तुम सुविधा और सुरक्षा चाहते हो, इसीलिए लोग तुम्हें दबाते हैं (झुकना छोड़ो!)

सामंजस्य, एडजस्टमेंट नहीं कर लेना चाहिए। जहाँ किसी तरीके से झुकना भी पड़े, दबना भी पड़े, डरना भी पड़े, वहाँ कम से कम अपने लिए नापसंद तो उठे। इतना तो हो कम से कम। मेरे भी थे ऑफिस में लोग, जिनको न चाहते हुए भी ‘सर’ बोलना पड़ता था। बहुत लंबे समय तक नहीं बोला, पर जितने समय तक बोला, उतने समय तक बोलना भी ऐसा था कि सिर भनना जाए।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। घर-परिवार में कोई ऐसा हो जो बिल्कुल नालायक क़िस्म का हो, फिर भी आप उसके पैर जाकर छू जाते हो। तो मेरा सवाल था कि हाँ, ठीक है, मतलब आपको पता है कि वो लायक नहीं है कि आप इज़्ज़त करो या वो चीज़ें करो, और आप अंदर से बिल्कुल अनछुए से रहते भी हो, मतलब आपके अंदर से कोई भाव नहीं है। लेकिन फिर भी आप सोशल नॉर्म्स के चलते या ऐसी चीज़ों के चलते पैर छू जाते हो। ये एक बात हुई। ऐसे ही कहीं और भी मौके होते हैं, वहाँ पर आप सोशल नॉर्म्स के चलते कुछ चीज़ें कर लेते हो।
आचार्य प्रशांत: सोशल नॉर्म्स के चलते माने क्या? सोशल नॉर्म्स के डर में, ये बोलो न खुल के। सोशल नॉर्म के चलते ऐसे जैसे वहाँ कोई चल रहा हो। वहाँ ऊपर कोई चल रहा है, वो सोशल नॉर्म है। सीधे बोलो न कि सोशल नॉर्म के आगे?
प्रश्नकर्ता: डर में, उसके डर में। तो मेरा सवाल ये था इसमें कि उसके कुछ फायदे भी मिल जाते हैं। जब उसको फॉलो करते हैं तो उसके फायदे भी मिल जाते हैं।



