही ऐसी है। इसके भीतर कोई है और मैं उसके साथ बदतमीज़ी करना चाहता हूँ। ठीक है? और मैं कर रहा हूँ। इसको लात भी मार रहा हूँ, सब कुछ कर रहा हूँ।
सब कुछ कर रहा हूँ, मैं कैसे सफल हो जा रहा हूँ इसकी बेइज़्ज़ती करने में, इस पर दबाव बनाने में? कैसे सफल हो जा रहा हूँ? मैं नहीं सफल हो रहा, यह जो भीतर है न इसने अपने लिए सीमा चुन रखी है। ज्यों ही मैं इसके साथ बदतमीज़ी करूँ, इसे लात मारूँ, यह घोषणा कर दे कि मुझे इस सीमा का आदर करना ही नहीं है तो यह जो भीतर है, उसका क्या होगा? वो बच जाएगी।
मैं इस पर इसलिए छा जाता हूँ, मैं इसको दबाव में डाल लेता हूँ, डॉमिनेट कर लेता हूँ, क्योंकि इसने इस बाउंड्री को पकड़ रखा है। हो सकता है इस बाउंड्री में इसको इज़्ज़त मिलती हो, सहारा मिलता हो, सुरक्षा मिलती हो। तो मैं इस बाउंड्री का इस्तेमाल करके इसके भीतर जो वसुधा है, उसके साथ दुर्व्यवहार कर जाता हूँ। जैसे ही वसुधा ने कहा, कि मुझे यह बाउंड्री चाहिए ही नहीं, वैसे ही वह इस बाउंड्री से ही नहीं मुक्त हुई, उसके साथ जो भी कोई दुर्व्यवहार करता है, उससे भी मुक्त हो गई।
एक गुब्बारा है। ठीक है न? प्रेशर वाली चीज़ ज़्यादा समझ में आएगी क्योंकि उसमें प्रेशर रहता है, एयर प्रेशर। आप उसको एक तरफ़ से दबाए जा रहे हो, दबाए जा रहे हो, दबाए जा रहे हो। प्रेशर बढ़ाए जा रहे हो, किस पर प्रेशर बना रहे हो? हवा पर। हवा पर है न? वो हवा इतना प्रेशर क्यों झेल रही है, बेचारी? क्योंकि उसने उस सीमा, उस बाउंड्री को रिस्पेक्ट दे रखी है। और फिर एक क्षण आता है जब हवा कहती है, मुझे इस सीमा को रिस्पेक्ट नहीं देनी। मुझे अपनी सीमाओं को सुरक्षित नहीं रखना, नहीं सम्मान करना मुझे इन लक्ष्मण रेखाओं का। और वो गुब्बारे को फाड़ देती है और आज़ाद हो जाती है। उसको सचमुच कौन दबा रहा था? मैं, या वो सीमाएँ जो उस हवा ने अपने लिए बना रखी थीं?
श्रोता: सीमाएँ।
आचार्य प्रशांत: जो अपनी सीमाएँ त्यागने को तैयार हो जाता है, दुनिया में कोई उस पर दबाव नहीं बना सकता। दुनिया वाले तुम्हारे ही द्वारा तय की गई सीमाओं का इस्तेमाल करके तुम्हें क़ैद कर लेते हैं।
आ रही है बात समझ में कुछ?
