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शून्य में नग्न रह जितने लिबास ओढ़ने हों,ओढ़ो || आचार्य प्रशांत (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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श्रोता: “*लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन*”

वक्ता: बात क्या है? एक्शन को समझेंगे। जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है। कुछ भी स्थिर नहीं है। छोटे से छोटे समय के लिए भी स्थिर नहीं है। आप उसको हमेशा गतिमान पाएंगे। मन चल रहा है, शरीर चल रहा है ये दोनों ही एक्शन हैं। मन का चलना और शरीर का चलना ये दोनों ही एक्शन हैं। लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन। जो चलना है ये दो प्रकार से होता है, जैसे आज हमने बात करी थी कि एक जिन्दा प्रवाह और एक मुर्दा प्रवाह, ड़ेड फ्लो। तो वैसे ही ये चलना भी दो प्रकार से होता है: एक होता है पूरी तरह से अव्यवस्थित, केओटिक। और एक होता है जिसमें एक आंतरिक व्यवस्था हो, आर्डरली। पैटर्न्स नहीं आर्डर। प्रेम उस व्यवस्था का नाम है, प्रेम उस गतिशीलता का नाम है।

ऐसा नहीं है कि जिस मन ने प्रेम जाना नहीं वहाँ कोई गति होती ही नहीं। गति वहाँ भी होती है पर वो गति वैसे ही होती है जैसे किसी पागल की गति हो। गिर रहा है, ठोकरें खा रहा है, कष्ट भी पा रहा है।

प्रेम में जो गति होती है उसमें एक सुव्यवस्था होती है। प्रेम में जो गति होती है वो न तो शराबी की होती है, न वो धावक की होती है। प्रेम की गति वैसी होती है जैसे नर्तक की होती है।

हम द्वैत के दो सिरों को जानते हैं, हम ये जानते हैं कि दो तरह के लोग होते हैं : एक वो जो कहीं को भी नहीं पहुँच रहे, एक वो लोग हैं जो कहीं को भी नहीं पहुँच पा रहे क्योंकि वो सामान्य बुद्धि से भी नीचे हैं, वो एक अबौद्धिक स्थिति पर बैठे हुए हैं, बुद्धि से भी नीचे अबौद्धिक ; ये शराबी हैं। द्वैत के दूसरे पक्ष को हम ये जानते हैं कि “न, उठो इससे और लक्ष्यों की तरफ़ दौड़ लगा दो।

एक एक्शन होता है हमारा केओटिक और जब हम से वो केओटिक एक्शन छूटता है तो हमारे जीवन में आ जाता है पर्पस ड्रिवेन एक्शन। ये धावक है, ये लक्ष्य की ओर दौड़ लगा रहा है। और ये द्वैत के दो सिरे हैं, पहला वो जो इधर-उधर झूम रहा है, गिर पड़ रहा है, कहीं जाना चाहता है पर कहीं पहुँच नहीं सकता क्योंकि जो पहुँचने का उपकरण है वही खराब हालत में है। ये अबौद्धिक स्थिति पर बैठा है। इसके विपरीत के तौर पर हम जानते हैं उसको जिसने दौड़ लगा दी है, जिसने एक दिशा पकड़ ली है और वो उस दिशा में तेजी से भागा चला जा रहा है। ये बौधिक स्थिति है, ये धावक है, ये एचीवर है।

प्रेम की जो व्यवस्था होती है, प्रेम का जो एक्शन होता है वो नर्तक का होता है।

शराबी अचीवमेंट करना चाहता है पर कर नहीं सकता और धावक उपलब्धि पाना चाहता है और उसे विश्वास है कि मिल जाएगी भविष्य में। दोनों को ही जो काम है उसमें उपलब्धि की अभी तलाश है। शराबी को तलाश है क्योंकि उसका उपकरण खराब है, ठीक हो जाए तो मिल जाएगी। धावक को तलाश है क्योंकि अभी दौड़ ही रहा है मिलेगी आगे। प्रेम के एक्शन में उपलब्धि पहले ही है। और वहाँ से एक्शन निकल रहा है। कर्म वहाँ से पैदा हो रहा है। गहराई से डूबा हूँ प्रेम में और उससे कर्म पैदा हो रहा है। ठीक है। और उससे जो कर्म पैदा होता है वही उचित कर्म है। उसकी अपनी एक सुव्यवस्था है, वो व्यवस्था न तो शराबी को उपलब्ध होती है न धावक को। एक्शन आपको दोनों जगह दिखेगा पर प्रेम की व्यवस्था का जो सौन्दर्य है वो न तो शराबी को मिला हुआ है न धावक को मिला हुआ है।

मैं फिर कहूँगा ‘लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन’ इसका अर्थ ये नहीं है कि जिन्होंने प्रेम नहीं जाना वो प्रयास नहीं करते या उनकी ज़िन्दगी में एक्शन की कमी है। हो सकता है कि उनके पास बहुत ज़्यादा एक्शन हो पर उस एक्शन में वो मस्ती नहीं होगी। उस एक्शन में मेलोडी नहीं होगी, एक प्रवाह नहीं होगी।

श्रोता१: सर, अगर वर्ड्स इफ यू वांट टू सी दैत लव इज़ दा प्रेजेंट मोमेंट, एक्शन व्हिच इज़ इन दा प्रेजेंट।

