रिश्ते संयोग से बनते हैं, या पूर्व-निर्धारित होते हैं? || आचार्य प्रशांत (2018)

प्रश्नकर्ता: रिश्ते संयोग से बनते हैं या पूर्व निर्धारित होते हैं? लोग मिलते हैं, उनमें रिश्ते बन जाते हैं। क्या यह डेस्टिनी (नियति) है?
आचार्य प्रशांत: ये डेस्टिनी नहीं है। मन तो पचास जगह रिश्ता बनाता है। वो सब रिश्ते मन के खेल हैं, मन की प्यास हैं, समय के संयोग हैं। डेस्टिनी होती है वो आख़िरी रिश्ता, जिसके बाद और कोई रिश्ता चाहिए नहीं। डेस्टिनी का अर्थ होता है अन्त। डेस्टिनेशन (लक्ष्य), अन्त, जाकर के रुक जाना।
जो मिल गया हो आपको, क्या उसके बाद कोई और नहीं चाहिए — ये प्रश्न पूछिए। जो मिल गया है, जिससे सम्बन्धित हो रहे हो, क्या वो आख़िरी है? अगर वो आख़िरी है तो डेस्टिनी है, आख़िरी नहीं है तो खेल है, संयोग है, घटना है। खेल चलता रहेगा। अभी जहाँ बैठे हो, वहाँ भी तो रिश्ता बन गया है; चादर पर बैठे हो, चादर से एक रिश्ता है। क्या ये आख़िरी चादर है? यहाँ आये हो, एक-दूसरे से मिले हो, बहुत लोग नये मिले होंगें। क्या आख़िरी बार किसी अजनबी से मिले हो?
ये यात्रा है, ये यात्रा है मंज़िल की तरफ़। मंज़िल से जो रिश्ता बनता है, मात्र वही डेस्टिनी है। नियति, मंज़िल, जहाँ तुम्हें पहुँचना-ही-पहुँचना है। इसीलिए समझाने वाले कह गये हैं कि रिश्ते बहुत सोच-समझ के बनाओ। सन्तों के पास जाओगे, वो कहेंगे, संगत से ज़्यादा बड़ी बात दूसरी नहीं। सुसंगति मिल गयी तो सबकुछ मिल गया और कुसंगति मिल गयी तो जीवन तबाह है। क्योंकि सारे रिश्ते हैं ही इसीलिए कि कोई ऐसा मिल जाए जो उससे (ऊपर की ओर इशारा करके) रिश्ता बना दे तुम्हारा। समझ रहे हो?
जिससे मिले हो, अगर वो ऐसा है कि तुमसे तुम्हारा ही परिचय करा दे, तुमसे सच्चाई का परिचय करा दे तो सुसंगति है। इस व्यक्ति को जीवन में आदर देना, जगह देना, मूल्य देना। पर जो मिला है तुमसे, उससे रुचि का सम्बन्ध है, लेन-देन जैसी बात है, उसके साथ रहकर के कुछ मज़ा सा आता है, अच्छा सा लगता है, उत्तेजना सी बढ़ती है, थोड़ी ख़ुमारी, थोड़ा नशा आता है, तो समझ लेना, ये तो आने-जाने वाली चीज़ें हैं, जीवन में लगी रहती हैं, आती-जाती रहती हैं। अब ये तुम्हें देखना है और तय करना है कि जिससे मिले हो, उसका प्रभाव क्या हो रहा है तुम पर।