वो भूला मत करो, वेदान्त की जो बात है न, नाहं देहास्मि। आख़िरी बात यही होती है कि शरीर बचाना है; जो तैयार हो गया ना कि शरीर भी नहीं बचाना, उसको कोई नहीं दबा सकता। जो तैयार हो गया कि देखो, बदतमीज़ी करोगे तो मुझे शरीर की भी रक्षा नहीं करनी है अपने, उसको कोई नहीं दबा सकता। और ख़ासकर महिलाओं में, जिस दिन महिला ने कह दिया कि मैं सड़क पर भी रहने को तैयार हूँ। तुम बड़े-से-बड़ा डर मुझे यही दिखाते हो न, सड़क पर आ जाऊँगी। मैं सड़क पर भी आने को तैयार हूँ। अब कोई नहीं दबा सकता तुमको।
करोड़ों महिलाएँ हैं जो ज़िंदगी में बदतमीज़ियाँ झेल रही हैं और बंधन बर्दाश्त कर रही हैं, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उनके खोपड़े में बात बैठा दी गई है, सड़क पर आ जाओगी। सड़क पर आ जाओगी। जिस दिन उसने कह दिया, आ जाऊँगी तो आ जाऊँगी, सड़क पर भी जी लेंगे।अब कोई नहीं दबा सकता तुमको।
यह देह ही तुम्हारा स्व-निर्धारित बंधन है। इसलिए वेदान्त कहता है, नाहं देहास्मि। सारे बंधनों में मूल बंध यही है, देह-भाव।
नहीं तो मछली जैसे हो जाओ न कबीर साहब की, “ज्यों ही जल से बिछड़े, झट से त्यागे देह।” कौन उसको बंधन में लाएगा? बोलो। आप सोचते हो आपने मछली पकड़ ली, कोई नहीं पकड़ सकता मछली को। आपको भ्रम हो रहा है कि आपने मछली पकड़ ली है। मछली कहती है, मैंने सागर पकड़ रखा है और तुम मुझसे सागर छुड़वाओगे? मैं ज़िंदा ही नहीं रहूँगी, लो पकड़ के दिखा दो मुझको। ऐसे हो जाओ न, हो जाओ ऐसे। अब देखते हैं कि कौन।
जो सबसे बड़ी सीमा थी, क्या? देह। उसने वो सीमा भी तोड़ दी। बोल रही है, रखो, रखो बंधन में। कैसे रख लोगे बंधन में? हम जिएँगे ही नहीं बंधन में कैसे रख लोगे हमको? तुम्हें लाश मिलेगी हमारी। अब देखते हैं कौन आपको दबा सकता है।
वहाँ तक जाने के लिए नहीं बोल रहा हूँ, कोई ज़रूरत नहीं है। ठीक है? एकदम नहीं। एकदम भी नहीं। देयर आर लेयर्स ऑफ़ कंस्ट्रेंट्स। अगर दस लेयर्स हैं, तो जो पहली चार हैं, उनको ही हटा दो तो बहुत आज़ादी मिल जाएगी। मैंने दसवीं की बात करी है, दसवीं की नौबत नहीं आती। एकदम नहीं। ठीक है? पहली चार लेयर्स उनको ही हटा दो। वो सेल्फ-इंपोज़्ड हैं, सेल्फ-क्रिएटेड हैं। ठीक है?
प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल सोशल मीडिया को लेकर है। सोशल मीडिया पर ज़रा-सी बात पर लोग टूट जाते हैं। एक साधारण पोस्ट के कारण लोग आपस में, एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हो जाते हैं। तो मेरा सवाल ये है कि लोग अपनी राय पर इतने अड़े हुए क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: राय पर अड़े हुए नहीं हैं। सच्चाई बिल्कुल विपरीत है, उन्हें पता है कि उनकी राय दो कौड़ी की है। उन्हें पता है कि उनकी राय दो कौड़ी की है, इसीलिए वो इतनी जल्दी आहत हो जाते हैं। जिसको पता होता है कि उसकी बात में दम है, वो इतनी जल्दी टूट थोड़ी जाता है। इसी शब्द का आप इस्तेमाल किया न आपने, कि लोग जल्दी टूट क्यों जाते हैं? “दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एकै धक्का दरार।” नहीं सुना है? और “सोना सज्जन साधु जन, टूट जुड़े सौ बार।”
सोना सज्जन साधु जन, टूट जुड़े सौ बार। दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एकै धक्का दरार।
आपको पता होता है कि आप बिल्कुल व्यर्थ की और बेवकूफी की बात बोल रहे हो; आपको पता होता है आप झूठ बोल रहे हो, और फिर भी ज़िंदगी से आपकी उम्मीद ये होती है कि आपके झूठ को सम्मान मिले। और जब आपके झूठ को सम्मान नहीं मिलता, कोई उसमें खोट निकाल देता है, कोई उसकी दरार दिखा देता है तो आप बिल्कुल दरक जाते हो, ढह जाते हो।
आपको पता ही हो कि आप कौन हो और कैसे हो, तो दूसरे की राय का आप पर क्या सचमुच बहुत असर पड़ने पाएगा? नहीं पड़ेगा न। और जो अभी चलता है कि “क्विक टू टेक ऑफ़ेंस, ईज़िली ऑफ़ेंडेड” इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है हम सब लोग झूठ में जी रहे हैं, गहरे झूठ में जी रहे हैं। झूठ कह रहा है, इसीलिए वल्नरेबिलिटी बहुत है, असुरक्षा बहुत है।
सिर्फ़ यही नहीं है कि कोई झूठ का पर्दाफ़ाश करे तो हमें बुरा लगेगा। ऐसा भी होता है कि आपने यूँ ही मज़ाक में बिना किसी नियत के किसी से कोई हल्की-फुल्की बात कह दी, वो तब भी बुरा मान गया। वो बुरा इसलिए मान गया क्योंकि वो टूटने को तैयार बैठा था। आपकी गलती नहीं है। आपकी गलती नहीं है, झूठ की प्रकृति ही यही है कि वो सदा टूटने को तैयार बैठा होता है। लेकिन जब वो टूटता है तो इल्ज़ाम दूसरे पर लगाता है कि दूसरे ने कुछ कर दिया।
“नहीं, मैं क्या करूँ? मैं अगर आचार्य जी सत्र सुनूँगा या ऐसे करूँगा, आपकी बात आगे बढ़ाऊँगा, तो घर वालों को चोट लग जाएगी।” ये तुम्हारे घर वाले कैसे हैं, जिनको सच्चाई से चोट लग जाती है? और जिसको सच्चाई से चोट लग रही है, वो तो झूठ के भीतर घुसकर बैठा हुआ है। तो उसको अगर चोट लग रही है, तो तुम थोड़ी ज़िम्मेदार हो? किसी ने चुन लिया हो कि शरीर पर घाव ही घाव रखूँगा, तो उसको तो हवा चले तो भी चोट लग जाएगी। हवा थोड़ी ज़िम्मेदार हो गई? या हो गई?