वक्ता: देखिए जब हम कह रहे थे, हमने एक्शन को परिभाषित किया था तो हमने कहा था एक्शन इज़ बोथ। पहली बात क्या बोली थी एक्शन क्या है? विचार और शारीरिक। अब जब आप सोच रहे हैं तो निश्चित रूप से आपको पीछे भी जाना पड़ेगा अतीत में, आगे भी जाना पड़ेगा भविष्य में। तो प्रेजेंट मोमेंट से हट के भी होगा काम। आप सोचेंगे भी, आप पीछे की स्मृतियों में भी जाओगे। तुम क्या कहना चाहते हो, कि जो प्रेमी है क्या उसके मन में कभी अतीत का विचार नहीं उठता? क्या वो अतीत के तथ्यों को पूरी तरीके से मिटा देता है? नहीं ऐसा नहीं है। विचार भी एक्शन है और एक प्रेमी मन, विचारशील मन भी होता है। पर उसका विचार भी प्रेम में डूबा हुआ होता है, उसका विचार भी प्रेम में डूबा हुआ है। प्रेम का अर्थ ही है डूबना। प्रेम का अर्थ ही है एक हो जाना। किसका एक हो जाना? हम कहते हैं “डूबना, डूबने का अर्थ है कि कुछ था जो अलग था वो डूब गया एक हो गया।” कौन किस में डूब गया?

श्रोता३: बोध में।

वक्ता: ठीक है। बहुत सरल शब्दों में मन अपने ही स्रोत में डूब गया। मन में अपने स्रोत में डूब गया इसके बाद वो अपने रोज के क्रियाकलापों में लगा हुआ है। वो समय में भी घूम रहा है, वो अलग-अलग लोगों से भी मिल रहा है। जितने भी कर्म हो सकते हैं सारे कर्म हो रहे हैं। वैचारिक तल पर भी, भौतिक तल पर भी जो कुछ हो सकता है वो लगातार चल ही रहा है। और जो चल रहा है वो नाच की तरह है, वो नाच की तरह है और वही वास्तविक एक्शन है। बाकि तो जो है वो सब बिखरा-बिखरा सा हमारा बहकाव है, उसको एक्शन भी कह पाना उचित नहीं है।

श्रोता३: वो इमोशन हैं बस।

वक्ता: तो जिसको आपने कहा लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन उसको आप दो और तरीकों से समझिएगा, दो और तरीकों से लिख सकते हैं : पहला, लव इज़ राईट एफर्ट एंड राईट एक्शन , सम्यक कर्म; राईट एक्शन। दूसरा, लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन विथआउट दा एक्टर। लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन विथआउट दा एक्टर।

श्रोता२: जब हम करते हैं सम्यक कर्म तो कौन सुनिश्चित करेगा कि ये है राईट एक्शन।

वक्ता: जो हमेशा तय करता ही रहता है कि सही या गलत उसी के न होने पर जो कर्म निकलता है वो सम्यक कर्म है। हमारे पास तो लगातार एक अंतरात्मा बैठी रहती है न अंतरकरण में जो हर समय ये निर्धारित करती ही रहती है कि ये करो, ये न करो। कदम-कदम पर नैतिकता के तकाज़े हैं। कि नहीं है? लगातार है न? नहीं समझ आ रही? लगातार है न? एक अंतर आत्मा है जो हर समय लगी हुई है? तो प्रेम है उस अंतरात्मा का विलीन हो जाना। प्रेमियों की कोई अंतरात्मा नहीं होती, प्रेमियों की कोई अंतरात्मा नहीं होती।

श्रोता२: क्योंकि वहाँ सही और गलत नहीं होता।

वक्ता: क्योंकि वहाँ सही और गलत नहीं होता। क्यों सही और गलत नहीं होता? क्योंकि अंतरात्मा नहीं होती इस कारण सही और गलत नहीं होता। हम सब अंतरात्मा वाले लोग हैं। कांशसनेस (चेतना) वाले लोग हैं हम। और हम इस बात में बड़ा गर्व अनुभव करते हैं “*यू सी आई एम् ए वैरी कांशसेयस मैन।*”

श्रोता१: तो इसका मतलब ये है कि हमें प्रेम कभी अनुभव नहीं होगा।

वक्ता: आप प्रेम में पूरी तरह डूबे हुए हैं पर उसका अनुभव नहीं है।

श्रोता१: सर अनुभव भी तो मन को ही है।

वक्ता: तो ये सारा खेल ही मन के लिए हो रहा है।

श्रोता३: वैलिडेट करना शुरू कर देते हैं।

वक्ता: ये सारा खेल और किस के लिए हो रहा है? सारी अशांति कहाँ है? मन में ही है, तो ये सारा खेल मन के लिए ही तो रचाया गया है। तो प्रेम कोई जज़्बा नहीं है जो उठेगा बड़ी ज़ोर से। जैसे पेट में गैस उठती है वैसे ही प्रेम उठा है। दोनों का अंत बस डकार में होता है। प्रेम वो है जो ज़िन्दगी के रेशे-रेशे को रंग दे, एक-एक कर्म में दिखाई दे। हमने कहा कि जीवन में कुछ भी कभी निष्क्रिय नहीं है। तो प्रेम वो जो उस लगातार को पूरा ही रंग दे। पूरा ही रंग दे। जैसे एक कपड़ा ऐसा रंगा गया कि फाइबर के दिल तक प्रेम वो पहुँच गया; ये है प्रेम। अब जो भी करोगे उस कपड़े से प्रेम में होगा। अब शरीर जो भी कुछ करेगा और मन जो कुछ करेगा सब घटनाएं प्रेम में घट रही होंगी।

प्रेम एक माहौल है जिसमें सब कुछ हो रहा है। खा रहे हैं, उठ रहे हैं, पी रहे हैं सब प्रेम में हो रहा है। कि जैसे बाहर मौसम अच्छा है, तो जो भी करो अच्छे मौसम में हो रहा है। तो प्रेम एक मौसम की तरह है।

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