संयोगों के खेल को आत्मा नहीं बनाते || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न सच्ची ख़ुशी को लेकर है। जैसे मैंने कोई कामना करी, और अगर वो पूरी नहीं होती है, तो उससे जो फ़्रस्ट्रेशन, जो दिमाग में मम्बलिंग या ओवरथिंकिंग (अधिक सोचना) होती है, बाद में इसको लेकर एक वॉइड (खालीपन या रिक्तता) बन जाता है और वो वॉइड कहीं-न-कहीं भरने की इच्छा होती है – या तो ज़्यादा खाना खाकर या फिर सम्बन्ध बनाकर या कोई ऐसा लक्ष्य बनाकर जिसमें अपनेआप को और व्यस्त रख सकूँ।
आचार्य प्रशांत: तो ये तो अच्छा है न, दूसरा कोई लक्ष्य बनाओ न! बस जो दूसरा बने वो पहले जैसा न हो, पहले से बेहतर हो। कामना अगर अतृप्ति देती है, हार देती है, तो ये अपनेआप में कोई बुरी बात थोड़े ही है! अब उससे बेहतर कामना करो, और फिर और बेहतर।
प्र: सर, लेकिन उससे कम्प्लीटनेस नहीं आ रही है।
आचार्य: क्या, किससे नहीं आ रही है? पिछली कामना से न?
प्र: जी सर।
आचार्य: अगली से आएगी न, करो कोशिश! उससे भी न आए तो और ऊँची वाली से करो। बस ये ग़लती मत करना, दोहरा रहा हूँ, कि जिस कोटि के लक्ष्य के पीछे पहले भागे थे, उसी कोटि का, उसी स्तर का, उसी तरह का कोई लक्ष्य दोबारा बना दिया; ये मत करना। अगला लक्ष्य पिछले लक्ष्य से ऊँचा हो; हार भी मिले तो ऊँची हार मिले।