ये है, ये पानी का गिलास है। इसको पटक-पटक के इसमें कई तरीक़े की दरारें डाल दी जाएँ और उनको एक-के-ऊपर-एक बड़ी सावधानी से बैठा के छोड़ दिया जाए, और मैं इतनी दूर से आकर के फूँक मारूँ, तो क्या हो सकता है? वो गिर जाए। तो फूँक थोड़ी ज़िम्मेदार थी? पर आप लोग भी बहुत जल्दी अपने ऊपर दोष ले लेते हैं, अपनी नज़रों में अपराधी बन जाते हैं। “मैंने माँ का दिल तोड़ दिया।” माँ का दिल तुमने तोड़ा नहीं, माँ का दिल टूटा ही हुआ था और तुम ज़िम्मेदार नहीं हो उसके। तुम क्यों अपराधी बन रहे हो?
भीतर तो वो होना चाहिए, जिसको अखंड कहते हैं, अटूट कहते हैं। आत्मा के लिए तो ये नाम है। तुम्हारे भीतर कोई ऐसा कैसे बैठा है, जो बात-बात में टूट जाता है और चोट खा जाता है। और उसको आप लोग कई ऐसे भी कह देते हो, “वो न मेरी मिनी बहुत सेंसिटिव है।” वो सेंसिटिव नहीं है, वो माया है। और मिनी नहीं है वो मैक्रो है। मैक्रो माया उसका नाम है। क्यों है? क्योंकि अगर आपने उससे धोखे से भी 1% भी सच बोल दिया, तो तुरंत रूठ और टूट जाती है।
आप में से कितने लोग ऐसे लोगों को जानते हो, जिनके साथ होते हुए ये पूरा ख़्याल रखना पड़ता है कि कहीं गलती से भी ज़रा-सा भी सच न निकल जाए मुँह से। अब मेरा सवाल, ऐसे लोगों के साथ हो क्यों? क्यों हो? और साथ ही साथ मेरी सहानुभूति, ऐसे लोगों के साथ जी कैसे पाते होंगे जहाँ पता है कि सच बोला नहीं कि रिश्ता टूटने की नौबत आ सकती है। जी कैसे लेते हो? कैसे? बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती होगी। लगातार सच की नेति-नेति करनी पड़ती होगी, “ये कुछ भी बोलना, सच मत बोलना। नहीं तो पापा बुरा मान जाएँगे” या “मिनी रूठ जाएगी।”
जहाँ दोषी हो न वहाँ अपने आप को दोषी माना करो। और सही जगह पर ख़ुद को दोषी मानने के साथ ये भी चलता है कि जहाँ दोषी नहीं हो वहाँ ठसक से खड़े हो जाया करो, बोल के कि मेरी कोई गलती नहीं है। तुम मुझे गिल्टी नहीं करा सकते। आई एम नॉट गिल्टी, एंड आई विल नॉट बो डाउन। आई विल नॉट फील स्मॉल। आई विल नॉट अपोलॉजाइज़। मेरी कोई गलती नहीं है।
पर ये दोनों बातें एक साथ चलती हैं, हम सब सच के द्रोही हैं। वहाँ हम अपनी गलती मानते नहीं। और जहाँ आपकी गलती नहीं, वहाँ आप गलती मानने को बड़े तत्पर रहते हो। उल्टा करो पूरी बात को, दोष तो हमारा है पर दोष हमारा ये है कि ज़िंदगी मिली है आज़ादी और सच्चाई से जीने के लिए। अगर हम किसी के सामने दोषी हैं भी तो सत्य के सामने दोषी हैं। हम वहाँ दोषी हैं, वहाँ सर भी झुकाओ, माफी भी माँगो।
