समय के साथ भूल क्यों जाता हूँ? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

प्रश्न: जब तक सत्र में होते हैं, सामने होते हैं, तब तक बात समझ में आती है, ठीक भी लगती है, लेकिन बाहर जाते ही हकीक़त कुछ और दिखाई देती है, बाहर जाते ही यह बातें काम नहीं आतीं हैं। जब वास्तव में इनकी ज़रूरत पड़ती है उस वक्त यह काम नहीं आतीं, भूल ही जातीं हैं।
बाहर तमाम ताकतें हैं जो इन बातों के विरोध में खड़ी हैं, जो इनको चलने नहीं देती हैं।
वक्ता: जब यह घटना घटती है तो तुम्हें शायद ऐसा लगता होगा कि तुम बाहर कमज़ोर पड़ जाते हो। जिसने मुझसे यह सवाल पूछा है उसका आशय यही रहा है कि जब तक हम सुन रहे हैं, तब तक सब ठीक है, गड़बड़ बाहर हो रही है। तुम्हारा कहना यह है कि जब तक तुम यहाँ बैठे हो तुम्हें सब समझ आ रहा है और तुम्हें सब ठीक भी लग रहा है, लेकिन गड़बड़ बाहर हो रही है। अगर कोई मरीज़ किसी अस्पताल में हो और अस्पताल से बाहर निकलते ही उसे जल्दी-से वही बीमारी लग जाए जिसके लिए वो अस्पताल आया था, वो फिर से अस्पताल जाए और उसे लगे कि वो ठीक है, और बाहर आकर फिर से उसे बीमारी लग जाए, तो क्या वो कभी-भी ठीक हुआ था? क्या उसका यह दावा करना उचित होगा कि बीमारी उसे बाहर से लग रही है।
सच तो यह है कि वो कभी ठीक हुआ ही नहीं था। उसे बस भ्रम हो जाता था कि वो ठीक हो गया है। दिक्कत बाहर नहीं हो रही है, दिक्कत अंदर हो रही है। तुम्हारा यह दावा कि जब तुम यहाँ हो तब तुम्हें सब समझ में आता है, यह दावा ठीक नहीं है। अगर तुम यहाँ पूरे ध्यान में डूब गए होते, तुमने ईमानदारी से अपने आप को खोल दिया होता, बातें पूछ लीं होतीं, स्पष्टीकरण ले लिए होते, तो तुम्हें बाहर दिक्कत नहीं आती। बाहर दिक्कत इसलिए आती है क्योंकि जब तुम भीतर होते हो तो पूरी तरह मौजूद नहीं होते हो। दिक्कत बाहर नहीं है, दिक्कत यहाँ पर है *(प्रश्न कर्ता की ओर इंगित करते हुए)*।



