वक्ता: संसार श्रम है और तपस्या विश्राम। संसार उसी समय तक है जब तक आपके पास करने के लिए कुछ है। जहाँ तक आपके पास करने के लिए कुछ है, संसार वहीँ तक है। जहाँ तक लक्ष्य हैं, उपलब्धियाँ हैं, सपने हैं, संसार वहीँ तक है। और संसार से मेरा आशय है, जैसा हम उसे जानते हैं। संसार सिर्फ वहीँ तक है। मन थमा तो संसार थम गया। मन चलता रहा — और मन की जो पूरी चाल है, ये कोई सहज चाल नहीं है, मन की चाल कष्ट की चाल है, भागने की चाल है। मन चलता ही क्यों है? क्योंकि वो कष्ट में है, अन्यथा नहीं चलेगा। जब आप बोलते हो कि मैं बड़ी चंचल चित्ता हूँ, तो ये कोई मोहक वक्तव्य नहीं है कि लड़की बड़ी चंचल है। इसका अर्थ यही है कि लड़की बड़े कष्ट में है।
चंचलता यही बताती है कि जो है, उससे सम्पर्क नहीं है, इसके कारण मन कहीं और भागना चाहता है। चंचलता व्यग्रता है, चंचलता पीड़ा है, चंचलता ही संसार है। मन का चलते रहना ही संसार है, और जब तक मन चल रहा है तब तक संसार है। संसार क्या है? एक विचार ही है। वो विचार आएगा ही नहीं अगर आप वहाँ पर हो, आप जहाँ पर हो। यहाँ पर आप बैठे हो, मैं भौतिक स्थिति की बात नहीं कर रहा हूँ, आप यहाँ पर बैठे हो, आप में से कितने लोगों के मन में ये विचार चल रहा है कि बाई आ गयी होगी। जिनको आ रहा हो, घर ही चले जाएँ।
जब मन नहीं है तो संसार का लोप हो गया। इसका अर्थ ये नहीं है कि कुछ नहीं है। अभी जो है, मस्त है, शान्त है। कोई दिक्कत नहीं है पर संसार नहीं है। क्या संसार है अभी? आपमें से कितने लोग अभी विचार कर रहे हो कि दिल्ली में सरकार बनेगी कि नहीं बनेगी? या कर रहे हो? थम गया ना? संसार गया। मन थमा, संसार थमा। मन जहाँ दोबारा आपका गतिमान होगा, आपका संसार फिर से खड़ा हो जायेगा।
संसार श्रम ही है, संसार का अर्थ ही है मन का भागना। श्रम से अर्थ शारीरिक श्रम नहीं है कि माँसपेशियाँ हिल-डुल रही हैं। सारा श्रम मानसिक होता है। सभी कुछ मानसिक है, श्रम भी मानसिक है । इसलिए संसार में किसी को कुछ मिल नहीं सकता, सिवाय थकान के। कबीर कहते हैं-
‘ये संसार काँटों की झाड़ी, उलझ-उलझ मर जाना है, ये संसार कागज़ की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है’