और इसका अर्थ ये होगा कि जहाँ दोषी नहीं हो, वहाँ पर नज़रें मत झुका लिया करो। भले ही कोई कितने अपने ज़ख़्म दिखाए, भले कोई कितने अपने आँसू बहाए; और ये सब आपको अपराधी महसूस कराने के तरीके होते हैं कि “देखा, तुम्हारी वजह से मुझे इतना हर्ट हो गया।” अभी कम हुआ है, और कराऊँ? कुछ नहीं करना पड़ेगा, दो-चार सच और बोलने पड़ेंगे बस।
मैं नहीं कह रहा हूँ ऐसे लोगों से उलझो। मेरा तो सवाल यही था कि ऐसों के आसपास पाए क्यों जाते हो? और आप तो सोशल मीडिया की बात कर रहे हो। ये तो शायद घरवाले भी नहीं हैं। ऐसे तो अगर घरवाले भी हों, दोस्त भी हों, तो उनसे भी बचकर चलना चाहिए। आप तो अनजान लोगों की बात पूछने आ गए कि सोशल मीडिया पर ऐसे लोग मिलते हैं, जो जल्दी से हर्ट हो जाते हैं। अरे, हो जाते हैं जल्दी से हर्ट, तुम्हें क्या करना है? ब्लॉक करो, आगे बढ़ो। छोटी-सी ज़िंदगी है। इसमें मूर्खों की मूर्खताएँ गिनोगे, तो पता नहीं चलेगा कब बर्बाद हो जाएगी।
आठ सौ करोड़ लोग हैं दुनिया में। सबकी मूर्खता गिनने का और झेलने का ठेका लिया है क्या आपने? आगे बढ़ो न। अटके क्यों पड़े हो? ये सब बहुत गलत मूल्य हैं, अतीत के प्रति वफ़ादारी, जगह के प्रति वफ़ादारी, ज़मीन के प्रति वफ़ादारी, हवा के प्रति वफ़ादारी, “दिल्ली नहीं छोड़ूँगा, 800 एक्यूआई आ जाए तो भी नहीं छोड़ूँगा। दिल्ली दिल वालों की।” दिल ही दिल बचेगा फेफड़ा तो गया। ये सब व्यर्थ के मूल्य हैं।
सच के साथ अगर वफ़ा रखनी है तो बाक़ी जगहों पर बेवफ़ा होना सीखो। बेधड़क, धड़ल्ले के साथ, बेहिचक बेवफ़ा होना सीखो, विदाउट अपोलॉजी। ये नहीं कि अच्छा काम भी डर-डर के, छुप-छुप के कर रहे हो। पर्दे के पीछे, रजाई में छुप के, पर्दा गिरा के। जो बात मैं आपको बोल रहा हूँ, उस मुझ पर भी लागू होती है न, मेरी भी ज़िंदगी छोटी-सी है। क्या आप चाहते हो मैं ऐसे लोगों को पकड़ के चलता रहूँ, जो मेरी सुनना नहीं चाहते, मेरी बात समझ नहीं रहे, या जिनकी वफ़ादारी कहीं और है? बोलो, जल्दी बोलो।
श्रोता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: आप यहाँ आए हो मेरी संगत करने के लिए। ये मेरा बड़बोलापन है या साधारण सत्य है? बोलिए। सीधी-सी बात है न ये।
जो मेरी संगत करना चाहते हों, जिन्हें मेरी दोस्ती प्यारी लगती है, वो यहाँ पर आएँ। आपको मुझसे प्यार है तो रहो, नहीं तो बाहर जाओ। अब ये बात बोलते हुए क्या मुझे विनम्रता दर्शानी चाहिए? नहीं न? क्या ये बात बोलकर मुझे ख़ुद को दोषी और अपराधी मानना चाहिए? नहीं न?
तो आप इतनी जल्दी दब क्यों आते हो? झुक क्यों जाते हो? जो आपका अस्तित्वगत अधिकार है, उसके लिए सीधे खड़े हो के क्यों नहीं बोलते? हाँ। इतनी बार बोला, वो कोई सिर्फ़ सिद्धांत नहीं है कि सही जगह सर झुका दो तो कहीं और झुकाना नहीं पड़ता। जो सही है उसकी परवाह कर लो, तो फिर किसी और की परवाह करनी नहीं पड़ती, कि उसको अच्छा लग गया, कि बुरा लग गया, कि हर्ट हो गया, कि क्या हो गया। हो गया तो हो गया। जो हर्ट नहीं होंगे वो क्या करेंगे, तुम्हें अमर कर देंगे? या मरोगे, तुम्हारे साथ मरेंगे?
होते हो हर्ट तो हो जाओ। हमने जान के कुछ ऐसा करा नहीं कि किसी को दुख दें, तुम अगर दुखी हो रहे हो तो उसका कारण तुम्हारे भीतर है मेरे भीतर नहीं है। तो तुम्हारी बदनियती के लिए मैं ख़ुद को अपराधी क्यों घोषित करूँ?
सोशल मीडिया पर कितने लोगों को हर्ट कर दिया? क्या हो गया? क्यों तनाव में हो? एक तो वहाँ कोने में खड़ा कर दिया, जैसे स्कूल में होता है कि उठा के वहाँ खड़ा कर देते हैं। कान पकड़ने की देर है बस अब। कैसे खड़ा करा वहाँ पर? यहाँ पर क्यों नहीं कर रहे?
कितने लोग हर्ट हो गए?
प्रश्नकर्ता: जी, मेरा नहीं है, बट।
आचार्य प्रशांत: किसी का भी, अपना तो कभी होता ही नहीं। जल्दी बताओ, कितने? जल्दी बोलो।
प्रश्नकर्ता: हज़ारों होंगे।
आचार्य प्रशांत: हज़ारों को हर्ट किया, इन्फ्लुएंसर वग़ैरह वाली बिरादरी से हो क्या? कौन हो आप? हे देव, अपना परिचय दें। हज़ारों कैसे हर्ट कर लिए?
प्रश्नकर्ता: नहीं, मैं अपनी बात तो नहीं कर रहा था वैसे।
आचार्य प्रशांत: अपनी बात अगर है नहीं तो करने लायक नहीं है न। अपनी तो ज़िंदगी है। अपनी ज़िंदगी तो अपनी बात। किसी और की बात क्यों करें? किसी और की बात क्यों करें? दुनिया की सारी समस्याएँ तो हमारे ठीक न होने से हैं न? तो बात भी किसकी करेंगे? अपनी करेंगे न। वहाँ साधारण आदमी क्या कर रहा है, क्या नहीं कर रहा, उससे हमें मतलब। वी आर द वर्ल्ड, हम ख़ुद को ठीक कर लें, दुनिया ठीक हो जाएगी। ठीक है, जाइए।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जो मैं कहना चाहता हूँ, और आपसे बहुत-बहुत तीव्रता से कहना चाहता हूँ, वो ये है कि इंसान हो आप। आपकी सीमाएँ हैं। ठीक वैसे जैसे मैं इंसान हूँ, मेरी सीमाएँ हैं। आप किसी का भला भी करना चाहोगे तो एक सीमा से आगे आप नहीं कर सकते। आप किसी को चोट से, दुख-दर्द से बचाना भी चाहोगे, तो एक सीमा से ज़्यादा नहीं बचा सकते। और किसी को बचाना या न बचाना प्राथमिक रूप से आपकी ज़िम्मेदारी नहीं है। उस व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है, क्योंकि सब एडल्ट्स हैं। सबको अपनी-अपनी ज़िंदगी देखनी है।
तो अगर आप कुछ ऐसा जान रहे हो और जी रहे हो जो सही है, और उसकी वजह से लोगों को बुरा लगता है, ठेस लगती है, तो उसके लिए आप दोषी नहीं हो। अपने ऊपर से ये बोझ उतार दो। अस्तित्व की अदालत आपको बाइज़्ज़त-बरी करती है। खुश? एक्सोनरेटेड विद ऑनर्स। हैप्पी, रिलीव्ड? गुड।
कितने लोग भीतर-ही-भीतर ये ग्लानि पाल कर बैठे रहते हो कि “नहीं, ये सब बातें तो ठीक हैं, बट ये सब बातें अगर हम करेंगे तो सोसाइटी में, फैमिली में, दुनिया में लोग हर्ट हो जाएँगे।” कितने लोग ये डर या ग्लानि लेके बैठे हो? छोड़ो न।